- एक जोरदार क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान, कभी पाकिस्तान में सुधार और नई उम्मीदों के प्रतीक थे
- मैंने इमरान को उनकी जिंदगी के 3 अलग-अलग दौर से जाना. हमारी पहली मुलाकात न्यूयॉर्क में हुई थी
- इमरान की विरासत जटिल है. वह राष्ट्रीय हीरो, सुधारवादी नेता रहे, लेकिन एक कमजोर स्टेट्समैन भी साबित हुए
पाकिस्तान की जेल में बंद क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान के जीवित होने को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है और उनका परिवार उनके प्रूफ ऑफ लाइफ यानी जीवित होने के प्रमाण मांग रहा है. इसी बीच शशि थरूर इमरान खान से हुई अपनी मुलाकातों को याद कर रहे हैं, जब वो उनसे पहली बार मिले थे- एक क्रिकेट स्टार से देश की राजनीति में प्रवेश करने और उसकी ऊंचाईयों पर पहुंच कर देश का प्रधानमंत्री बनने वाले इमरान खान का पाकिस्तान की उथल-पुथल भरी राजनीति पर असर आज भी बहुत गहरा है.
एक जोरदार क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान, कभी पाकिस्तान में सुधार और नई उम्मीदों के प्रतीक थे, उनके बारे में अफवाह है कि रावलपिंडी की अदियाला जेल में उनकी मौत हो गई है. यहां वह 2023 से बंद हैं. उनके बेटे कासिम खान ने अब इमरान के जीवित होने के सबूत मांगने के साथ ही उनकी रिहाई की मांग भी की है. इमरान 72 साल के हो चले हैं. अगर उनकी मौत की पुष्टि हो गई तो एक ऐसे शख्स के जीवन का दुखद अंत होगा, जिसकी पूरी दुनिया में भरपूर तारीफ हुई है, जिसे देश में लीडरशिप मिली, पर अंत में राजनीतिक जुल्म झेलना पड़ा.
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1952 में लाहौर के एक अमीर पश्तून परिवार में जन्मे इमरान खान क्रिकेट के असीम हुनर वाले ऑलराउंडर थे, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मशहूर थे. एचिसन कॉलेज, रॉयल ग्रामर स्कूल वॉर्सेस्टर और केबल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से पढ़े इमरान एक क्रिकेट खिलाड़ी के अलावा बौद्धिक क्षमता के नैसर्गिक गुणों से भी संपन्न थे. जून 1971 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने वाले इमरान ने 1992 में बतौर कप्तान पाकिस्तान को वनडे का वर्ल्ड कप जिताकर अपना 21 साल का क्रिकेट करियर समाप्त किया. ये वो पल था, जिसने उन्हें पाकिस्तान के खेल इतिहास की गाथाओं में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज कर दिया. कप्तान के तौर पर उनकी रणनीतिक समझ, जीतने की जिद और अंदरूनी खींचतान से आपस में बंटी टीम को एकजुट करके मोटिवेट करने की खूबी को बहुत पसंद किया जाता था.
क्रिकेट से रिटायर होने के बाद इमरान खान ने समाजसेवा की तरफ अपना रुख किया. अपनी मां की याद में उन्होंने शौकत खानम कैंसर अस्पताल बनवाया. यह पाकिस्तान में अपनी तरह का ऐसा पहला अस्पताल था, जहां हजारों की संख्या में लोगों का मुफ्त इलाज होता है. अस्पताल को मुख्य तौर पर आम लोगों के चंदे से चलाया गया, जो इमरान की हमेशा रहने वाली लोकप्रियता और लोगों को जोड़ने की उनकी ताकत का सबूत है.
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फिर आया उथल-पुथल और उलटफेर भरा दौर
इमरान खान की जिंदगी का दूसरा हिस्सा पाकिस्तान की राजनीति में बीता. 1996 में उन्होंने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ नाम की राजनीतिक पार्टी की स्थापना की. उनकी पार्टी कई सालों तक हाशिए पर रही, फिर अचानक 2010 के दशक में तेजी से लोकप्रिय हो गई. उनका संदेश — भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, राष्ट्रीय सम्मान और इस्लामिक वेलफेयर — उस पीढ़ी को खूब पसंद आया जो परिवारवाद की राजनीति और राजनीति में सेना के दखल से निराश थी. 2018 में इमरान खान 'एक नया पाकिस्तान' के वादे के साथ देश के प्रधानमंत्री बने. लेकिन उनका कार्यकाल लगातार आर्थिक चुनौतियों, कूटनीतिक मुश्किलों और हर मामले में पाकिस्तानी सेना के दखल (जिसे ‘डीप स्टेट' भी कहा जाता है) के बीच जूझता रहा. आखिरकार यही डीप स्टेट इमरान खान की बर्बादी का कारण बना.
मैंने इमरान खान को उनकी जिंदगी के तीन अलग-अलग दौर से जाना. हमारी पहली मुलाकात न्यूयॉर्क में हुई थी, जब मैं संयुक्त राष्ट्र संघ में था. उनकी बहन यूएन में मेरी सहकर्मी थीं. उन्होंने अपने घर पर एक पार्टी रखी थी. इमरान तब भी एक ग्लोबल क्रिकेट सेलिब्रिटी थे और उस पार्टी में वो भी मौजूद थे. मुझे उनकी गर्मजोशी, उनका सरल अंदाज और लोगों को सहज महसूस कराने की उनकी खूबी ने बहुत प्रभावित किया. वह वैसे दूर-दूर रहने वाले सुपरस्टार नहीं थे जैसा कोई सोच सकता है, बल्कि बेहद जिज्ञासु, मिलनसार और सहज स्वभाव के इंसान थे.
सालों बाद जब इमरान एक रिटायर्ड क्रिकेटर के तौर पर जब अक्सर भारत आते, तब हमारी मुलाकातें अधिक होने लगीं. कई सोशल इवेंट्स में हम दोनों मौजूद होते थे, और कई बार भारतीय टीवी चैनलों के एक ही न्यूज प्रोग्राम में भी साथ आ जाते थे, जहां हमारी जमकर बहस होती थी.
वह बोलने में बेहद स्पष्ट, थोड़े उकसाने वाले और हर मुद्दे- चाहे क्रिकेट हो, राजनीति हो या भारत-पाकिस्तान के रिश्ते- सभी पर बनी-बनाई सोच को चुनौती देने के लिए हमेशा तैयार रहते थे.
दोनों देशों के बीच तनाव होने के बावजूद, भारत में वह काफी लोकप्रिय थे, खासकर महिलाओं के बीच. लोग उन्हें उनके क्रिकेट के शानदार करियर और उनके मिलनसार स्वभाव के लिए बहुत पसंद करते थे.
Photo Credit: FB/Shashi Tharoor
जब इमरान से घंटे भर चली बातचीत...
इमरान खान के साथ मेरी सबसे यादगार मुलाकात 2017 में हुई थी. तब मैं एशियाई सांसदों के सम्मेलन के लिए भारत के संसदीय दल का नेतृत्व करते हुए इस्लामाबाद गया था. इमरान तब विपक्ष के नेता थे, वो मुझसे मिलना चाहते थे. लेकिन पाकिस्तानी सरकार ने सुरक्षा का हवाला देकर मुझे होटल से बाहर जाने की इजाजत नहीं दी.
इमरान बिना डरे खुद ही मुझसे मिलने आने के लिए तैयार हो गए. वो अपने आधा दर्जन साथियों के साथ होटल पहुंचे. मैंने औपचारिक तौर पर उनका स्वागत किया, मेरे साथ मेरे दो बीजेपी के सहयोगी- स्वपन दासगुप्ता और मीनाक्षी लेखी- भी मौजूद थीं, ताकि हमारी इस मीटिंग को लेकर किसी तरह की गलतफहमी न हो.
इसके बाद जो बातचीत हुई, वह करीब एक घंटे चली और वह राजनीति पर नहीं, बल्कि इतिहास पर थी. इमरान ने तब हाल ही में मेरी किताब An Era of Darkness पढ़ी थी और उसके बारे में बात करने को लेकर बेहद उत्साहित थे. उस किताब के कुछ हिस्से और फैक्ट्स को बोलते हुए उन्होंने कुछ बहुत गहरे सवाल पूछे और ब्रिटिश राज के बारे में अपने विचार भी बताए.
उन्होंने मुझसे दोबारा पाकिस्तान आने के लिए कहा और आग्रह किया कि उनकी मेजबानी में इस विषय पर खुलकर एक सार्वजनिक भाषण दूं. हालांकि ऐसा कार्यक्रम कभी हो नहीं पाया, लेकिन उस मुलाकात ने एक गहरी छाप छोड़ी. मुझे लगा कि वो एक ऐसे इंसान हैं, जो अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा के बावजूद दिमाग से जिज्ञासु और उपमहाद्वीप के साझा इतिहास को लेकर इमोशनली जुड़ा हुए हैं.
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दो अलग-अलग पहलू
इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने की कहानी, जो सेना की खुली मदद से संभव हुआ था, खुद विरोधाभासों से भरी कहानी थी. वो भारत के साथ शांति चाहते थे लेकिन सेना ने उनके हाथ बांध रखे थे. उन्होंने आर्थिक सुधारों का वादा किया, पर महंगाई और कर्ज से जूझते रहे. वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते थे, पर उन पर भी आरोप लगे. उनका पतन 2022 में शुरू हुआ, जब सेना की बहुत अधिक बढ़ती दखल से उनकी बढ़ती बेचैनी खुलकर टकराव में बदल गई. पाकिस्तान का 'डीप-स्टेट' (सेना और आईएसआई के दखल से) उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया और उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया गया. इसके बाद उनके खिलाफ लगातार केस, गिरफ्तारी और अलग-थलग करने का सिलसिला चला. 2023 आते ही उन्हें जेल में डाल दिया गया. कई मामलों में दोषी ठहराए गए, जिन्हें आम तौर पर राजनीतिक बदले की कार्रवाई माना गया.
पिछले कुछ सालों में बलपूर्वक उन्हें शांत करने की कोशिश की गई है. परिवार से नहीं मिलने देना, जेल में कठिन परिस्थितियों में रखना और खासकर उनकी पार्टी से भी उन्हें पूरी तरह काट दिया गया. लेकिन इस दौरान इमरान खान कई पाकिस्तानी लोगों के लिए विरोध का प्रतीक बन गए. उनकी बहनों ने अदियाला जेल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया तो बताया जाता है कि उनके साथ पुलिस ने बदसलूकी की. यह साफ तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान की वर्तमान सरकार किस हद तक उनके राजनीतिक प्रभाव को मिटाना चाहती है.
उनकी मौत को लेकर अफवाहें अभी तक स्पष्ट नहीं हैं. गड़बड़ी के आरोप कई हैं, कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सेना और खुफिया तंत्र के कुछ लोगों ने मार दिया है. पर आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुप्पी अपने आप में बहुत कुछ कहती है. अगर यह सच है, तो जेल में उनकी मौत पाकिस्तान के टॉर्चर और राजनीतिक इतिहास का एक काला चैप्टर लिख देगी. यह उन खतरों की याद दिलाता है जिसका सामना वहां की सत्ता को चुनौती देने वालों को पहले भी करना पड़ा है.
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वो सपने जो अधूरे रह गए...
इमरान खान की विरासत जटिल है. वह राष्ट्रीय हीरो थे, दुनिया भर में मशहूर थे, सुधारवादी नेता थे, लेकिन एक कमजोर स्टेट्समैन भी थे. उन्होंने लाखों लोगों को प्रेरित किया, कई को निराश किया लेकिन अंत तक डटकर खड़े रहे. उनका जीवन यह दिखाता है कि चाहे खेल हो, व्यक्तिगत लक्ष्य हों, देशभक्ति या राजनीति — महत्वाकांक्षा हमेशा जरूरी होती है. उनकी मौत, अगर सच साबित हुई तो यह न केवल पाकिस्तान के लिए बल्कि उन सभी के लिए एक दुखद घटना होगी, जो कठिन समय में उसूलों पर आधारित नेतृत्व में यकीन करते हैं. यह एक और करिश्माई और जबरदस्त पाकिस्तानी नेता की याद दिलाता है- जुल्फिकार अली भुट्टो- जिन्होंने सोचा था कि वो ताकतवर सेना से आगे निकल सकते हैं, पर उन्हें अपने भ्रम की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.
मेरे लिए, इमरान वही इंसान रहेंगे जो इस्लामाबाद में मेरे होटल में राजनीति पर बात करने नहीं बल्कि इतिहास पर चर्चा करने आए थे. विचारों, जुनून और पक्के यकीन वाले इंसान, जिनके देश को लेकर सपने को आखिरकार उसी डीप स्टेट की ताकतों ने तोड़ दिए जिनके इस्तेमाल से वो खुद सत्ता तक पहुंचे, फिर उन्हें नियंत्रित करना चाहते थे और अंत में उससे पार नहीं पा सके.
(यह लेख शशि थरूर ने अंग्रेजी में लिखा है, यहां हिंदी अनुवाद)













