Brain Cells To Play Video Game Pong: 2022 में ऑस्ट्रेलिया की बायोटेक कंपनी Cortical Labs ने एक पेट्री डिश में रखी 8 लाख दिमागी कोशिकाओं को कंप्यूटर से जोड़कर 1970 के दशक वाला गेम Pong खेलना सिखाया था. अब कई साल बाद उन्होंने अपनी तकनीक को और आगे बढ़ाया है. उनका कहना है कि उनका नया CL1 सिस्टम दुनिया का पहला ऐसा biological computer है, जिसमें आप सीधे कोड चला सकते हैं और यह अब Doom गेम भी खेल सकता है.
Pong आसान था, Doom बहुत मुश्किल
टीम ने समझाया कि Pong काफी आसान गेम था. इसमें गेंद ऊपर गई, तो पैडल ऊपर गया. यह सीधा इनपुट‑आउटपुट रिश्ता था, लेकिन Doom बिल्कुल अलग है यह पहले‑व्यक्ति वाला शूटिंग गेम है. इसमें खिलाड़ी को दुश्मनों को मारते हुए अलग‑अलग जगहों पर घूमना होता है. पुराने वर्जन में पिक्सल वाले ग्राफिक्स थे, नए वर्जन में और भी कैरेक्टर हैं. ऐसे गेम को दिमागी कोशिकाओं से खेलवाना काफी कठिन था. Doom का दुनिया neurons को समझाना बड़ी चुनौती थी.
टीम के अनुसार, Doom पूरी तरह से अव्यवस्थित, 3D और मुश्किल है. इसमें दुश्मन हैं, रास्ते हैं और खिलाड़ी को दुनिया को समझकर आगे बढ़ना होता है. इसमें सबसे बड़ी चुनौती थी कि कंप्यूटर गेम की डिजिटल दुनिया को दिमागी कोशिकाओं की भाषा में बदलना, जो कि बिजली के संकेत होते हैं यानी गेम को neurons के समझने लायक बनाना जरूरी था.
Doom को क्यों चुना गया?Doom को इसलिए नहीं चुना गया कि यह कठिन है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह इंटरनेट पर बहुत लोकप्रिय और मीम बना हुआ गेम है. बहुत से लोग इस गेम पर अलग‑अलग तरह से प्रयोग कर चुके हैं. वैज्ञानिकों ने E. Coli बैक्टीरिया से Doom खेलवाया, चूहों को इसमें गन चलाना सिखाया और यहां तक कि एक चॉकलेट बार में Doom चलाने वाला सिस्टम भी बनाया गया.
Cortical Labs ने CL1 मशीन इस तरह बनाई है कि कोई भी इंसान इसमें मौजूद जीवित कोशिकाओं से एक API और सरल Python कमांड के जरिए इंटरैक्ट कर सकता है. डेवलपर्स ने गेम की वीडियो स्क्रीन को बिजली के पैटर्न में बदलकर इन कोशिकाओं तक पहुंचाया. इससे कोशिकाएं गेम की स्थिति समझ पाती हैं.
कंप्यूटर और AI की दुनिया कैसे बदलेगी?ऊर्जा उपयोग- पारंपरिक AI चिप्स बहुत अधिक बिजली की खपत करते हैं, जबकि जैविक मस्तिष्क कोशिकाएं बहुत कम ऊर्जा में निर्णय ले सकती हैं.
बेहतर AI मॉडल्स- यह प्रयोग वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर रहा है कि वास्तविक बुद्धिमत्ता (intelligence) कैसे काम करती है, जिससे अधिक स्मार्ट और अनुकूलन योग्य (adaptable) AI बनाया जा सकेगा.
रोगों का अध्ययन- इन मिनी ब्रेन्स का उपयोग अल्जाइमर और ऑटिज़्म जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज खोजने और दवाओं के परीक्षण के लिए किया जा सकता है, बिना इंसानों पर सीधे प्रयोग किए.
बायो-कंप्यूटिंग- भविष्य में ऐसे 'हाइब्रिड कंप्यूटर' बन सकते हैं जो सिलिकॉन चिप्स और जीवित कोशिकाओं के मिश्रण से चलेंगे, जिससे मशीनों की सोचने और सीखने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.














