- उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन दशकों में किसी मुस्लिम नेता ने सबसे मजबूत पहचान बनाई है तो वो आजम खान हैं.
- नसीमुद्दीन सिद्धीकी ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली है जो आजम खान के विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं.
- प्रदेश में मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सपा के लिए अपने मुस्लिम नेतृत्व को मजबूत करना जरूरी है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीते तीन दशकों में अगर किसी एक मुस्लिम नेता ने अपनी सबसे मजबूत पहचान बनाई है तो वो आजम खान हैं. हालांकि बीते कुछ सालों के दौरान एक के बाद एक मुकदमों और जेल की कैद की वजह से आजम खान की बुलंद आवाज मानो कहीं दब सी गई है. आजम कब बाहर आएंगे और अगर बाहर आएंगे तब भी वो फिर से उतने ही मजबूत होंगे या नहीं, ये बड़ा सवाल है. हालांकि इस सवाल के बीच एक और सवाल है कि क्या समाजवादी पार्टी आजम खान का विकल्प तलाश रही है?
पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्धीकी ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली है. बहुजन समाज पार्टी की सरकार के वक्त कद्दावर मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्धीकी को बसपा से निकाले जाने के बाद वो कांग्रेस में चले गए थे. लंबे समय तक कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने कुछ दिन पहले ही पार्टी से इस्तीफा दिया और रविवार को समाजवादी पार्टी की लाल टोपी पहन ली.
ये भी पढ़ें: क्या बुआ-भतीजा फिर साथ आएंगे? अखिलेश ने इशारों-इशारों में मायावती को क्या हिंट दे दिया
नसीमुद्दीन सिद्धीकी जब से समाजवादी पार्टी में आए हैं, कई तरह की चर्चाएं जोर पकड़ चुकी हैं. कहा जा रहा है कि सपा नसीमुद्दीन को आजम खान के रिप्लेसमेंट के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश करेगी. फिलहाल अखिलेश यादव के अगल-बगल बैठने वालों में एक भी मजबूत मुस्लिम चेहरा नहीं है. ऐसे में नसीमुद्दीन के सपा में आने से इसकी चर्चा शुरू हो गई है.
क्या विकल्प बन पाएंगे नसीमुद्दीन?
हालांकि यह बड़ा सवाल है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्धीकी आजम खान का विकल्प बन पाएंगे. वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा मुमकिन नहीं लगता है. नसीमुद्दीन सिद्धीकी को भले ही सपा में मुसलमानों को लामबंद करने की ड्यूटी में लगाया जाए लेकिन आजम खान का मिजाज, तेवर और स्वीकार्यता शायद ही आ पाए. आजम खान सपा के फाउंडर मेम्बर हैं और मुलायम सिंह यादव से उनका बेहतरीन तालमेल था. एक शानदार वक्ता के रूप में लोगों को प्रभावित करने की क्षमता जैसी आजम खान में है, वैसी नसीमुद्दीन सिद्दीकी में नजर नहीं आती है.
सपा में क्यों आए नसीमुद्दीन?
बसपा में सत्ता का अद्भुत स्वाद चख चुके नसीमुद्दीन सिद्धीकी विवादों के बीच बसपा से निकाले गए. कांग्रेस आने पर भी माना गया कि वो कांग्रेस से बिखर चुके मुस्लिम वोटों को साथ लाकर खड़ा कर देंगे, लेकिन ऐसा नहीं कर सके. यही कारण है कि उन्होंने अपनी खो रही साख को वापस पाने की कोशिश में एक और दांव चलने का फैसला किया. नसीमुद्दीन जो हैं, वो बसपा की वजह से हैं. ऐसे में बसपा के खिलाफ खुलकर बोलने से उन्हें नुकसान हो सकता है. वहीं कांग्रेस का सपा से गठबंधन है, तो वो बहुत ज्यादा कांग्रेस की बुराई नहीं कर पाएंगे. ऐसे में ले देकर वे बीजेपी पर निशाना साधेगें, जो उनकी राजनीति के हिसाब से मुफीद है.
मुस्लिम राजनीति में तेजी क्यों आई?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी एक साल का वक्त बचा है. ओवैसी की पार्टी ने 403 में से आधी सीटों पर प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है. मायावती लंबे समय से मुसलमानों को साथ लाने की कवायद में जुटी हैं. कांग्रेस भी मुसलमानों से साथ आने का आग्रह करती दिखाई देती है. रही सही कसर बीजेपी ने पसमांदा मुसलमानों के नाम पर मुस्लिम वोटों को जोड़ने की कोशिश करके पूरी कर दी है. ऐसे में सपा को पता है कि अगर थोड़ी सी भी चूक हुई तो 18-20 फीसदी मुस्लिम वोटों में बिखराव हो सकता है, अगर ऐसा हुआ तो किसी को फायदा हो या ना हो, सपा को नुकसान जरूर हो जाएगा.














