न बादल फटा, न झील टूटी, श्रीकंठ पर्वत पर मोरेन के नीचे जमा पानी और ग्लोबल वार्मिंग ने मचाई थी तबाही

वाडिया संस्थान के अध्ययन में दावा किया गया है कि 5 अगस्त 2025 की धराली आपदा क्लाउडबर्स्ट या ग्लेशियर झील फटने से नहीं, बल्कि मोरेन के नीचे जमा पानी और ग्लोबल वार्मिंग के असर से हुई थी.

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  • 05 अगस्त 2025 को धराली आपदा सामान्य क्लाउडबर्स्ट या ग्लेशियर झील फटने से नहीं हुई थी, बल्कि अन्य कारण थे
  • श्रीकंठ पर्वत की भूआकृति और लगातार बारिश के कारण अस्थिर तीव्र ढलान सक्रिय होकर भारी तबाही हुई थी
  • उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार हुई बारिश ने मोरेन मलबे को क्षरण कर अस्थायी झीलों के टूटने का कारण बनी
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05 अगस्त 2025 को धराली में आई आपदा की वजह क्या थी, इस पर वैज्ञानिकों की अलग अलग राय आयी थी. लेकिन हाल ही में वड़िया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों का दावा है कि 5 अगस्त 2025 में आई धराली आपदा की वजह एक सामान्य क्लाउडबर्स्ट या ग्लेशियर झील फटने के कारण नहीं हुई बल्कि श्रीकंठ पर्वत के  भारी मात्रा में मोरेन (ग्लेशियरों की ओर से छोड़ा गया ढीला मलबा) के नीचे पानी जमा हो रहा था, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग और तापमान के कारण उस जगह तेजी से बर्फ पिघल गई और पानी जमा हो गया. रिपोर्ट में श्रीकंठ पर्वत की विशेष भूआकृति के चलते निरंतर वर्षा के प्रमाण मिले हैं, जिसने अस्थिर तीव्र ढलानों को सक्रिय कर दिया था और हर्षिल ,धराली में तबाही मची थी.

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में 05 अगस्त 2025 को धराली, हर्षिल और सुक्की क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ एक सामान्य "क्लाउडबर्स्ट" या बादल "फटना" नहीं थी. वैज्ञानिकों के अनुसार यह कई प्राकृतिक और मानवजनित कारणों के एक साथ सक्रिय होने का परिणाम था. वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों के रिसर्च पेपर में धराली पूरी घटना का विस्तृत विश्लेषण किया गया है. इसमें मुख्य रूप में श्रीकंठ पर्वत की विशेष भूआकृति के चलते निरंतर वर्षा के प्रमाण मिले हैं, जिसने अस्थिर तीव्र ढलानों को सक्रिय कर दिया था.

वड़िया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ मनीष मेहता के मुताबिक 05 अगस्त 2025 को दोपहर लगभग 1:30 बजे धराली क्षेत्र में स्थित खीर गाड़ में अचानक भीषण बाढ़ और मलबे का सैलाब आया. इसके एक घंटे के भीतर ही हर्षिल के पास तेल गाड़ और सुक्की के पास भेला गाड़ में भी अचानक बाढ़ आ गई. ये तीनों नाले अलग-अलग जगह से पानी से लाते हैं. इतने कम समय में तीनों नालो में ने एक साथ भारी मात्रा में पानी और मलबा आने की घटना को वैज्ञानिकों ने असामान्य घटना मानी है.

रिसर्च पेपर में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यहां निकला, जिसमे धराली की घटना को सीधे तौर पर बादल फटने या ग्लेशियर झील फटने के कारण नहीं हुई थी बल्कि डॉ मनीष मेहता के मुताबिक मौसम विज्ञान विभाग के रिकार्ड बताते हैं कि 3 से 5 अगस्त 2025 के बीच निचले इलाकों में कोई भारी बारिश रिकॉर्ड नहीं हुई थी बल्कि ज्यदातर जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश हुई. हर्षिल में तो मात्र 6.5 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई. वही उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थिति असामान्य रूप से अलग थी. ऊंचाई वाले क्षेत्रों के आंकड़ों के अनुसार 2540 मीटर की ऊंचाई पर तेल कैंप क्षेत्र में आपदा के तीन दिनों में 108 एमएम वर्ष रिकार्ड की गई, जबकि 3763 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर बेस कैंप क्षेत्र में 88.6 एमएम वर्षा पाई गई.

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इसी लगातार बारिश  के दौर ने ढलानों पर जमा अस्थिर मलबे को सक्रिय कर दिया. इसके अलावा रिसर्च पेपर में बताया गया कि खीर गाड़, तेल गाड़ और भेला गाड़ की घाटियां पुराने ग्लेशियरों से निर्मित हैं. चूंकि ये घाटियां पुराने ग्लेशियरों से बनी हैं, इसलिए यहां भारी मात्रा में मोरेन (ढीला मलबा), चट्टानी अवशेष और बर्फ जमा थे. 3500 मीटर से ऊपर वनस्पति (पेड़-पौधे) न होने के कारण लगातार बारिश ने इस मलबे का तेजी से क्षरण किया. जगह-जगह अस्थायी झीलें बनीं और जब पानी का दबाव बढ़ा, तो वे अवरोध टूट गए. साथ ही कई स्थानों पर अस्थायी झीलें बन गई और दबाव बढ़ने पर अवरोध न ध्वस्त हो गए, बल्कि पूरे वेग के साथ निचले क्षेत्रों में तबाही बनकर टूट पड़े.

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इसरो और एनआरएससी की सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि इस मलबे ने नीचे आकर करीब 02 लाख वर्गमीटर भूभाग को पूरी तरह पाट दिया. रिसर्च पेपर के अनुसार मानसूनी नमी से भरे बादल जब दक्षिण दिशा से हिमालय की तरफ बढ़ते हैं तो उन्हें श्रीकंठ जैसी ऊंची और खड़ी पर्वत श्रृंखलाओं से टकराना पड़ता है, यहां भी ऐसा ही हुआ. जिस कारण हवाएं और ऊंची उठीं और वहां उन्हें तेजी से कम होते तापमान का सामना करना पड़ा, इससे वर्षा का एक लंबा दौर शुरू हो गया. रिसर्च पेपर में एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को भी उठाया गया. बताया गया कि धराली का प्राचीन कल्प केदार मंदिर इसका सबसे बड़ा गवाह है.

वर्ष 1866 की तस्वीरों में यह मंदिर पूरा खुला था, 2023 तक यह मलबे में आधा दब चुका था, और 2025 की इस बाढ़ के बाद यह लगभग पूरी तरह मलबे में समा गया. इससे साबित होता है कि यह क्षेत्र सदियों से मलबे वाली बाढ़ झेलता आ रहा है और यहां बार-बार मलबे वाली बाढ़ आती रही है. वर्तमान बसावट प्राकृतिक खतरे वाले इलाके में की गई थी. शोध के अनुसार वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी सबक नहीं लिया गया. नदी किनारे होटल और रिसार्ट बनते रहे. आलुवियल फैन (पुराने मलबे से बने मैदान) पर निर्माण हुए. नदी के प्राकृतिक बहाव को रोकने वाली रिटेनिंग वाल बनाई गईं. हर्षिल में सेना का कैंप भी अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में बना था. वैज्ञानिकों  ने कहा कि इन निर्माणों ने पानी के प्राकृतिक रास्ते बदले, मलबा जमा होने में मदद की और आपदा की तीव्रता बढ़ा दी.

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