- अमेरिका की प्राथमिकता मिडिल ईस्ट में लंबी जंग से बचना और नुकसान सीमित कर रणनीतिक रूप से बाहर निकलना है.
- इजरायल ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को जारी रखते हुए इसे अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है.
- अमेरिका और इजरायल की रणनीति में फर्क उनके घरेलू राजनीतिक दबाव और सुरक्षा जरूरतों के कारण है.
ईरान के खिलाफ चल रही जंग में अमेरिका और इजरायल के सुर अब अलग-अलग नजर आ रहे हैं. एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वो डील हो या न हो, इस युद्ध से बाहर निकलने को तैयार हैं. वहीं दूसरी ओर बेंजामिन नेतन्याहू साफ कर चुके हैं कि इजरायल ईरान के 'आतंकी शासन' को कुचलने तक अपने हमले जारी रखेगा. ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है, क्या इजरायल इस जंग में अकेला पड़ता जा रहा है?
अमेरिका का बदला रुख: 'डील हो या नहीं, हम निकल सकते हैं'
ट्रंप का बयान इस ओर इशारा करता है कि अमेरिका अब लंबी जंग में फंसना नहीं चाहता. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और संसाधनों की कमी की खबरों ने भी दबाव बढ़ाया है. अमेरिका की प्राथमिकता अब नुकसान सीमित करना और रणनीतिक एग्जिट बनाना दिख रही है. साफ है कि वॉशिंगटन अब 'फुल-स्केल वॉर' से दूरी बनाना चाहता है.
इजरायल का सख्त स्टैंड: 'ईरान को खत्म किए बिना नहीं रुकेंगे'
वहीं दूसरी ओर नेतन्याहू ने दो टूक कहा है कि ईरान के खिलाफ अभियान जारी रहेगा. इजरायल इसे अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है. इस जंग में नेतन्याहू का फोकस ईरान के सैन्य ढांचे और सत्ता पर सीधा दबाव बनाना है. यानी जहां अमेरिका पीछे हट रहा है, इजरायल लड़ाई तेज करने के मूड में है.
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अलग-अलग रणनीति क्यों?
1. अमेरिका की मजबूरी
अमेरिका और इज़रायल की रणनीतियों में फर्क उनकी परिस्थितियों और प्राथमिकताओं की वजह से है. अमेरिका पर घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव लगातार बना रहता है, जिससे वह किसी भी लंबी जंग में सीधे फंसने से बचना चाहता है. इसके अलावा, लंबे सैन्य संघर्ष से आर्थिक बोझ और सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ता है. वैश्विक स्तर पर भी अमेरिका अपनी छवि और सहयोगी देशों की थकान को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाता है, क्योंकि निरंतर युद्ध उसकी लीडरशिप को कमजोर कर सकता है.
2. इजरायल की बाध्यता
वहीं, इजरायल की स्थिति अलग है. वह सुरक्षा खतरे को सीधे अपने अस्तित्व से जुड़ा मानता है और ईरान को क्षेत्रीय स्तर पर अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है. इजरायल के लिए पीछे हटना न केवल रणनीतिक बल्कि राजनीतिक हार भी मानी जाएगी. उसकी घरेलू राजनीति और सुरक्षा नीति में कठोर रवैया जरूरी माना जाता है, इसलिए वह आक्रामक रुख अपनाने से पीछे नहीं हटता.
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क्या इजरायल अकेला पड़ रहा है?
स्थिति पूरी तरह अकेलेपन की नहीं है, लेकिन संकेत जरूर मिल रहे हैं. इस जंग में अमेरिका का पीछे हटना इजरायल के लिए एक बड़ा झटका ही है. खाड़ी देशों का समर्थन बयानबाजी तक सीमित है जबकि यूरोपीय देश पहले से ही युद्ध के खिलाफ हैं. ऐसे में अगर अमेरिका सैन्य रूप से पीछे हटता है, तो इजरायल को ऑपरेशन अकेले ही संभालना पड़ सकता है.
आगे क्या?
अमेरिका 'डील या डि-एस्केलेशन' की तरफ बढ़ सकता है. जबकि इजरायल हमले तेज करने की प्लानिंग में है. ईरान जवाबी कार्रवाई जारी रखेगा. मतलब साफ है, जंग खत्म होने के बजाय अब और अनिश्चित और खतरनाक मोड़ पर पहुंच सकती है.
अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक दरार अब खुलकर सामने आ रही है. जहां ट्रंप पीछे हटने का रास्ता तलाश रहे हैं, वहीं नेतन्याहू 'आखिरी वार' के मूड में हैं. अगर यही स्थिति बनी रही, तो इजरायल को इस जंग में ज्यादा जोखिम अकेले उठाना पड़ सकता है.













