इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हमीरपुर से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं द्वारा अपनी संपत्तियों को बुलडोजर एक्शन से बचाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान नाराजगी व्यक्त करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से अपनी संपत्तियों के संभावित विनाश को रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप किए जाने की मांग की है.
हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में इमारतों को गिराने की दंडात्मक कार्रवाई जारी है. यह कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने की जगह पर कब्जा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी किया जाता है और उसके बाद कानूनी ज़रूरतों को पूरा करने का दिखावा करके उसे तोड़ दिया जाता है.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आदेश के बावजूद तोड़-फोड़ जारी रही है. भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत पर मुहर लगाई थी कि इमारतों को सजा के तौर पर तोड़ना शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है. क्योंकि सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है इसलिए कोर्ट ने पार्टियों के लिए कानून के 5 सवाल तय किए है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां तक स्टे एप्लीकेशन का सवाल है. पहले पास किया गया कोई भी अंतरिम आदेश अगले आदेश तक जारी रहेगा. पुलिस याचिकाकर्ताओं की जान, शरीर और संपत्ति की सुरक्षा करेगी ताकि वो अपनी संपत्तियों में बिना किसी रोक-टोक के आ-जा सकें. कोर्ट इस मामले में नौ फरवरी को अगली सुनवाई करेगी. ये आदेश जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डबल बेंच ने फ़ैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है.
मामले के अनुसार तीनों याचिकाकर्ता सुमेरपुर, जिला हमीरपुर में रहते है. याचिकाकर्ता 1, 2 और 3 रिश्ते से बेटा, पिता और मां है. तीनों ने हमीरपुर के सुमेरपुर थाने में 16 जनवरी 2026 को दर्ज FIR को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है. एफआईआर आरोपी आफान खान के खिलाफ BNS की धारा 64(1), 62/351(3), 61(2) और IT एक्ट की धारा 67(A), POCSO एक्ट की धारा ¾ और U.P गैरकानूनी धार्मिक धर्मांतरण निषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत मामला दर्ज हुआ है. आरोपी आफान खान याचिकाकर्ता नंबर एक का चचेरा भाई और याचिकाकर्ता नंबर 2 और 3 का भतीजा है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में कहा गया कि घटना के तुरंत बाद कथित तौर पर पुलिस की मिलीभगत से भीड़ ने याचिकाकर्ताओं के घर को निशाना बनाया था. कोर्ट में दोनों पक्षों की ओर से शुरुआती दलीलें दी गई. याचिकाकर्ता में प्रतिवादी नंबर एक हालांकि याचिकाकर्ता FIR में सह-आरोपी नहीं हैं फिर भी प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता नंबर दो को नोटिस जारी किया है जो उस रिहायशी घर का मालिक है, जिसमें वो रहते हैं यह अपराध होने और FIR दर्ज होने के तुरंत बाद किया गया. याचिकाकर्ता नंबर तीन के नाम पर "इंडियन लॉज" के रूप में रजिस्टर्ड एक कमर्शियल प्रॉपर्टी को प्रतिवादियों ने सील कर दिया है. याचिका पर सुनवाई के दौरान दूसरी ओर राज्य ने एक शुरुआती आपत्ति उठाई जिसमें याचिका समय से पहले दायर की गई है क्योंकि कोई कार्रवाई का कारण नहीं बना है.
याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए नोटिस का जवाब देना है. इसलिए निवास और लॉज को आज तक सील नहीं किया गया है. याचिकाकर्ताओं ने साफ हाथों से कोर्ट का रुख नहीं किया है क्योंकि उन्होंने यह तथ्य छिपाया है कि आरा मिल को सील कर दिया गया था क्योंकि उसके परिसर से प्रतिबंधित लकड़ी (नीम और ढाक) बरामद हुई थी, जिसका खुलासा याचिका में नहीं किया गया था. अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी द्वारा कोर्ट को मौखिक रूप से आश्वासन दिया गया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना और याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के सामने अपना मामला रखने का उचित अवसर दिए बिना कोई तोड़फोड़ नहीं होगी. कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने की जगह पर कब्ज़ा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी किया जाता है और उसके बाद कानूनी ज़रूरतों को पूरा करने के दिखावे के बाद उसे तोड़ दिया जाता है. ये तोड़-फोड़ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद जारी है जिसमें कहा गया था कि इमारतों को सज़ा के तौर पर तोड़ना शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है क्योंकि सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के किसी ढांचे को तोड़ने के अधिकार और आर्टिकल 14 और 21 के तहत उसके रहने वालों के अधिकारों से जुड़े इस मामले की व्यापक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में ये तोड़-फोड़ कैसे जारी है जिसमें कहा गया था कि इमारतों को सज़ा के तौर पर तोड़ना मना होगा. कोर्ट ने इस मामले से सीधे जुड़े कानून के पांच तैयार करना ज़रूरी समझता है. कोर्ट ने कहा कि ये वो सवाल हैं जिनके जवाब कोर्ट पार्टियों से उम्मीद करती है। वो पांच सवाल इस प्रकार है:–
(1) क्या ढांचे को गिराने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 85 और 86 का पालन नहीं किया गया है?
(2) क्या तोड़ने का अधिकार, किसी स्ट्रक्चर को तोड़ने के काम को सही ठहराता है या क्या राज्य पर राष्ट्र का जनक के तहत यह ड्यूटी है कि सार्वजनिक ज़रूरत/मकसद के बिना किसी रहने की जगह को न तोड़ा जाए?
(3) क्या किसी अपराध के होने के तुरंत बाद किसी स्ट्रक्चर को गिराने की दिशा में उठाए गए कदम, कार्यकारी विवेक का दिखावटी इस्तेमाल होंगे?
(4) हाईकोर्ट राज्य के किसी स्ट्रक्चर को गिराने के कानूनी अधिकार और आर्टिकल 21 और 14 के तहत आम नागरिक के इसे रोकने के मौलिक अधिकार के बीच टकराव वाले हितों को कैसे बैलेंस करेगा?
(5) क्या किसी नागरिक के लिए कोर्ट में आने के लिए "तोड़े जाने का उचित डर" एक कारण हो सकता है और अगर 'हाँ', तो इस कोर्ट के लिए ऐसे "उचित डर" के अस्तित्व को मानने के लिए कम से कम क्या ज़रूरी है?














