तौकीर रजा के करीबियों को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी राहत, बरेली विकास प्राधिकरण को दिया यह आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरेली के दो वैंक्वेट हाल को बड़ी राहत देते हुए उन पर जारी तोड़-फोड़ की कार्रवाई पर रोक लगा दी है. आगे की कार्रवाई के लिए अदालत ने याचियों को बरेली विकास प्राधिकरण में आवेदन करने को कहा है.

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प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के ऐवाने-ए-फरहत बैंक्वेट हॉल पर आगे की ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर रोक लगा दी है. अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है. अदालत ने कहा है कि बरेली विकास प्राधिकरण की ओर से आवेदनों के निपटारे तक सभी पक्ष संबंधित संपत्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखेंगे और आगे कोई भी ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ताओं को स्थल पर किसी भी प्रकार का निर्माण या परिवर्तन करने पर भी रोक लगा दी है. यह आदेश जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस कुणाल रवि सिंह की बेंच ने फरहत जहां और सरफराज वली खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. फरहत जहां और सरफराज वली खान बरेली में इस साल 26 सितंबर को 'आई लव मोहम्मद' के नाम पर हुई हिंसा के बाद तौकीर रजा और सपा नेता आजम खान के करीबी हैं.

बारात घर में अवैध निर्माण का मामला

मामले के अनुसार बरेली डेवलेपमेंट ऑथोरिटी ने पिछले हफ्ते अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए दो बारात घरों में अवैध निर्माण को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया था. इनमें से एक राशिद खान का गुड मैरिज हॉल और दूसरा सरफराज वली खान का बारातघर ऐवान-ए-फरहत था. बीडीए का कहना था कि दोनों मैरिज हॉल बिना स्वीकृत मानचित्र के बनाए गए थे. बीडीए का कहना था कि दोनों के ध्वस्तीकरण आदेश 2011 में ही जारी किए गए थे.

बरेली के सूफी टोला में बने ऐवान-ए-फरहत पर सबसे पहले बुलडोजर चला था. संचालकों ने अपनी सफाई में कहा था कि 2018 में बीडीए ने कंपाउंडिंग के लिए रुपए जमा कराने को कहा था. इस पर दोनों ने दो-दो लाख रुपए बीडीसीए में जमा कर दिए थे. पिछले हफ्ते हुई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद आठ दिसंबर को फरहत जहां और सरफराज वली खान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट फाइल की थी. अपनी याचिका में दोनों ने मांग की थी कि कोर्ट कोई ऐसा आदेश या निर्देश जारी करे जिसमें दोनों संपत्तियों को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना और आगे गिराने से रोका जाए. संपत्तियों पर यथास्थिति बनाए रखने और रिट पर अंतिम फैसला होने तक तोड़फोड़ की गतिविधियों को रोकने का निर्देश दिया जाए. 

सुनवाई में वकीलों ने क्या दलील दी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील शशि नंदन ने कहा कि विवादित तोड़फोड़ की कार्रवाई 12 अक्टूबर 2011 के एक कथित आदेश की आड़ में की गई है. उनका कहना है कि यह आदेश याचिकाकर्ताओं को कभी नहीं दिया गया था. उन्होंने तर्क दिया कि यूपी शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अधिकारियों ने सीधे तोड़फोड़ की कार्रवाई शुरू कर दी. इस स्थिति के कारण याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा प्रदान की. 

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वहीं बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी के वकील अशोक मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने इस कोर्ट से जरूरी तथ्य छिपाए हैं. उनका कहना था कि याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किए गए थे जैसा कि 12 अक्टूबर 2011 के आदेश में बताया गया है जिसमें डेवलपमेंट अथॉरिटी ने पाया कि याचिकाकर्ता नंबर दो जो याचिकाकर्ता नंबर एक के पति है उन्होंने जरूरी मंजूरी या स्वीकृत नक्शे के बिना एक मैरिज हॉल (बारात घर) बनाया था.

कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि हम इस स्टेज पर मामले का मेरिट के आधार पर फैसला करने के इच्छुक नहीं हैं. हालांकि न्याय के हित में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि याचिकाकर्ताओं को अपने कानूनी उपायों को अपनाने का उचित अवसर मिले.अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता 1973 के अधिनियम की धारा 14 और 15 के तहत उचित आवेदन दाखिल करेंगे. याचिकाकर्ता अपना आवेदन दो हफ्ते में बरेली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के समक्ष दायर करेंगे. 

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