- क्लस्टर बम हवा में फट कर कई छोटे बम फैलाते हैं, जिससे व्यापक इलाकों में भारी तबाही और नागरिकों को खतरा होता है
- ईरान को यह तकनीक रूस या चीन से मिली हो सकती है, जबकि इसके हथियार वैज्ञानिकों पर पहले हमले भी हुए हैं
- इजरायल में हाल के मिसाइल हमलों में कम से कम ग्यारह लोगों की मौत और हजार से अधिक लोग घायल हुए हैं
इजरायली सैन्य अधिकारियों ने दावा किया है कि ईरान ने इजरायल की तरफ क्लस्टर बम लगे बैलिस्टिक मिसाइल दागे हैं. कहा जा रहा है कि मौजूदा युद्ध में ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की यह पहली खबर है.क्लस्टर बम आधुनिक हथियारों में सबसे ज्यादा विवादित माने जाते हैं. इनकी खास बात यह है कि ये एक बड़े इलाके में कई छोटे बम फैला देते हैं. इजरायली रक्षा अधिकारियों का कहना है कि कुछ ईरानी क्लस्टर मिसाइलों का वॉरहेड हवा में फटकर 80 तक छोटे बम छोड़ सकता है. इससे कई किलोमीटर के इलाके में भारी तबाही हो सकती है.सैन्य जानकारों का कहना है कि इन हथियारों से लड़ाई का तरीका बदल जाता है. एक जगह एक बड़ा धमाका होने के बजाय कई छोटे धमाके अलग-अलग जगह होते हैं. इससे आम लोगों के लिए खतरा बढ़ जाता है. कई बार छोटे बम फटते नहीं हैं और लड़ाई खत्म होने के बाद भी जानलेवा बने रहते हैं.
ईरान के पास कैसे आई ये तकनीक?
अब सवाल सिर्फ तुरंत होने वाले खतरे का नहीं है. यह भी चर्चा है कि ईरान ने यह तकनीक कैसे विकसित की. खासकर तब, जब उसके हथियार कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों को पहले निशाना बनाया जाता रहा है. इजरायली विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें बाहर से मदद मिली हो सकती है. रूस या चीन से सैन्य जानकारी मिलने की अटकलें लगाई जा रही हैं.
तेल अवीव के पास हमला
इजरायली सेना का दावा है कि हालिया हमलों में कम से कम एक ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल, जिसमें क्लस्टर बम लगे थे, मध्य इजरायल में गिरी.
रिपोर्ट के मुताबिक मिसाइल का वॉरहेड लगभग सात किलोमीटर की ऊंचाई पर फटा. इसके बाद करीब 20 छोटे बम निकले जो लगभग आठ किलोमीटर के दायरे में फैल गए. एक छोटा बम तेल अवीव के दक्षिण में अज़ोर कस्बे में एक घर पर गिरा. इमारतों को नुकसान हुआ लेकिन कोई मौत नहीं हुई. अन्य हमलों में कई लोग घायल हुए.
हमलों के तरीके में बदलाव
ईरान का मिसाइल हमला पूरे हफ्ते चलता रहा, हालांकि हमलों की संख्या कम ज्यादा होती रही. 3 मार्च को ईरान ने कम से कम छह मिसाइल दागीं. इससे एक दिन पहले भी इतने ही हमले हुए थे. 28 फरवरी को एक ही दिन में कम से कम 20 मिसाइल हमले दर्ज किए गए थे. उसके मुकाबले यह संख्या कम है.फिर भी इजरायली अधिकारियों का कहना है कि क्लस्टर वॉरहेड नई चुनौती है. ये शहरों में कई छोटे बम गिरा देते हैं. इससे उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है और जमीन पर खतरा बढ़ जाता है. अधिकारियों का मानना है कि शनिवार से अब तक ईरान ने कम से कम पांच क्लस्टर मिसाइलें दागी हैं. ये सभी घनी आबादी वाले इलाकों की तरफ थीं. मंगलवार को मध्य इजरायल की ओर दो ऐसी मिसाइलें दागी गईं. इससे कई जगह नुकसान और चोटें आईं.
क्लस्टर वॉरहेड कैसे काम करते हैं
साधारण बैलिस्टिक मिसाइल में आमतौर पर 500 से 1000 किलोग्राम वजन का एक बड़ा वॉरहेड होता है. क्लस्टर वॉरहेड अलग तरीके से काम करते हैं. मिसाइल हवा में खुल जाती है और कई छोटे बम छोड़ती है. हर छोटे बम में लगभग सात किलोग्राम तक विस्फोटक हो सकता है. यह ताकत हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों के छोटे रॉकेटों के बराबर मानी जाती है. हर धमाका छोटा होता है, लेकिन जब ये टुकड़े बड़े इलाके में फैलते हैं तो कुल नुकसान ज्यादा हो सकता है.अधिकारियों का कहना है कि हालिया हमले में मिसाइल लगभग सात किलोमीटर की ऊंचाई पर टूटी और उसके टुकड़े आठ किलोमीटर तक फैल गए.
जानकारों का कहना है कि अगर ऐसी मिसाइल को हवा में ही रोक लिया जाए तो खतरा और बढ़ जाता है. अगर मिसाइल पूरी तरह जमीन तक पहुंचती है तो उसके छोटे बम जमीन से टकराकर फट जाते हैं. लेकिन अगर उसे हवा में रोक दिया जाए तो छोटे बम अलग-अलग जगह गिरते हैं. कुछ तुरंत फटते हैं और कुछ नहीं फटते. जो छोटे बम नहीं फटते, वे बाद में छूने या हिलाने पर फट सकते हैं. इससे आम लोगों और बचाव कर्मियों के लिए लंबे समय तक खतरा बना रहता है. क्लस्टर हथियारों का सबसे बड़ा खतरा यही बिना फटे बम होते हैं. कई छोटे बम जमीन पर गिरकर नहीं फटते. ये सालों तक सक्रिय रह सकते हैं और बारूदी सुरंग की तरह काम कर सकते हैं.
पहले भी हो चुका है इस्तेमाल
इजरायली अधिकारियों का कहना है कि पिछले साल जून में 12 दिन चले युद्ध में ईरान ने पहली बार क्लस्टर मिसाइलों का इस्तेमाल किया था. उस समय इजरायल पर तीन क्लस्टर मिसाइलें दागी गई थीं, जिन्होंने सात शहरों को निशाना बनाया था. इजरायली विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने कम से कम तीन तरह की मिसाइलें बनाई हैं जो क्लस्टर बम ले जा सकती हैं. इनमें कम दूरी की ज़ोल्फ़ाघर मिसाइल, ज्यादा दूरी की क़द्र श्रृंखला और बड़ी खोर्रमशहर मिसाइल शामिल हैं. खोर्रमशहर को सबसे ताकतवर माना जाता है. ईरान का दावा है कि इसकी मारक क्षमता लगभग 2000 किलोमीटर है और यह 80 क्लस्टर बम ले जा सकती है.
ईरान की क्षमता
ईरान खुलकर क्लस्टर बम बनाने की बात नहीं करता है लेकिन संकेत मिलते हैं कि वह बैलिस्टिक मिसाइल और रॉकेट दोनों के लिए ऐसे हथियार बनाता है. ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार क़द्र एस मिसाइल लगभग 2000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और क्लस्टर वॉरहेड ले जाती है. हालांकि इसमें कितने छोटे बम होते हैं, यह साफ नहीं है. पश्चिमी रिपोर्टों में कहा गया है कि ज़ोल्फ़ाघर मिसाइल भी क्लस्टर बम ले जा सकती है. 2015 में ईरान ने फतेह मिसाइल का एक रूप दिखाया था जिसमें 30 छोटे बम थे. हर एक का वजन लगभग 20 पाउंड था. अन्य मिसाइलों को भी इस तरह के इस्तेमाल के लिए बदला गया हो सकता है. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक कियाम श्रृंखला की मिसाइल या बड़ी खोर्रमशहर मिसाइल का इस्तेमाल 19 जून 2025 के हमले में हुआ हो सकता है. ईरान 122 मिमी, 240 मिमी और 333 मिमी के कई तरह के रॉकेट भी बनाता है. यह साफ नहीं है कि इनमें क्लस्टर बम लगाए जा सकते हैं या नहीं.
विदेशी हथियार और भंडार
ओपन सोर्स जानकारी के अनुसार ईरान के पास कुछ विदेशी क्लस्टर बम सिस्टम भी हैं. इनमें KMGU डिस्पेंसर, PROSAB-250 क्लस्टर बम और ब्रिटेन में बना BL755 क्लस्टर बम शामिल हैं. ईरान ने कभी नहीं बताया कि उसके पास ऐसे बम कितनी संख्या में हैं. क्लस्टर हथियारों को लेकर दुनिया में लंबे समय से बहस चल रही है. 2008 में 100 से ज्यादा देशों ने क्लस्टर बमों पर रोक लगाने वाली संधि पर हस्ताक्षर किए. यह संधि इनके इस्तेमाल, उत्पादन, खरीद-फरोख्त और भंडारण पर रोक लगाती है. अब तक 111 देश और 12 अन्य इकाइयां इस संधि से जुड़ चुकी हैं. इजरायल और ईरान ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.
अमेरिका भी इसमें शामिल नहीं हुआ
2023 में यह मुद्दा फिर चर्चा में आया जब अमेरिका ने रूस के खिलाफ इस्तेमाल के लिए यूक्रेन को क्लस्टर बम दिए. यूक्रेन का कहना है कि रूस ने भी युद्ध के दौरान क्लस्टर हथियारों का इस्तेमाल किया था.
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