अमेरिका और उसकी पाबंदियों के बीच कैसे आगे बढ़ता है ईरान, चीन से कैसे करता है तेल का कारोबार

अमेरिका ने 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाज से ही ईरान पर आर्थिक और सैन्य पाबंदियां लगानी शुरू कर दी थी. आइए जानते हैं कि इन पाबंदियों का मुकाबला ईरान ने कैसे किया.

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नई दिल्ली:

ईरान और अमेरिका के बीच अभी तनाव भरी शांति है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले की योजना को टाल दिया है. ईरान उन लोगों पर कार्रवाई कर रहा है जो सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल हुए थे. ईरान की अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता के खिलाफ शुरू हुआ हालिया प्रदर्शन पिछले प्रदर्शनों से थोड़ा अलग था.ये प्रदर्शन ईरानी रियाल की गिरती कीमतों के विरोध में राजधानी तेहरान से शुरू हुए थे. इसे शुरू किया था वहां व्यापारी वर्ग ने. बाद में इसमें समाज के दूसरे वर्ग भी शामिल होते गए. ईरान के व्यापारी वर्ग को सरकार का समर्थक माना जाता है. यह ईरान का नेतृत्व और उसका कारोबारी-व्यापारी समाज ही है, जिसने अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के तमाम आर्थिक पाबंदियों के बाद भी ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से डूबने नहीं दिया है. 

इस्लामिक क्रांति और ईरान पर पाबंदियां

ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से ही उस पर अब तक संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की कई आर्थिक पाबंदियां लगी हुई हैं. इन पाबंदियों की वजह से ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजारों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधनों तक पूरी पहुंच नहीं मिल पाती है. लंबे समय से चली आ रही इन पाबंदियों और आर्थिक दबावों की वजह से ईरान में कई गंभीर आर्थिक समस्याएं पैदा हुईं. इस्लामिक क्रांति के समय एक डॉलर की कीमत 70 ईरानी रियाल थी. यह मंगलवार को 10 लाख 69 हजार ईरानी रियाल से अधिक था. इस साल के शुरू में विरोध प्रदर्शन बढ़ने के समय यह 15 लाख के आसपास पहुंच गया था. 

ईरान की बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रही है. ईरान ने खुद को संभालने की रणनीतियां बनाई हैं. अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना था. लेकिन इन प्रतिबंधों के कारण ईरान ने आय के नए स्रोत खोजे और बाहरी दबाव के खिलाफ मजबूती दिखाई.

ईरान में तेल का खेल

इतिहास में ईरान की अधिकांश आय तेल निर्यात से आती है.  लेकिन प्रतिबंधों के बाद ईरान ने अपना तेल बेचने के कई उपाए किए हैं. इनमें  शिपिंग के नए रास्ते विकसित किए, तेल की असली पहचान छिपाने के तरीके अपनाए और चीन-रूस जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाया. आज ईरान के निर्यात का 70 फीसदी हिस्सा तेल का है. सरकार के बजट का मुख्य आधार भी तेल का निर्यात ही है. 

पिछले साल जून में ईरान ने इजरायल के साथ 12 दिन तक युद्ध लड़ा था. इसमें अमेरिका भी शामिल हुआ था. इसका परिणाम यह हुआ था कि ईरानी रियाल की कीमतों में भारी अवमूल्यन हुआ था.एक डॉलर की कीमत 10 लाख ईरानी रियाल के बराबर पहुंच गई थी. लेकिन अक्तूबर में ईरान ने 66.8 मिलियन बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया था. यानी कि उसने 2.15 मीलियन बैरल तेल प्रतिदिन निर्यात किया था. ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. वह ईरान का करीब 90 फीसदी तेल खरीदता है. 

अमेरिकी पाबंदियों को दरकिनार कर चीन ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है.

तेल टैंकर पर लगी पाबंदियां

ईरान के पास तेल ले जाने वाले कुल 53 जहाज हैं. इनमें से 39 पर अमेरिका ने पाबंदियां लगा रखी हैं तो दो पर ब्रिटेन ने और तीन पर यूरोपीय यूनियन ने पाबंदी लगा रखी है. केवल 14 जहाज ऐसे हैं, जिन पर कोई पाबंदी नहीं है. इन पाबंदियों का तोड़ ईरान और चीन ने मिलकर निकाला है. दरअसल इन जहाजों पर पानी में सॉफ्टवेयर से नजर रखी जाती है. उनकी लोकेशन, गति और रास्ते पर सॉफ्टवेयर से नजर रखी जाती है. इससे बचने के लिए ईरान और चीन ने एक टैंकरों का नेटवर्क बनाया है, इसमें टैंकरों की सही लोकेशन का पता ही नहीं चलता. इसकी वजह से चीन को पाबंदियों और पश्चिमी देशों के नियमों का पालन करने की जरूरत ही नहीं रह जाती है.इस तरह के नेटवर्क को डार्क फ्लीट्स कहा जाता है. इसमें तेल शिप-टू-शिप ट्रांसफर किया जाता है.चीन के साथ यह ट्रांसफर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में ही किया जाता है, लेकिन निर्धारित ट्रांसफर जोन से बाहर. कई बार इसके लिए खराब मौसम का चुनाव किया जाता है. इसका मकसद लोकेशन और गतिविधियों को गुप्त बनाए रखना होता है. 

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इसके अलावा ईरान और चीन अपना लेन-देन छोटे चीनी बैंकों के जरिए करते हैं. इस वजह से वो पश्चिमी निगरानी प्रणाली में नहीं आ पाते हैं. दरअसल चीन ईरान से तेल खरीदने के जोखिम को जानता है इसलिए वह लेन-देन में अपने बड़े बैंकों की जगह छोटे बैंकों को शामिल करता है, जिन्हें कोई अंतरराष्ट्रीय खतरा नहीं है. चीन ईरान को भुगतान भी अपनी मुद्रा में ही करता है. ईरान अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए क्रिप्टोकरेंसी का भी इस्तेमाल करता है. इससे लेन-देन का पता लगा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. 

ईरान का घरेलू उत्पादन और निर्माण 

ईरान ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन और निर्माण पर भी ध्यान दिया है. ईरान ने दशकों तक अलग-थलग रहने के दौरान इस तरह की रणनीति विकसित की है. इसी का नतीजा है कि ईरान का 'शाहेद'नाम का ड्रोन दुनिया में मशहूर होता जा रहा है.इसका इस्तेमाल रूस-यूक्रेन युद्ध में भी हुआ है. इस ड्रोन के कई हिस्से अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों से शेल कंपनियों या सहयोगी देशों के जरिए मंगाए जाते हैं. दशकों से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव ने ईरान को आत्मनिर्भर बनाया. उसने गुप्त आयात और दूसरे तरीके अपना कर अपनी अर्थव्यवस्था और सेना को बनाए रखने के नए तरीके खोजे.ईरान ने सैन्य स्तर पर अमेरिका जैसी आधुनिक सेना बनाने की जगह सस्ती और आसानी से इस्तेमाल होने वाले ड्रोन और मिसाइल आधारित ताकत बढ़ाने पर ध्यान दिया. 

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