- IAS दिव्या मित्तल ने 13 साल के करियर के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
- पत्र में लिखा- पढ़ाई के बाद लंदन में जॉब की लेकिन देश से दूर अधूरापन लगा तो मिट्टी का कर्ज चुकाने लौटी.
- दिव्या मित्तल ने कहा- हर सरकारी फाइल के पीछे व्यक्ति है, उसकी गरिमा ही न्याय है.
आईएएस अधिकारी और कई जिलों की डीएम रहीं दिव्या मित्तल ने सिविल सर्विस से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने 13 साल के करियर में देवरिया, मिर्जापुर और संत कबीर नगर में जिले के मजिस्ट्रेट के तौर पर काम किया. फिलहाल वह उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात थीं. दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे में लिखा- "मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव कोई तथ्य नहीं बस एक राय है." अपने इस्तीफा पत्र में उन्होंने लहुरियादह का भी जिक्र किया. मित्तल ने एक बयान में कहा, "आज मैंने 13 साल की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है."
लंदन से IAS बनने तक का सफर...
दिव्या मित्तल एक साधारण परिवार के माहौल में पली-बढ़ीं. उन्होंने IIT दिल्ली और बाद में IIM बैंगलोर से पढ़ाई की और फिर लंदन में नौकरी शुरू की. उन्होंने अप्रैल 2007 से जुलाई 2008 तक फाइनेंशियल सर्विसेज फर्म जेपी मॉर्गन (JPMorgan) में एसोसिएट के तौर पर काम किया. लेकिन विदेश में रहने के बावजूद उन्हें कुछ अधूरापन महसूस होता था. उन्होंने कहा, "सब कुछ हासिल करने के बाद भी, कुछ न कुछ अधूरा लगता था. अपने देश से दूर रहने का बोझ मुझ पर था."
दिव्या मित्तल ने कहती हैं, उन्हें लगा कि उनकी शिक्षा और मौकों के साथ भारत के प्रति एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है. उन्होंने कहा, "मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताकत, सब इस मिट्टी का कर्ज था मुझ पर. वो कर्ज चुकाना था. चाहती थी कि जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों. सो लौट आई और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला."
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'हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति...'
दिव्या ने सोशल मीडिया पर शेयर किए गए पत्र में लिखा, "बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा. देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है. मिर्जापुर ने सिखाया कि 'असंभव' कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है. सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था. इस जीवन का असली सुकून उन आंखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार जमीन का हक मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला. उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाए रखना ही न्याय है."
उन्होंने आगे लिखा, "मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूं. सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया. लोग मेरी खुशी में मुझसे ज्यादा खुश हुए. उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी. और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी. इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी. और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है, जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे."
'पहाड़ी की वो वृद्ध मां...'
दिव्या मित्तल ने पत्र के आखिरी हिस्से में बेहद इमोशनल होकर लिखा, "आज आभार से आंखें नम हैं. बस एक दृश्य इनमें बसा है. लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध मां, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली, बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई. पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा. और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है."
(मिर्जापुर से बृजेंद्र दुबे की रिपोर्ट)
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