- PAK के बलूचिस्तान प्रांत में हाल ही में भीषण हिंसा के दौरान बलूच लिबरेशन आर्मी के 145 विद्रोही मारे गए हैं.
- क्वेटा, ग्वादर, मस्तुंग, नोष्की और तुंप जिलों में सेना और पुलिस ने बड़े पैमाने पर कॉम्बिंग ऑपरेशन चलाए हैं.
- बलूचिस्तान कभी हिंदू, बौद्ध और पारसी सभ्यताओं का प्रमुख केंद्र था और अत्यंत समृद्ध क्षेत्र रहा है.
पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत इन दिनों भीषण हिंसा और अस्थिरता से गुजर रहा है. पिछले सप्ताह पूरे प्रांत में बलूच लिबरेशन आर्मी के 145 विद्रोही मारे गए हैं. यह हाल के वर्षों की सबसे भीषण हिंसा मानी जा रही है. क्वेटा, ग्वादर, मस्तुंग, नोष्की, तुंप सहित कई जिलों में हमलों के बाद सेना और पुलिस ने बड़े पैमाने पर कॉम्बिंग ऑपरेशन चलाया. स्थिति इतनी गंभीर रही कि इंटरनेट सेवाएं बंद, परिवहन रोका गया और सार्वजनिक जीवन लगभग ठप हो गया.
लेकिन जिस प्रांत में आज बंदूकें और धमाकों की गूंज है, वही भूमि कभी सांस्कृतिक वैभव और धार्मिक विविधता का केंद्र हुआ करती थी.
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कभी बलूचिस्तान में था हिंदुओं का साम्राज्य
आधुनिक पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत को आज भले ही इस्लामी संस्कृति के लिए जाना जाता हो, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यही क्षेत्र कभी हिंदू, बौद्ध और पारसी (ज़ोराष्ट्रियन) सभ्यताओं का प्रमुख केंद्र था. भौगोलिक रूप से कठिन लेकिन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध इस क्षेत्र पर सदियों तक हिंदू राजवंशों और क्षत्रपों का प्रभाव रहा.
हिंगलाज माता का मंदिर- प्राचीन इतिहास का जीवित प्रमाण
बलूचिस्तान की इस विरासत का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य है हिंगलाज माता मंदिर, जिसे शक्तिपीठों में एक माना जाता है. हिंगोल नेशनल पार्क की गुफा में स्थित यह मंदिर आज भी हिंदू आस्था का बड़ा तीर्थ है और यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र में कभी हिंदू शासन और संस्कृति कितनी मजबूत थी.
7वीं शताब्दी के बाद बदल गया धार्मिक स्वरूप
इतिहासकार बताते हैं कि 7वीं शताब्दी में अरबों के आक्रमण के बाद बलूचिस्तान का सामाजिक‑धार्मिक ढांचा तेजी से बदल गया. इस्लाम का प्रसार शुरू हुआ और धीरे‑धीरे पूरा क्षेत्र इस्लामी प्रभाव में आ गया. इससे पहले यहां हिंदू, बौद्ध और पारसी समुदायों की गहरी उपस्थिति थी, जिनका सांस्कृतिक प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा.
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हिंगलाज शक्तिपीठ- सभ्यता के सतत अस्तित्व का प्रतीक
कहा जाता है कि हिंगलाज माता का मंदिर सहस्राब्दियों पुराना है. मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां देवी सती का ब्रह्मरंध्र (सिर के सबसे ऊपरी हिस्सा) गिरा था. कठिन पहाड़ी भूभाग के कारण यह स्थल आक्रमणों और विनाश से बचा रहा और आज भी अपने प्राचीन स्वरूप में विद्यमान है.
बलूचिस्तान के इतिहास को पढ़ने‑समझने वालों के लिए हिंगलाज मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं बल्कि उस दौर की साझा, बहु‑धार्मिक और समृद्ध सभ्यता का जीवित प्रमाण है. एक ऐसा दौर जब यह क्षेत्र हिंदू और बौद्ध परंपराओं के प्रभाव में खिलता‑फलता था. लेकिन आज स्थिति उलट है. आज बलूचिस्तान में शहबाज सरकार के खिलाफ विद्रोह की गूंज है और अब यह जगह जंग का अखाड़ा बन रही है.













