- विश्व में राजनीतिक और सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका जताई जा रही है
- अमेरिका चीन की बढ़ती शक्ति से चिंतित है और उसे बिना सीधे संघर्ष के कमजोर करने की रणनीति बना रहा है
- रूस-यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए जिनेवा में वार्ता जारी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है
दुनिया में इतनी उथल-पुथल मची है कि हर देश भविष्य को लेकर चिंतित है. अमेरिका हो या चीन, रूस हो या यूरोप या फिर भारत. वर्ल्ड ऑर्डर इतनी तेजी से बदल रहा है कि हर कुछ दिनों में ऐसा लगता है कि दुनिया अब तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है और फिर कुछ दिनों में लगता है कि ये सिर्फ मनगढ़ंत बातें ही है और वास्तविकता से कोसों दूर हैं. मगर, गहराई से देखा जाए तो साफ पता लगता है कि दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है और एक चिंगारी पूरी दुनिया को आग में झोंक देगी.
दुनिया भर में तनाव चरम पर
दुनिया का अब एकमात्र सुपरपावर अमेरिका लगातार चीन की बढ़ती ताकत से चिंतित है. अमेरिका खुद को मजबूत करने में लगा है, साथ ही चीन से बगैर सीधे लड़े उसे कमजोर करना चाहता है. ये बात पेंटागन की 2026 की रिपोर्ट कहती है. इसीलिए अमेरिका चाहता है कि यूरोप यूक्रेन की लड़ाई को समाप्त करवाए और चीन को घेरने में उसका साथ दे. यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप व अमेरिका और नाटो में दूरियां बढ़ गईं. यूरोप को लगता है कि उसकी सीमा रूस से लगती है, इसलिए चीन की अपेक्षा रूस से ज्यादा उसे खतरा है. एशिया की बात करें तो भारत-पाकिस्तान-चीन-बांग्लादेश का अलग लेवल पर टकराव है. जापान की नई सरकार अब अपने देश को सैन्य क्षेत्र में मजबूत कर रही है. ताइवान और फिलिपिंस से दक्षिण चीन सागर में चीन का टकराव है ही. इस तरह दक्षिण चीन सागर में भी अमेरिका-जापान-ताइवान-फिलिपिंस और रूस टकरा रहे हैं. रूस और यूक्रेन का युद्ध चल ही रहा है. मिडिल ईस्ट में नजर दौड़ाएं तो अमेरिका-ईरान-इजरायल एकदम जंग के करीब हैं. सऊदी-यूएई में टकराहट बढ़ रही है. उधर, तुर्की और ग्रीस भी भिड़ने को तैयार दिख रहे हैं.
रूस-यूक्रेन और अमेरिका
ऐसे माहौल में जिनेवा और नई दिल्ली में इस समय जो हलचल दिख रही है, उस पर सारी दुनिया की नजर है. आज जिनेवा में रूस-यूक्रेन-अमेरिका की मीटिंग होने वाली है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने एक ब्रीफिंग में कहा कि यूक्रेन विवाद के समाधान के लिए जिनेवा में चल रही वार्ता से आज कोई खबर आने की संभावना नहीं है, क्योंकि कल भी कार्य जारी रहेगा. क्रेमलिन के प्रवक्ता ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि आज हमें कोई खबर मिलने की उम्मीद करनी चाहिए, क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं, कल भी कार्य जारी रहेगा. हमारी कोई बयान या टिप्पणी देने की योजना नहीं है." एक सूत्र ने TASS को बताया कि 17-18 फरवरी को रूपरेखा संबंधी मापदंडों पर सहमत होने का लक्ष्य रखेंगे. मतलब आज या कल तक कुछ ठोस बात रूस-यूक्रेन युद्ध पर सामने आने की संभावना है.
ईरान-अमेरिका मीटिंग
वहीं जिनेवा में आज ही ईरान और अमेरिका के बीच भी बात हो रही है. सऊदी मीडिया ने मंगलवार को बताया कि ओमान की मध्यस्थता में अप्रत्यक्ष ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता का दूसरा दौर स्विट्जरलैंड के जिनेवा में शुरू हुआ. इस वार्ता में अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर वाशिंगटन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची वार्ता में एक राजनयिक और विशेषज्ञ प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं. रविवार को बीबीसी से बात करते हुए, ईरान के उप विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने पुष्टि की कि ईरान अपने 60 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम को कम करने पर चर्चा कर सकता है, जो देश की लचीलेपन का प्रमाण होगा, लेकिन उन्होंने ईरानी धरती पर शून्य संवर्धन की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया.
नई दिल्ली पर क्यों नजर
नई दिल्ली में इंडिया एआई-इम्पैक्ट समिट का आगाज 16 फरवरी को हुआ है और ये 20 फरवरी तक चलेगा. दुनिया के सभी देश इस समिट को महत्वपूर्ण मान रहे हैं और शिरकत भी कर रहे हैं. स्थिति ये है कि नई दिल्ली में करीब ढाई लाख विदेशी मेहमान इस समिट में हिस्सा लेने पहुंच चुके हैं. समिट को लेकर भारत में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो ने कहा, "यह एक बहुत बड़ा मौका है और हम भारत को इस समिट को होस्ट करने के मौके के लिए बधाई देते हैं, जिसमें दुनिया भर से इस फील्ड के सबसे जरूरी लोग शामिल हैं. अर्जेंटीना इसे देख रहा है. आज हमें अर्जेंटीना के कुछ राज्यों से कई डेलीगेट्स को होस्ट करने का मौका मिला और वे यहां सीखने आए थे." जाहिर है भारत के जरिये दुनिया आगे के आगे के भविष्य पर चिंतन मनन कर रही है.
राफेल डील की चर्चा
मगर नई दिल्ली सिर्फ इसीलिए चर्चा में नहीं है. आज ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों तीन दिनों के दौर पर भारत पहुंचे. उनकी यात्रा का मकसद एआई समिट से लेकर ट्रेड पर बातचीत तो है ही, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा हथियार सौदों पर है. लड़ाकू विमान राफेल डील पर सभी देशों की नजर है. कारण एक तो ये सौदा तीन लाख अरब डॉलर के करीब का है, जिस पर भारत के मित्र और लड़ाकू विमान बनाने वाले बड़े देशों की नजर थी. वहीं भारत के दुश्मन इस बात से चिंतित हैं कि भारत और फ्रांस राफेल के अलावा और कौन-कौन से डील करने वाले हैं. क्योंकि इस सौदे में हथियारों और इंजन से लेकर AMCA प्रोजेक्ट को लेकर भी बातचीत होने की चर्चा है. चीन से लेकर पाकिस्तान तक के अखबार और वेबसाइट्स डील से जुड़ी हर बात पर नजर रख रहे हैं. वहीं रूस, यूरोप और अमेरिका अपने हाथ से इतनी बड़ी डील के फिसलने की वजह से नजर रख रहे हैं. जाहिर एक-दो दिनों में दुनिया को बहुत कुछ क्लियर हो जाएगा.














