- अमेरिका और ईरान के बीच मध्य पूर्व में युद्धविराम तो हुआ है, लेकिन शांति की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है
- खाड़ी देशों में आपसी भरोसे की कमी और इजरायल की बातचीत में अनुपस्थिति शांति प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है
- अमेरिका की सैन्य ताकत पर सवाल उठे हैं क्योंकि उसकी सुरक्षा गारंटी खाड़ी देशों की रक्षा में असफल रही है
अमेरिका और ईरान के बीच मिडिल ईस्ट में जारी जंग को रोकने के लिये युद्धविराम तो हो चला है. अब आगे की बातचीत के लिये दोनों मुल्क के नेता आमने सामने बैठकर बात करेंगे. ऐसे में अब यह सवाल है क्या अब मिडिल ईस्ट में शांति का दौर फिर से लौट आयेगा? या फिर मिडिल ईस्ट में फिर से अस्थिरता का एक नया दौर शुरु हो गया है. क्योंकि इसमें कोई राय नही कि 40 दिन तक चले अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हुए युद्ध से नए समीकरण बनेंगे जो पहले ही अस्थिर मिडिल ईस्ट में और अनिश्चितता का माहौल बना देंगे. तभी तो मध्य पूर्व में राजनयिक रहे अनिल त्रिगुनायत कहते है कि मिडिल ईस्ट में तो हमेशा के लिये शांति आ ही नहीं सकती. वजह है वहां के बुनियादी मुद्दे वही हैं. वहीं वरिष्ठ पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल ने कहा कि मिडिल ईस्ट के हालात बहुत ही खराब है. फिलहाल शांति की बात तो दूर अभी तो अशांति के आसार ही ज्यादा नजर आ रहे हैं.
खाड़ी देशों को एक दूसरे पर भरोसा नहीं
अभी तक तो यह ही तय नहीं है कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शनिवार को बैठक होगी भी या नहीं? अगर बैठक होती भी है तो क्या इससे मिडिल ईस्ट में शांति का रास्ता निकलेगा या मामला और उलझा जाएगा? वजह है कि इस बातचीत में इजरायल शामिल ही नही हैं और बिना उसके यह बातचीत कैसे सफल हो सकती है? पूर्व डिप्लोमेट अनिल त्रिगुनायत ने कहा खाड़ी देशों में सबसे बड़ी समस्या एक दूसरे पर भरोसा नहीं होना है. जब तक आपसी विवाद को सुलझाने के लिए समझदारी भरा फैसला नहीं लिया जाता तब तक ऐसा होता रहेगा. पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल कहते हैं कि क्या मिडिल ईस्ट में बिना इजरायल के फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता नहीं दिये जाने पर कैसे शांति आ सकती है? आज भी अरब के ज्यादातर देशों की सहानुभूति फिलिस्तीन के प्रति ही हैं. यही वजह है कि कोई भी देश खुलकर इजरायल के साथ खड़े होने से बचता हैं.
जंग में खाड़ी देशों को क्या मिला?
वहीं इस जंग में खाड़ी देशों के बीच सऊदी अरब का इन्फ्लुएंस भी कम हुआ है. मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ा देश जब अपनी ही हिफाजत नहीं कर पाया तो वह दूसरों की मदद कैसे करेगा. सऊदी अपनी तेल और यूएई अपनी आर्थिक ताकत के साथ अमेरिका के सहारे खाड़ी देशों में अपना प्रभाव जमाता था. लेकिन अब तो स्थिति उलट है. वहां शिया और सुन्नी का भी मामला हमेशा से उलझा रहा है. ईरान ने सबको अपनी बढ़ी हुई ताकत का एहसास करा दिया है. जंग में इजरायल का असर भी कम नहीं हुआ है. जिस तरह की तबाही उसने लेबनान और ईरान में फैलाई है उससे उसका खौफ का कायम रहना स्वभाविक है.
इतना कुछ होने के बावजूद हालात ये हैं कि खाड़ी का कोई भी देश ना तो ईरान और ना ही इजरायल का अधिपत्य देखना चाहता है. वहां पर सबसे बड़ी समस्या इगो की भी है. आपसी मतभेद भी काफी ज्यादा है. अगर किसी भी तरह शांति समझौता हो भी जाता है तो वह कितने दिन टिकेगा? इजरायल लगातार हिज्बुल्लाह पर हमले किये जा रहा है. उसे इस बात की कतई परवाह नहीं है कि इस दुनिया के बड़े देश क्या कह रहे हैं? ऐसे में अगर ईरान फिर से इजरायल पर अपने मिसाइल और ड्रोन से जवाबी कार्रवाई शुरु कर दे तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए. क्योंकि ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि वह हिज्बुल्लाह को छोड़ नहीं सकता है. इस हालात में मिडिल ईस्ट फिर से जंग की आग में धधकता नजर आ रहा है.
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