इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ितों को प्रेग्नेंसी का देरी से पता चलने पर चिंता जताई, प्रमुख सचिव से भी मांगा एफिडेविट

जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जनहित याचिका (PIL) दुष्कर्म पीड़ितों और अनचाही प्रेग्नेंसी का सामना करने वाले दूसरे लोगों की देखभाल के बारे में समाज की चिंता को दूर करने के लिए रजिस्टर की गई है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ितों की प्रेग्नेंसी खत्म करने की मांग वाली रिट याचिका से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गंभीर चिंता जताई है. हाईकोर्ट ने कहा है कि हालांकि 24 हफ़्ते तक की प्रेग्नेंसी को मेडिकल तौर पर खत्म करने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) मौजूद है फिर भी कोर्ट को दुष्कर्म पीड़िताओं की तरफ से फाइल की गई याचिकाओं का सामना करना पड़ता है जिनको अक्सर प्रेग्नेंसी के बारे में देर से पता चलता है. इसलिए पीड़िता अंतिम चरण में कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है.

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून दुष्कर्म जैसी घिनौनी घटना से पैदा हुए अजीब और दुर्भाग्यपूर्ण हालात की वजह से 20 हफ़्ते तक और ज़्यादा से ज़्यादा 24 हफ़्ते तक के ऐसे प्रेग्नेंसी को खत्म करने की इजाज़त देता है इसलिए अक्सर प्रेग्नेंसी का पता देर से चलता है और कभी-कभी शायद कानून और प्रक्रिया की समझ और जानकारी की कमी के कारण दुष्कर्म पीड़िता और उनके परिवारों का कीमती समय बर्बाद होता है और वो कोर्ट तक देर से पहुंचते है. 

कोर्ट को जब भी समय मिलता है कोर्ट ने ऐसी मामलों में सही राहत देने या सही आदेश देने के लिए नियमित तौर पर तुरंत कदम उठाए है. कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ने अक्सर पाया है कि दुष्कर्म पीड़िता के मेडिकल प्रेग्नेंसी को खत्म करने के अधिकार में किसी भी देरी से बचने के लिए कानून द्वारा तय 24 हफ़्ते की बाहरी सीमा के अंदर बताए गए उपायों के साथ-साथ और उपाय करना ज़रूरी हो सकता है ताकि पीड़ित को नियमित प्रेग्नेंसी टेस्ट करवाने का ऑप्शन दिया जा सके ताकि अगर वह ऐसी अनचाही प्रेग्नेंसी को खत्म करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहे तो उसे नियमित प्रेग्नेंसी टेस्ट करवाने का ऑप्शन दिया जा सके.

कोर्ट ने इसे ध्यान में रखते हुए प्रिंसिपल सेक्रेटरी, मेडिकल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर को तीन हफ्ते में एफिडेविट फाइल करने का आदेश दिया है क्योंकि यह डिपार्टमेंट महिला और बाल स्वास्थ्य का ध्यान रखता है. कोर्ट इस मामले में 13 मार्च को अगली सुनवाई करेगी. यह आदेश जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला जी डिवीजन बेंच ने गर्भपात के मामलों में सभी संबंधित लोगों को जागरूक करने के लिए गाइडलाइंस को फिर से बनाने वाली  नाम से जनहित याचिका पर दिया है.

दरअसल, दो सितंबर 2025 को जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की डबल बेंच ने एक रिट C याचिका पर सुनवाई करते हुए दुष्कर्म पीड़ितों की प्रेग्नेंसी को खत्म के मामलों से निपटने में देरी को रोकने के लिए राज्य सरकार से अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में तैयार की गई गाइडलाइंस के बारे में पूछा था. इस दौरान कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि गाइडलाइंस के बावजूद अक्सर अलग-अलग स्टेज पर देरी होती है जिससे प्रेग्नेंसी खत्म होने की स्थिति में पीड़ित की जान को खतरा होता है. इसलिए कोर्ट को लगता है कि कमियों को दूर किया जाना चाहिए और इस प्रोसेस में शामिल सभी लोगों को जागरूक करने का तरीका तय किया जाना चाहिए. कोर्ट ने आदेश इस मुद्दे की अहमियत को देखते हुए ऑफिस को 'In Re : Framing of Guidelines for sensitizing all concerned in cases of termination of pregnancies".  टाइटल के साथ एक स्वत: संज्ञान PIL रजिस्टर करने करने का आदेश दिया था. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट दुष्कर्म पीड़ितों की प्रेग्नेंसी खत्म करने से जुड़े मामलों को लेकर जनहित याचिका कायम कर सुनवाई कर रही है. 

जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जनहित याचिका (PIL) दुष्कर्म पीड़ितों और अनचाही प्रेग्नेंसी का सामना करने वाले दूसरे लोगों की देखभाल के बारे में समाज की चिंता को दूर करने के लिए रजिस्टर की गई है. कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि जहां पीड़ित प्रेग्नेंसी को पूरे समय तक ले जाने का विकल्प चुनती है या जहां किसी और वजह से प्रेग्नेंसी को खत्म नहीं किया जा सकता और इसलिए उसे पूरे समय तक नहीं ले जाया जा सकता वहां वेलफेयर स्टेट मूकदर्शक नहीं बन सकता. वेलफेयर स्कीम का कवरेज जिसमें उस बच्चे/व्यक्ति/महिला की देखभाल शामिल है जो अनचाही मां बन सकती है और इसलिए उसे मेडिकल केयर और बच्चे को जन्म देने की ज़रूरत होती है साथ ही बच्चे के जन्म के बाद के समय में उसकी हेल्थ और पैदा होने वाले बच्चे की हेल्थ दोनों के संबंध में उसे भी कॉम्प्रिहेंसिव SOP के तहत लाने और मॉनिटर करने की ज़रूरत हो सकती है.

कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ने समय-समय पर कमज़ोर लोगों, खासकर दुष्कर्म पीड़ितों के फ़ायदे के लिए कानूनी और पहले से चले आ रहे कानूनों को लागू करने के निर्देश दिए है. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 न सिर्फ़ 20-24 हफ़्ते तक की प्रेग्नेंसी को मेडिकल टर्मिनेट करने की इजाज़त देने के लिए एक कानूनी ढांचा देता है बल्कि यह एक कानूनी अंदाज़ा भी लगाता है कि दुष्कर्म की वजह से हुई प्रेग्नेंसी किसी बेचारी पीड़ित की मेंटल हेल्थ को क्या कोई गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. कोर्ट ने कहा कि हमने SOP को देखा है. पहली नज़र में यह दिखाता है कि राज्य कानून का पालन करने को तैयार है. इस तरह यह दुष्कर्म पीड़िता महिला के मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन के अधिकार को मानता है. 

कोर्ट ने माना कि उपाय काफ़ी नहीं है. अभी SOP में ऐसी कोई पूरी पॉलिसी नहीं दिखती है जो ऐसे लोगों, खासकर दुष्कर्म पीड़ितों की देखभाल में शामिल सभी एजेंसियों द्वारा अपनाए जाने वाले सटीक और करने लायक उपायों के बारे में बताए. इसलिए आम तौर पर दुष्कर्म का आरोप रिपोर्ट होने पर हालांकि FIR तुरंत दर्ज की जा सकती है और पीड़ित को मेडिकल जांच की पेशकश की जा सकती है. पुलिस अधिकारी सिर्फ़ एक सफल मामले की चिंताओं को देखते है और इंसानी पहलू या पीड़ित की देखभाल करने या उसके अधिकारों की रक्षा करने की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ कर सकते है खासकर मेडिकल रोकथाम या प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन के मामले में. कोर्ट ने कहा कि अभी कोर्ट अपनाए जाने वाले किसी खास नए उपाय का सुझाव नहीं दे रही है जैसे कि ज़्यादा मुआवज़ा वगैरह देना लेकिन ऐसा लगता है कि राज्य के पास एक पूरी पॉलिसी होनी चाहिए जिसमें प्रक्रिया की पूरी जानकारी हो और सभी लेवल पर असरदार मॉनिटरिंग हो. इसे दुष्कर्म या अनचाही प्रेग्नेंसी की रिपोर्ट से लेकर प्रेग्नेंसी का मेडिकल टर्मिनेशन या पीड़ित का इलाज होने तक लागू किया जाना चाहिए. 

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कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब तक नोडल अथॉरिटीज़, दूसरे प्रोफेशनल्स, ऑफिसर्स और एजेंसी जैसे एक्सपर्ट काउंसलर के साथ मिलकर ज़रूरत पड़ने पर विक्टिम और उसके परिवार को प्रेग्नेंसी खत्म करने के बारे में मौजूद ऑप्शन्स के बारे में काउंसलिंग नहीं दी जाती तब तक ऐसे बदनसीब नागरिकों की देखभाल करने की राज्य की इच्छा अधूरी रह सकती है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दुष्कर्म की शिकार महिला को मेडिकल प्रेग्नेंसी खत्म करने के अधिकार में किसी भी देरी से बचने के लिए कानून द्वारा तय 24 हफ़्ते की समय के अंदर बताए गए उपायों के साथ-साथ और उपाय करना ज़रूरी हो सकता है. ऐसा इसलिए ताकि पीड़ित को नियमित प्रेग्नेंसी टेस्ट करवाने का ऑप्शन दिया जा सके ताकि अगर वह ऐसी अनचाही प्रेग्नेंसी को खत्म करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहे तो 24 हफ़्ते की बाहरी लिमिट का उल्लंघन न हो. कोर्ट ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी, मेडिकल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर को तीन हफ्ते के अंदर एफिडेविट दाखिल करने को कहा है. कोर्ट अब इस मामले में 13 मार्च को अगली सुनवाई करेगी.

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