- BHU के एमए इतिहास परीक्षा में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर सवाल ने समाज में तीखी आपत्ति और विवाद खड़ा किया था
- यूपी पुलिस सब-इंस्पेक्टर परीक्षा में पंडित शब्द को अवसरवादी विकल्प में शामिल करना विरोध का कारण बना था
- नेटफ्लिक्स की फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर ब्राह्मण संगठनों ने आपत्ति जताई और कोर्ट ने निर्माता को फटकार लगाई
Brahmin Politics in UP: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के एमए इतिहास के प्रश्नपत्र में "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता" (Brahmanical Patriarchy) पर पूछा गया विवादास्पद सवाल कोई इकलौती घटना नहीं है. उत्तर प्रदेश की राजनीति, सरकारी मशीनरी और सामाजिक विमर्शों को खंगालने पर पिछले कुछ समय की ऐसी कई कड़ियां मिलती हैं, जो एक अलग ही 'नैरेटिव वॉर'की तरफ इशारा करती हैं. राजनीतिक विश्लेषकों और समाज के प्रतिनिधियों का साफ आरोप है कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश के एक प्रभावशाली समाज को लेकर सियासत की जा रही है . आइए कुछ फैक्ट्स, हालिया अदालती फैसलों, विवादित सवालों और सियासी आरोप-प्रत्यारोप के जरिए इस पूरी क्रोनोलॉजी को समझते हैं.
फैक्ट नंबर 1: बीएचयू परीक्षा में 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' पर सवाल
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एमए इतिहास के चौथे सेमेस्टर के परीक्षा पत्र में एक ऐसा सवाल पूछा गया जो सीधे एक समुदाय को टारगेट करता था. पेपर में पूछा गया था— "‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' शब्द से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि प्राचीन भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने महिलाओं की प्रगति में किस प्रकार बाधा डाली?"
आक्रोश की वजह: इस सवाल के सामने आते ही BHU के ही प्रोफेसरों और ब्राह्मण संगठनों ने तीखी आपत्ति जताई. उनका कहना था कि यह कोई सामान्य अकादमिक प्रश्न नहीं है, बल्कि यूनिवर्सिटी कैंपस में बैठे वामपंथी विचारकों द्वारा जानबूझकर एक खास समाज के खिलाफ एजेंडा चलाने और नई पीढ़ी के दिमाग में नफरत घोलने का प्रयास है. BHU के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर सुभाष पांडे और इतिहास विभाग की प्रोफेसर अनुराधा सिंह का बयान बताता है कि ये सवाल बेमानी है. इसके अलावा कई संतों ने भी इस सवाल पर ही सवाल उठाएं हैं.
फैक्ट नंबर 2: यूपी पुलिस सब-इनस्पेक्टर (SI) परीक्षा का विवादित सवाल
इसी तरह का एक और बड़ा प्रशासनिक विवाद उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड (UPPRPB) द्वारा आयोजित सब-इंस्पेक्टर (SI) नागरिक पुलिस की लिखित परीक्षा के दौरान सामने आया था.
क्या था परीक्षा का सवाल- हिंदी खंड के पेपर में वाक्यांश के लिए एक शब्द पूछा गया था: "अवसर के अनुसार बदल जाने वाला व्यक्ति कौन-सा है?"
दिए गए विकल्प: बोर्ड की ओर से इसके चार विकल्प दिए गए थे— 1. अवसरवादी, 2. निष्कपट, 3. सदाचारी और 4. पंडित.
विवाद की वजह: व्याकरण के नियमों के अनुसार सही जवाब 'अवसरवादी' होना चाहिए था, लेकिन 'पंडित' शब्द को अवसरवादी (यानी गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले) के विकल्प के रूप में रखना सीधे तौर पर समाज को नीचा दिखाने की कोशिश माना गया. सर्व ब्राह्मण एकता सभा समेत तमाम सियासी संगठनों के तीखे विरोध के बाद सरकार को इस पर कड़ा रुख अपनाना पड़ा था.
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फैक्ट नंबर 3: मनोज वाजपेयी की फिल्म 'घूसखोर पंडत' पर मचा बवाल
मनोरंजन और ओटीटी (OTT) उद्योग के जरिए ब्राह्मण समाज को सीधे नकारात्मक विमर्श में घसीटने का सबसे बड़ा उदाहरण नेटफ्लिक्स पर आने वाली फिल्म 'घूसखोर पंडत' (Ghooskhor Pandat) को लेकर सामने आया.
विवाद की वजह: निर्देशक नीरज पांडे की इस फिल्म में मनोज वाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अफसर की मुख्य भूमिका में थे. लेकिन फिल्म का टाइटल 'घूसखोर पंडत' रखते ही अयोध्या के संतों, विश्व हिंदू परिषद और देश भर के ब्राह्मण संगठनों में भारी आक्रोश फैल गया. आरोप लगा कि फिल्म के नाम में ही 'पंडत' शब्द के साथ 'घूसखोर' विशेषण लगाकर पूरे समाज की छवि को भ्रष्ट और लालची साबित करने का प्रोपेगैंडा चलाया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और नाम वापसी: यह विवाद इतना बढ़ा कि दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने फिल्म निर्माताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि "समाज के किसी भी वर्ग को नीचा दिखाना या अपमानित करना पूरी तरह गलत है, सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने वाले ऐसे प्रयासों को बढ़ावा न दें." आखिरकार कोर्ट की सख्ती, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर लखनऊ के हजरतगंज थाने में दर्ज हुई एफआईआर और चौतरफा दबाव के बाद निर्माताओं को फिल्म के सारे प्रमोशनल कंटेंट हटाने पड़े और नाम बदलने का हलफनामा देना पड़ा.
फैक्ट नंबर 4: प्रयागराज का 'शिखा' विवाद और ब्यूरोक्रेसी का विद्रोह
प्रयागराज माघ मेले के दौरान ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों और बटुक ब्राह्मणों (युवा पुजारियों) के साथ स्थानीय पुलिस प्रशासन की तीखी झड़प हुई थी.
साजिश के आरोप: आरोप लगा कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने बटुक ब्राह्मणों की 'शिखा' (चोटी) खींचकर उनके साथ बदसलूकी की.
ब्यूरोक्रेसी में बगावत: इस धार्मिक अपमान के विरोध में उत्तर प्रदेश के प्रान्तीय Civil Services (PCS) अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने सीधे 5 पन्नों का इस्तीफा सौंपकर सरकारी तंत्र के भीतर पनप रही 'एंटी-ब्राह्मण' विचारधारा को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था. मामला बढ़ने पर डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को डैमेज कंट्रोल के लिए आगे आना पड़ा था.
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सियासी आरोप-प्रत्यारोप: कौन खेल रहा है यह गेम?
इस बदनामी और घेराबंदी के पीछे यूपी के राजनीतिक दल एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगा रहे हैं:
'विपक्ष की वैचारिक साजिश': उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और बीजेपी के प्रदेश मंत्री अभिजात मिश्र ने इस नैरेटिव पर कड़ी आपत्ति जताई है. नेताओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था, प्रश्नपत्र समितियों और मनोरंजन जगत में बैठे कुछ वामपंथी (Leftist) विचारक जानबूझकर ब्राह्मणों को निशाना बना रहे हैं. भाजपा नेताओं का आरोप है कि विपक्ष के पास उनके इस मजबूत कोर वोटर को तोड़ने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए सोची-समझी रणनीति के तहत सरकारी व्यवस्था और फिल्मों के जरिए ऐसे विवाद खड़े किए जा रहे हैं ताकि सामाजिक सौहार्द बिगड़े.
विपक्ष का पलटवार— 'योगी सरकार की एंटी-ब्राह्मण नीति': दूसरी तरफ, 'घूसखोर पंडत' विवाद पर बसपा प्रमुख मायावती ने सीधे हमला बोलते हुए कहा था कि फिल्म का नाम बेहद आपत्तिजनक है और सिनेमा में भी ब्राह्मणों को इस तरह प्रताड़ित या नकारात्मक दिखाना एक गंभीर चिंता का विषय है. वहीं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा था कि परीक्षाओं में ऐसे अपमानजनक सवाल आना और फिल्मों में समाज को नीचा दिखाना भाजपा सरकार की दोहरी नीति को दर्शाता है. विपक्ष का आरोप है कि योगी सरकार के कार्यकाल में ब्राह्मणों के मान-सम्मान पर लगातार चोट हो रही है और उनका 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला इसी असंतोष के सहारे 2027 की चुनावी बिसात बिछा रहा है.
फैक्ट्स की यह पूरी क्रोनोलॉजी बताती है कि चाहे बीएचयू का 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' वाला सवाल हो, सिपाही-दारोगा परीक्षा में 'पंडित' को अवसरवादी बताने की हरकत हो, या 'घूसखोर पंडत' जैसी फिल्मों का टाइटल— यह महज तकनीकी त्रुटियां नहीं हैं. यह असल में उत्तर प्रदेश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने के लिए खेली जा रही विशुद्ध सियासत है. 2027 की चुनावी बिसात से पहले, इतने बड़े और प्रबुद्ध समाज को एक 'एक्स फैक्टर' और मजबूत वोट बैंक मानकर, अलग-अलग नैरेटिव के जरिए केवल अपने पाले में खींचने और वोटों के ध्रुवीकरण की यह एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है.
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