'5 महीने से अधिक का अजन्मा भ्रूण कानून की नजर में एक इंसान, परिवार को अलग से मुआवजा, इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

2018 में 8-9 माह की गर्भवती महिला ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गईं थी, जिसमें वो गंभीर रूप से घायल हो गईं थी. बाद में इलाज के दौरान महिला और अजन्मे बच्चे की मौत हो गई. अधिकरण ने महिला की मृत्यु के लिए मुआवजा दिया था, लेकिन उस भ्रूण के लिए अलग से मुआवजा देने से इनकार कर दिया था.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक गर्भवती महिला की मौत से जुड़े मामले में फैसला सुनाया है, जो ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गई थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि पांच माह से अधिक समय तक गर्भ में पलने वाले अजन्मे भ्रूण को कानून की नजर में एक ‘व्यक्ति' माना जाएगा और एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु होने पर परिवार अलग से मुआवजे का हकदार होगा. 

रेलवे दुर्घटना में अजन्मे भ्रूण की मौत 

साल 2028 में एक गर्भवती महिला ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गई थी. इस हादसे में महिला और उसके पेट में पल रहे बच्चे दोनों की मौत हो गई थी. पहले रेलवे दावा अधिकरण ने सिर्फ महिला की मौत के लिए मुआवजा दिया था, बच्चे के लिए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था. इसी को लेकर महिला के परिजन कोर्ट पहुंचे थे.

कोर्ट ने सुनाया ये फैसला

लखनऊ बेंच ने कहा कि अगर गर्भ में पल रहा बच्चा 5 महीने से ज्यादा का है, तो कानून उसे एक व्यक्ति मानता है. ऐसे में अगर किसी हादसे में उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को उसके लिए अलग से मुआवजा मिलना चाहिए. न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने रेलवे दावा अधिकरण, लखनऊ के एक आदेश के खिलाफ प्रथम अपील स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया. अधिकरण ने पूर्व में केवल एक गर्भवती महिला की मृत्यु के लिए मुआवजा दिया था. वहीं अजन्मे बच्चे के लिए राहत से इनकार किया था.

ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गईं थी गर्भवती महिला

यह मामला 2 सितंबर, 2018 की घटना से जुड़ा है, जिसमें 8-9 माह की गर्भवती भानमती ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गईं थी और वो गंभीर रूप से घायल हो गईं थी. बाद में इलाज के दौरान महिला और अजन्मे बच्चे की भी मौत हो गई थी. अधिकरण ने अप्रिय रेलवे घटनाओं से जुड़े प्रावधानों के तहत महिला की मृत्यु के लिए 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन मुआवजे के लिए उस भ्रूण को एक अलग इकाई नहीं माना था. पीड़ित परिवार ने बाद में इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की.

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रेलवे ने मुआवजा देने से किया था इनकार

इस अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि विकास के एक निश्चित चरण से परे जाने पर भ्रूण एक स्वतंत्र जीवन का दर्जा प्राप्त कर लेता है और उस भ्रूण के नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अजन्मे बच्चे की मृत्यु को मुआवजे के उद्देश्य से एक बच्चे की मृत्यु के समान माना जाना आवश्यक है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम के तहत अधिकारी दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा देने के उत्तरदायी हैं और इस तरह का उत्तरदायित्व दुर्घटना में एक अजन्मे बच्चे की मृत्यु सहित सभी जनहानि पर लागू होता है. लखनऊ बेंच ने भ्रूण की मृत्यु के लिए अधिकरण को अलग से मुआवजा देने का निर्देश दिया.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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