बगावत कुचलने को खामेनेई ने उतारी अपनी वफादार फौज, जानें ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स क्यों इतने कुख्यात

IRGC सिर्फ एक सेना नहीं, बल्कि ईरानी शासन की वैचारिक रीढ़ मानी जाती है. रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नियमित सेना की तुलना में कहीं ज्यादा ट्रेंड, आधुनिक हथियारों से लैस और आर्थिक रूप से संपन्न होते हैं. ईरान के सैन्य बजट का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं पर खर्च होता है.

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  • इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की स्थापना 1979 में खामेनेई ने की थी और ये उन्हीं के प्रति वफादार है
  • IRGC के पास थल सेना, नौसेना, हवाई क्षमताएं और बड़ा खुफिया नेटवर्क है. बजट का बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च होता है
  • कई पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने IRGC पर दमन और आतंकवाद का आरोप लगाते हुए बैन लगा रखा है
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ईरान में विद्रोह को कुचलने के लिए सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई सरकार ने अपने वफादार इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC को मोर्चे पर उतार दिया है. इस्लामी सरकार और सुप्रीम लीडर की रक्षा करने के लिए खासतौर से बने इस सैन्य संगठन ने प्रदर्शनकारियों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया है. करीब 2500 प्रदर्शनकारियों की मौत की बात ईरानी अधिकारी खुद कबूल कर रहे हैं. ऐसे में ये जानना दिलचस्प होगा कि आखिर ये IRGC है क्या, इसका असल काम क्या है, और क्यों इसे बैन करने की मांग होती रही है. 

क्या है IRGC और इसकी ताकत?

  • रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की मिलिट्री की वैचारिक विंग है. 
  • रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को फारसी में "पासदारान" कहा जाता है. 
  • IRGC की स्थापना 1979 में अयातुल्ला रुहोल्लाह खामेनेई ने की थी. 
  • इसमें डेढ़ लाख से लेकर 2 लाख तक सैनिक शामिल बताए जाते हैं. 
  • IRGC के पास अपनी थल सेना, नौसेना और हवाई क्षमताएं क्षमताएं मौजूद हैं.
  • इसका सीधा कंट्रोल ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के हाथों में है. 

सेना से ज्यादा ट्रेंड, आधुनिक हथियारों से लैस

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नियमित सेना की तुलना में कहीं ज्यादा ट्रेंड, आधुनिक हथियारों से लैस और आर्थिक रूप से संपन्न होते हैं. IRGC महज एक सेना नहीं, बल्कि ईरान शासन की वैचारिक रीढ़ मानी जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य इस्लामिक क्रांति के विचारों का संरक्षण और प्रसार करना था. यह एक ऐसी फौज है जो देश की नहीं बल्कि एक विचारधारा की सेवा करती है. 

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अर्धसैनिक बल का करते हैं इस्तेमाल

अपने शर्तों को लागू करवाने के लिए रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अर्धसैनिक बल बासिज (Basij) का भी इस्तेमाल करते हैं. बासिज में मुख्य रूप से युवा ईरानी शामिल होते हैं और यह संगठन समाज के हर स्तर और हर संस्थान में फैला हुआ है. माना जाता है कि बासिज के सदस्यों की संख्या 6 लाख से 9 लाख के बीच है. IRGC के पास ईरान का सबसे व्यापक और प्रभावी खुफिया नेटवर्क है. यह नेटवर्क इतना ताकतवर है कि विरोध प्रदर्शन शुरू होने के कुछ ही मिनटों के अंदर उसके नेटवर्क को ध्वस्त करने में सक्षम है. 

देश के अंदर ही नहीं, बाहर भी एक्टिव

IRGC न सिर्फ ईरान की सीमाओं के अंदर सक्रिय है बल्कि यह पूरे इलाके में तेहरान के सहयोगियों जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह और इराक में ईरान समर्थक मिलिशिया के साथ मुख्य कड़ी का काम करती है. पिछले साल जून में खामेनेई ने मोहम्मद पाकपुर को आईआरसीजी का प्रमुख नियुक्त किया था, जो 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के अनुभवी जनरल हैं.

IRGC को "साम्राज्य के अंदर साम्राज्य" कहा जाता है क्योंकि ईरान की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर इनका कंट्रोल रहता है. इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, टेलीकम्यूनिकेशन और फाइनेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में इनका लगभग एकाधिकार है. जानकारों का दावा है कि IRGC का सालाना सैन्य बजट करीब 6 से 9 अरब डॉलर के बीच है, जो ईरान के कुल आधिकारिक सैन्य बजट का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है. प्रभावी रूप से देखा जाए तो यह संगठन ईरान की अर्थव्यवस्था को अपनी उंगलियों पर नचाता है.

विरोध प्रदर्शनों को कुचलने में माहिर

जानकारों के मुताबिक, ईरान में जब कभी प्रदर्शन शुरू होते हैं तो रिवोल्यूशनरी गार्ड्स बैकग्राउंड में रहकर बासिज के जरिए काम करते हैं, लेकिन जब विरोध बढ़ता है तो वो अपनी ग्राउंड फोर्स और स्पेशल यूनिटों को भी मैदान में उतार देते हैं. मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से बचने के लिए कई बार ये गार्ड्स बिना वर्दी के साधारण कपड़ों में ऑपरेशन को अंजाम देते हैं.

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दमन के आरोप और बैन करने की मांग

पश्चिमी देश और मानवाधिकार संगठन रिवोल्यूशनरी गार्ड्स पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई और दमन का आरोप लगाते रहे हैं. अपनी गतिविधियों की वजह से IRGC अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. साल 2019 में अमेरिका ने इसे एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था. नवंबर 2024 में ऑस्ट्रेलिया ने भी इसे आतंकवाद का प्रायोजक करार दिया, क्योंकि उसके ऊपर यहूदी समुदाय पर हमलों की साजिश रचने का आरोप लगा था. यूरोप में भी इसे आतंकी समूह घोषित करने की मांग होती रही है. खासकर जर्मनी इसकी विदेशी यूनिट कुद्स फोर्स को बैन करने का समर्थन करता है.

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