3 देश, 3 एजेंडे और बड़ी जियो पॉलिटिक्स... ईरानी विदेश मंत्री की 48 घंटे की कूटनीतिक मैराथन की Inside Story

ईरान‑अमेरिका तनाव, समुद्री नाकेबंदी, परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंध - इन सभी को एक ही फ्रेम में जोड़कर ईरान आगे की राह तैयार करना चाहता है.

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  • ईरानी विदेश मंत्री अराघची का इस्लामाबाद, मस्कट और रूस का दौरा महज सामान्य शिष्टाचार का हिस्सा नहीं था
  • यह यात्रा युद्ध, कूटनीति और प्रतिबंध - तीनों मोर्चों पर एक साथ चल रही ईरान की रणनीति का हिस्सा है
  • ईरान का रुख स्पष्ट है कि जब तक अमेरिकी नाकेबंदी रहती है, तब तक किसी भी व्यापक बातचीत की गुंजाइश नहीं है
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ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का इस्लामाबाद, मस्कट और रूस का 48 घंटे का दौरा सामान्य राजनयिक शिष्टाचार का हिस्सा नहीं था. यह यात्रा दरअसल युद्ध, कूटनीति और प्रतिबंध - तीनों मोर्चों पर एक साथ चल रही ईरान की रणनीति का हिस्सा है. इस मिशन को अगर संक्षेप में समझें तो यह तीन देशों के जरिए तीन बड़े मुद्दों को साधने की कोशिश है. ईरान‑अमेरिका तनाव, समुद्री नाकेबंदी, परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंध - इन सभी को एक ही फ्रेम में जोड़कर ईरान आगे की राह तैयार करना चाहता है. ईरान की इस बड़ी जियो पॉलिटिक्स पर NDTV ने ईरान के वरिष्ठ पत्रकार राशिद नकवी से बात की, जिन्होंने इस दौरे की अहमियत के बारे में विस्तार से बताया. 

पहला पड़ाव: इस्लामाबाद - युद्धविराम को स्थायी बनाने की कोशिश

ईरान ने अपने कूटनीतिक प्रयासों की शुरुआत पाकिस्तान से की. इसका कारण साफ है. पाकिस्तान इस क्षेत्र का ऐसा देश है जिसके अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों - सभी से संवाद के चैनल खुले हैं.

ईरान का पहला एजेंडा है- 
* मौजूदा युद्धविराम का विस्तार
* और उसे स्थायी युद्ध समाप्ति (Permanent Cessation) में बदलना

ईरान का रुख बिल्कुल स्पष्ट है: जब तक अमेरिका द्वारा घोषित समुद्री नाकेबंदी बनी रहती है, तब तक किसी भी व्यापक बातचीत की गुंजाइश नहीं है. इसी संदेश को ईरान पाकिस्तान के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाना चाहता है. इस्लामाबाद को इस बार केवल मध्यस्थ नहीं, बल्कि मैसेज कैरियर की भूमिका दी गई है.

समुद्री नाकेबंदी: ईरान की ‘रेड लाइन'

अमेरिका द्वारा समुद्री मार्गों पर लगाए गए प्रतिबंध ईरान के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि संप्रभुता का सवाल हैं.
ईरान का तर्क है कि- अगर व्यापारिक और तेल मार्ग खुले नहीं, तो युद्धविराम केवल नाम का रह जाएगा, इसलिए पहला चरण सैन्य टकराव से निकलने का है, लेकिन शर्तों के साथ.

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दूसरा पड़ाव: मस्कट - परमाणु कार्यक्रम पर बैक‑चैनल डिप्लोमेसी

दूसरा और सबसे संवेदनशील मुद्दा है ईरान का परमाणु कार्यक्रम. ओमान की राजधानी मस्कट इस तरह की बातचीत का पुराना और भरोसेमंद मंच रहा है. पहले भी ईरान‑अमेरिका न्यूक्लियर डील के दौरान मस्कट ने बैक‑चैनल की भूमिका निभाई थी

इस दौरे में भी मस्कट का संदेश साफ है -
* परमाणु कार्यक्रम पर बात होगी, लेकिन शांत माहौल में, मीडिया की सुर्खियों से दूर.
* ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह बातचीत के खिलाफ नहीं है,
* ...लेकिन अपनी शर्तों और सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा.

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तीसरा पड़ाव: रूस - प्रतिबंधों के खिलाफ महाशक्ति का समर्थन'

ईरान के लिए तीसरा चरण सबसे दूरगामी है: आर्थिक प्रतिबंधों का अंत. ईरान जानता है कि- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध और पश्चिमी देशों के दबाव बिना महाशक्तियों के समर्थन के नहीं हट सकते. यहीं रूस की अहम भूमिका शुरू होती है. रूस के साथ ईरान का रणनीतिक, सैन्य और राजनीतिक सहयोग पहले से मजबूत है.

ईरान चाहता है कि - 
* रूस सुरक्षा परिषद में उसका पक्ष मजबूती से रखे
* और जरूरत पड़ने पर वीटो पावर का इस्तेमाल करे
* इसके साथ यह भी संकेत है कि चीन भी इस लाइन पर ईरान के साथ खड़ा रह सकता है.

तीन देश, एक रणनीति

अराघची की इस पूरी 48 घंटे की दौड़ को अगर एक फ्रेम में देखें तो तस्वीर साफ होती है - 

* पाकिस्तान: युद्धविराम और नाकेबंदी पर अमेरिकी दबाव
* ओमान: परमाणु कार्यक्रम पर संवाद का रास्ता
* रूस (और चीन): प्रतिबंधों के खिलाफ वैश्विक कवच

यानी ईरान अब केवल रणनीतिक रक्षा नहीं, बल्कि आक्रामक कूटनीति अपना रहा है.

आगे क्या?

अब सवाल यह है कि - 
* क्या अमेरिका समुद्री नाकेबंदी पर नरम रुख अपनाएगा?
* क्या परमाणु मुद्दे पर बातचीत दोबारा पटरी पर आएगी?
* और क्या सुरक्षा परिषद के स्तर पर ईरान को राहत मिल पाएगी?

फिलहाल इतना तय है कि ईरान की यह 48 घंटे की यात्रा सिर्फ दौरा नहीं, आने वाले बड़े समझौतों का ट्रेलर है.

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