- मऊ ज़िले की पहचान अब मुख़्तार अंसारी से हटाकर महादेव मंदिर के माध्यम से बदलने की पहल हो रही है
- तमसा नदी के किनारे बिना सरकारी खर्च के एक नया कॉरिडोर विकसित किया गया है
- मंत्री एके शर्मा की पहल पर सीएसआर फंड से महादेव की 61 फीट ऊंची मूर्ति और कॉरिडोर का निर्माण कराया गया है
एक दौर था जब उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसे मऊ ज़िले की पहचान माफियाराज से होती थी, ये शहर मुख़्तार अंसारी के दबदबे की वजह से जाना जाता था. अब न मुख़्तार रहा और न माफ़ियाराज. लेकिन मऊ का ज़िक्र होते ही जहन में मुख्तार की छवि बन जाती है. ऐसे में इस पहचान को बदलने की एक पहल की जा रही है. अब मऊ की पहचान मुख्तार नहीं बल्कि महादेव की विशालकाय प्रतिमा और उनका मंदिर होगी. भोलेनाथ के मंदिर के साथ-साथ काशी की तर्ज पर बने घाट ने शहर का परसेप्शन बदलने का काम किया है.
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जहां था कचरा, वहां अब घाट
दरअसल मऊ ज़िले में तमसा नदी के किनारे एक नया कॉरिडोर विकसित किया गया है, वो भी बिना सरकारी खर्च के. जिस जगह ये कॉरिडोर बनाया गया है, वहां कभी कचरे का ढेर हुआ करता था. लेकिन आज न सिर्फ खूबसूरत गुलाबी पत्थरों से घाटों का सौंदर्यीकरण किया गया है बल्कि भोलेनाथ की 61 फीट ऊंची प्रतिमा दूर से सभी का ध्यान आकर्षित कर रही है.
बिना सरकारी फंड के हुआ काम
योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और पीएम मोदी के खास पूर्व आईपीएस एके शर्मा की पहल पर ये नया घाट विकसित किया जा रहा है. मऊ के ही रहने वाले एके शर्मा ने सीएसआर फंड से पहले महादेव की 61 फीट ऊंची मूर्ति बनवाई और अब 9 करोड़ 38 लाख की लागत से कॉरिडोर का निर्माण कराया है. नदी के एक तरफ बने कॉरिडोर का शनिवार को लोकार्पण किया गया, जल्द नदी की दूसरी तरफ भी इसी तर्ज पर घाट तैयार कराया जाएगा.
मंत्री कर रहे चुनावी तैयारी
मंत्री एके शर्मा ने कहा कि मऊ की पहचान बदलने की कोशिश की जा रही है. कभी इस ज़िले को लोग माफिया के नाम से जानते थे जबकि ये महादेव की नगरी है. एक दौर में यहां गुंडों का राज था, उस पहचान को बदलने की कोशिश की जा रही है. बता दें कि मऊ के रहने वाले एके शर्मा गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रह चुके हैं. पीएम मोदी के करीबी होने की वजह से नौकरी छोड़ राजनीति में आए और वर्तमान में विधान परिषद के सदस्य और कैबिनेट मंत्री हैं. माना जा रहा है कि अगले साल के विधानसभा चुनाव में वह दांव आज़मा सकते हैं.
मऊ के इतिहास पर एक नजर
मऊ ज़िला साल 1988 में अस्तित्व में आया था. आजमगढ़ से अलग होकर बने इस ज़िले में विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ था. 90 के दशक में कल्पनाथ राय केंद्रीय संचार मंत्री बने तो मऊ ने बड़ी-बड़ी सरकारी इमारतें भी देखीं, फ्लाइओवर और ब्रिज बनाये गए, बिजली की सुविधा से लेकर टेलीफ़ोन के कनेक्शन ने लोगों को विकास का मतलब समझाया. मऊ ने उस दौर में ऐसा विकास देखा, जिसकी चर्चा आज भी होती है.।
मुख्तार का मऊ कनेक्शन
मुख़्तार अंसारी रहने वाला ग़ाज़ीपुर ज़िले का था, लेकिन राजनीति करने के लिए उसने मऊ सदर को चुना. मऊ सदर विधानसभा सीट से वह पांच बार विधायक रहा.मऊ सदर सीट पर 1980 से लेकर अब तक मुस्लिम प्रत्याशी ही चुनाव जीतते रहे हैं. मुख्तार ने इस सीट से पहला चुनाव 1996 में बसपा से जीता. इसके बाद साल 2002 और 2007 में वो निर्दलीय जातेकर आया. फिर 2012 में वह अपनी पार्टी कौमी एकता दल से विधानसभा पहुंचा और 2017 में फिर बीएसपी के टिकट पर जीत दर्ज की. मुख़्तार अंसारी के बाद अभी उसका बेटाअब्बास अंसारी सदर सीट से विधायक है.
मऊ दंगे ने सब बदल दिया
साल 2005 में मऊ में हुए दंगे के दौरान एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें एक तरफ़ दंगे चल रहे थे और दूसरी तरफ फरार बताया जा रहा मुख़्तार अंसारी खुली जीप में घूम रहा था. यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकारी थी और मऊ में मुख्तार को सरकार कहा जाता था. शहर में दंगे हुए लेकिन खुद कुछ करने की जगह पुलिस मुख़्तार के इशारे पर नाचती दिखाई दी. इन दंगों में 15 लोगों की जान गई. शहर क़रीब महीने भर हिंसा की आग में जलता रहा, लेकिन मुख्तार की हुकूमत पर छटाक भर भी असर ना पड़ा.
योगी और मुख़्तार का आमना-सामना
मऊ दंगों को लेकर गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए मऊ पहुंचने की घोषणा की थी. वो गोरखपुर से निकले लेकिन ज़िले की सीमा पर रोक दिए गए. साल 2008 में योगी आदित्यनाथ आजमगढ़ जा रहे थे, उनके काफ़िले पर हमला हो गया. दावा किया गया कि कुछ गाड़ियों पर फायरिंग भी की गई लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. तब योगी आदित्यनाथ ने इशारा किया कि ये हमला किसके कहने पर हुआ और नाम आया मुख़्तार अंसारी का.
योगी के सीएम बनते ही सब बदल गया
जिस मुख़्तार की मऊ और गाजीपुर में तूती बोलती थी, जिस मुख़्तार ने विधायक रहते सांसद को आने से रोक दिया, जिस मुख्तार पर योगी के काफिले पर हमला कराने का आरोप लगा, उसी मुख्तार के बुरे दिन योगी के सीएम बनते ही शुरू हो गए. मुख़्तार अंसारी को उनके ख़िलाफ़ चल रहे मुकदमों में सजा मिली, जिसके बाद सरकारी तंत्र ने उसकी काली कमाई को ज़ब्त और ध्वस्त करने का काम शुरू कर दिया. साथ ही उसके गुर्गों और शूटर्स पर भी कार्रवाई तेज करके पूरे नेक्सस को तोड़ दिया.
मऊ का राजनैतिक समीकरण
सीएम योगी के गोरखपुर और पीएम मोदी के वाराणसी के बीच बसे मऊ ज़िले में चार विधानसभा सीटें हैं. इनमें मऊ सदर पर 1980 से लगातार मुस्लिम विधायक है. साल 1996 से 2022 तक मुख्तार और अब उसके बेटे का कब्जा बरकरार है. साल 2022 में चार में से दो पर सपा, एक पर सपा गठबंधन और एक सीट बीजेपी की झोली में आई थी. मऊ सदर में सपा गठबंधन के सुभासपा के अब्बास अंसारी जीते, वहीं घोसी और गोगना मोहम्मदाबाद से सपा को जीत मिली. मधुबन सीट से बीजेपी प्रत्याशी विजयी हुए.
मऊ सदर पर होगी सबसे बड़ी लड़ाई
मुख़्तार अंसारी के अंत के बाद 2027 में विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी लड़ाई मऊ सदर पर होगी. पिछली बार सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने अब्बास अंसारी को टिकट दिया था. सपा का वोट, मुस्लिम वोट और राजभर का वोट मिलाकर अब्बास चुनाव जीत गए. अब राजभर बीजेपी के साथ हैं, ऐसे में राजभर का साथ मिल पाना लगभग नामुमकिन है. सपा अब्बास को टिकट दे, इस पर भी संशय है. बसपा फ़िलहाल उतनी मज़बूत नहीं दिखती. ऐसे में क्या 2027 में मुस्लिम प्रत्याशी के रिकॉर्ड को बीजेपी तोड़ पाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.













