उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में होने तय हैं और उससे पहले सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गए हैं. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी इस चुनाव के लिए अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने रायबरेली से अपनी रथ यात्रा की शुरुआत की दी है, तो कांग्रेस हर जिले में संगठन सृजन कार्यक्रम के जरिए अपना संगठन मजबूत करने में लगी है. कांग्रेस का कहना है कि वो उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों पर अपना संगठन खड़ा कर रही है, क्योंकि जब तक कांग्रेस का संगठन मजबूत नहीं होगा, तब तक वो समाजवादी पार्टी की भी मदद नहीं कर पाएंगे.
कांग्रेस का फोकस दलित और ब्राह्मण वोटों के अलावा अति पिछड़ा वोटरों में पैठ बनाने की है. जहां तक मुस्लिम वोटों की बात है, कांग्रेस में आजकल मुस्लिम नेताओं को बड़े पैमाने पर शामिल किया जा रहा है और इस काम का जिम्मा पार्टी ने अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के इमरान प्रतापगढ़ी को दे रखा है, जिसमें इमरान मसूद जैसे मुस्लिम सांसद भी शामिल हैं.
यूपी में सपा के साथ गठबंधन में 150 सीटों की मांग करेगी कांग्रेस
कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने A कैटेगरी की 150 सीटों को तय कर लिया है और गठबंधन की बातचीत में इतनी ही सीटों की मांग करेगी. लेकिन सूत्रों का ये भी कहना है कि कांग्रेस सीटों की संख्या को लेकर लचीला रुख़ रख सकती है, मगर पार्टी किसी भी हालत में 100 से कम सीटों पर तैयार नहीं होगी. कांग्रेस का कहना है कि 2019 की लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा का ऐतिहासिक गठबंधन हुआ था, जिसमें राष्ट्रीय लोकदल भी शामिल हुई थी, तब समाजवादी पार्टी को केवल 5 सीटें ही मिली थी, कांग्रेस तब अकेले लड़ी थी और उसे एक सीट पर सफलता मिली थी. जबकि 2024 में सपा और कांग्रेस मिलकर लड़ी तो आज सपा के पास 37 और कांग्रेस के पास 6 सांसद हैं.
कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि सपा को इतनी सारी सीटें कांग्रेस की वजह से मिली हैं. यही वजह है कि दोनों दलों के नेता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन साथ चुनाव लड़ेगा और वो भी अखिलेश यादव के नेतृत्व में. वहीं कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र गौतम ने एनडीटीवी से कहा कि हमारा लक्ष्य उत्तर प्रदेश की कुर्सी नहीं, बल्कि दिल्ली की कुर्सी है. हालांकि कांग्रेस सीटों के बंटवारे में झुकने वाली नहीं है.
सीटों के दबाव को लेकर दोनों पार्टियों के बीच बयानबाजी तेज
सीटों का ही दबाव है कि दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच बयानबाजी रुकने का नाम ही ले रही है. हालांकि दोनों पार्टियों ने अपने नेताओं को बयान देते वक्त संयम बरतने की बात कही है, मगर बयानबाजी रुक नहीं रही है. अखिलेश यादव ने अपने रथ यात्रा की शुरुआत रायबरेली से की, तो कांग्रेस के नेताओं ने भी कहना शुरू कर दिया है कि हम भी अपनी यात्रा मैनपुरी, इटावा से शुरू करेंगे.
इस पर समाजवादी पार्टी का बयान आया कि कोई भी कहीं से भी अपने प्रचार की शुरुआत कर सकता है, मगर कांग्रेस को इटावा, मैनपुरी में कोई वोट नहीं मिलेगा. कहने का मतलब है कि जब तक कांग्रेस और सपा के बीच सीटों का बंटवारा तय नहीं हो जाता, तब तक बयानबाजी होते रहेंगे. जहां तक गठबंधन की बातचीत की बात है तो उस पर अंतिम निर्णय राहुल गांधी और अखिलेश यादव की मुहर लगने के बाद ही होगी, तब तक दबाव की यह राजनीति चलती रहेगी.
इसे भी पढ़ें: राहुल, अखिलेश और प्रियंका.. संसद में सपा-कांग्रेस की सीक्रेट मीटिंग, बनी यूपी चुनाव की रणनीति
इसे भी पढ़ें: यूपी में चुनाव में सपा से खींचतान के बीच कांग्रेस को मिला एक और साथी? दिल्ली में राहुल गांधी से अहम मुलाकात