सरकारी कर्मचारी की इलाज के दौरान मौत पर वारिस भी कर सकेंगे खर्च का दावा, इलाहाबाद कोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी या पेंशनभोगी की इलाज के दौरान मौत हो जाती है या वह इलाज के खर्च का दावा करने में असमर्थ हो जाता है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी भी प्रतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं.

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के इलाज खर्च के दावे में वारिस को अधिकार देने का बड़ा फैसला सुनाया
  • अदालत ने कहा कि यदि लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है, तो उत्तराधिकारी भी दावे के पात्र होंगे
  • कोर्ट ने प्राधिकरण को याचिका पर दो माह में पुनर्विचार कर सही पाए जाने पर एक माह में भुगतान करने के निर्देश दिए
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लखनऊ:

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच बड़ा फैसला सुनाया है, जिसका लाखों लोगों को फायदा होगा. अदालत का कहना है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी या पेंशनभोगी की इलाज के दौरान मौत हो जाती है या वह इलाज के खर्च का दावा करने में असमर्थ हो जाता है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी भी प्रतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं. न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने चंद्रचूड़ सिंह की याचिका पर यह फैसला सुनाया.

क्‍या है पूरा मामला 

मामला लखनऊ के एक सरकारी कर्मचारी का है, जिसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी. याचिकाकर्ता के पिता सेवानिवृत्त डिप्टी रजिस्ट्रार थे. उनका इलाज लखनऊ के निजी अस्पतालों में कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनका निधन हो गया. याचिकाकर्ता ने इलाज के खर्च के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि नियमों के तहत केवल 'लाभार्थी' ही दावा कर सकता है. राज्य सरकार ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा उपस्थिति) नियम, 2011 के तहत दावा केवल लाभार्थी द्वारा ही किया जा सकता है और याची इस श्रेणी में नहीं आता. इसमें याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र में निर्धारित 5,000 रुपये की सीमा का भी हवाला दिया गया.

नियम-16 की यह व्यवस्था मनमानी!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि नियम-16 की यह व्यवस्था मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करती है. अदालत ने कहा कि यदि किसी लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह दावा करने में अक्षम हो जाता है, तो उसके कानूनी वारिसों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने 'रीडिंग डाउन' के सिद्धांत को लागू करते हुए निर्देश दिया कि नियम-16 की व्याख्या इस प्रकार की जाए कि उसमें कानूनी वारिसों को भी शामिल माना जाए, विशेषकर तब जब कोई अन्य पात्र लाभार्थी मौजूद न हो. 

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वारिस होने को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो केवल तकनीकी आधारों पर दावा खारिज करना उचित नहीं है. इसके बाद अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया कि याची के दावे पर दो माह के भीतर पुनर्विचार कर निर्णय लिया जाए और यदि दावा सही पाया जाए तो एक माह के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए.

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