इस बात में दो राय नहीं है कि चीन ने जून 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष 'ऑपरेशन सिंदूर' का बारीकी से अध्ययन किया है. उसका मकसद यह समझना था कि भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तान की मिसाइलों के हमलों का सामना कैसे किया. इस बीच पिछले हफ्ते 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' ने उस बात की तस्दीक कर दी जिसका भारत को पहले से अंदेशा था. चीन ने इस जंग में पाकिस्तान को मौके पर ही तकनीकी मदद मुहैया कराई थी.
चेंगदू एयरक्राफ्ट डिजाइन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ने पाकिस्तान द्वारा खरीदे गए J-10CE फाइटर जेट बनाए हैं. उनके इंजीनियर्स ने बताया कि भारत-पाक संघर्ष के दौरान उन्हें फाइटर जेट की क्षमता का आकलन करने का जिम्मा दिया गया था. चीन मुमकिन तौर पर पाकिस्तानी जेट्स और अपने बेचे हुए एयर डिफेंस सिस्टम से युद्ध का डेटा हासिल करने में कामयाब रहा होगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि ताइवान जैसे देशों से भविष्य में संभावित टकरावों को ध्यान में रखते हुए बीजिंग ने एक लंबी फेहरिस्त तैयार की है. इसमें दुश्मन के ठिकानों की पहचान करना और 'मेवेन स्मार्ट सिस्टम' जैसे AI-आधारित प्रोग्राम के जरिए सटीक निशाना लगाने की तकनीक शामिल है. इसके साथ ही, चीन यह भी देख रहा है कि व्हाइट हाउस कैसे घरेलू राजनीतिक दबाव और अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ बिगड़ते रिश्तों को संभाल रहा है.
चीन अमेरिकी हवाई ताकत से क्या सीख रहा है?
हमले के नजरिए से देखें तो ज्यादातर जानकारों का मानना है कि चीन काफी मजबूत स्थिति में है. चीन ने अपनी मिसाइल ताकत और हाइपरसोनिक हथियारों में काफी इजाफा किया है. वह अपने परमाणु हथियारों का भंडार भी बढ़ा रहा है. यह एक ऐसी हकीकत जिसे अमेरिका नजरअंदाज नहीं कर सकता.
स्वीडन के एक संस्थान (SIPRI) के मुताबिक, चीन 2023 से हर साल अपने बेड़े में लगभग 100 नए परमाणु हथियार जोड़ रहा है. चीन की नौसेना भी अब सिर्फ तटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जहाजों की संख्या के हिसाब से वह दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना बन चुकी है.
हालांकि, चीनी वायुसेना के एक पूर्व कर्नल फु कियानशाओ ने 'सीएनएन' को बताया कि अब एयर डिफेंस पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "हमें अपनी रक्षात्मक खामियों को पहचानने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि भविष्य के युद्धों में हम अजेय रहें."
ईरान के 'असिमेट्रिक वारफेयर' (कम खर्चीले हथियारों का युद्ध) मॉडल, जैसे कि सस्ते और बड़े पैमाने पर बने 'शाहिद' ड्रोन्स ने शुरुआत में अमेरिकी रक्षा प्रणालियों को परेशानी में डाल दिया था. चीन ने गौर किया है कि कैसे इन सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों ने अमेरिकी सुरक्षा घेरे को तोड़कर बिजली और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया.
दूसरी तरफ, चीन ने अमेरिका के 'लुकास' (LUCAS) जैसे सस्ते लड़ाकू ड्रोन्स के इस्तेमाल पर भी नजर रखी है. कियानशाओ के मुताबिक, जंग में सिर्फ सैन्य ठिकाने ही नहीं बल्कि स्टील प्लांट और पुलों जैसे बुनियादी ढांचों को निशाना बनाना भी रणनीति का हिस्सा है. चीन अब इन्ही सब चीजों को AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के जरिए और घातक बनाने पर काम कर रहा है.
चीन ने 'ऑपरेशन सिंदूर' से क्या सीखा होगा?
भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कुछ दिनों के टकराव में चीन को यह देखने का मौका मिला कि दिल्ली का एयर डिफेंस सिस्टम कैसे काम करता है. भारत अपना 'सुदर्शन चक्र' यानी एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार कर रहा है जो इजरायल के 'आयरन डोम' जैसा ही असरदार है.
क्या इसका आखिरी मकसद ताइवान है?
चीन फिलहाल दो अलग-अलग प्रणालियों को परख रहा है. ईरान में अमेरिकी 'पैट्रियट' और भारत में रूस का 'S-400'. ये दोनों एक-दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी हैं. इन दोनों का बारीकी से जायजा लेना चीन के ताइवान पर कब्जे के इरादों से जुड़ा हो सकता है.
ताइवान के विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने अब ऐसी फौज तैयार कर ली है जो तकनीक में अमेरिका की बराबरी कर सकती है और तादाद में ईरान की तरह हमला कर सकती है. अगर भविष्य में टकराव होता है, तो चीन को उम्मीद है कि अमेरिका ताइवान की मदद जरूर करेगा.
चीन ईरान की जंग को सिर्फ तेल की सप्लाई (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज) के लिए नहीं देख रहा, बल्कि वह यह समझ रहा है कि ताइवान जैसे किसी भी मामले में जीत 'त्वरित और निर्णायक' होनी चाहिए, इससे पहले कि वह हार-जीत के लंबे और थकाऊ सिलसिले में बदल जाए.














