एआई का इस्तेमाल कब न करें, यह जानना भी जरूरी, जानिए क्या कहती है स्टडी

विशेषज्ञ कहते हैं कि यह सोच अधूरी है. लोगों को सिर्फ यह नहीं पूछना चाहिए कि “मैं एआई का उपयोग कैसे करूं?”, बल्कि यह भी सोचना जरूरी है कि “क्या मुझे इसका उपयोग करना चाहिए?” और “तेजी में मैं क्या खो रहा हूं?”

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एआई
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एआई (AI) एक बहुत ही ताकतवर तकनीक है, लेकिन हर स्थिति में इसका उपयोग सही नहीं होता. आमतौर पर एआई सीखते समय हमें यह सिखाया जाता है कि बेहतर परिणाम कैसे मिलें, अच्छा प्रॉम्प्ट कैसे लिखें और काम तेजी से कैसे करें. इस वजह से लोग एआई को सिर्फ उत्पादकता बढ़ाने वाला औजार मानते हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह सोच अधूरी है. लोगों को सिर्फ यह नहीं पूछना चाहिए कि “मैं एआई का उपयोग कैसे करूं?”, बल्कि यह भी सोचना जरूरी है कि “क्या मुझे इसका उपयोग करना चाहिए?” और “तेजी में मैं क्या खो रहा हूं?”

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एआई में छिपे पूर्वाग्रह का खतरा

एआई उन डेटा पर बनता है, जिनमें कई तरह के छिपे पूर्वाग्रह होते हैं और उपयोगकर्ता अक्सर इन्हें पहचान नहीं पाते. एक अध्ययन (2025) में पता चला कि विक्टोरियन काल के डिजिटल अख़बारों में असली सामग्री का 20% से भी कम हिस्सा शामिल है यानी ऑनलाइन उपलब्ध डेटा पहले से ही झुका हुआ है. इसलिए अगर कोई शोधकर्ता इसी अधूरे डेटा से इतिहास समझने की कोशिश करे, तो उसके निष्कर्ष भी गलत या अधूरे होंगे. यही बात आज के एआई मॉडल पर भी लागू होती है. एआई उन्हीं पैटर्न को दोहराता है, जो उसे डेटा में दिखाई देते हैं.

डेटा हकीकत नहीं, बल्कि निर्मित छवि है

साहित्य विशेषज्ञ है कि लिखी हुई सामग्री सिर्फ हकीकत नहीं दिखाती, बल्कि हकीकत बनाती भी है. 1870 का एक अखबार लेख वास्तविकता नहीं होता, बल्कि संपादकों, विज्ञापनदाताओं और मालिकों द्वारा बनाया गया एक “संस्कृत रूप” होता है. एआई भी अपने प्रशिक्षण डेटा को इसी तरह एक “सुव्यवस्थित आउटपुट” के रूप में प्रस्तुत करता है. इसलिए हमें यह पूछना चाहिए “किसकी आवाज मौजूद है और किसकी गायब है?”

एआई की सीमाएं

2023 में ‘द लैन्सेट ग्लोबल हेल्थ' में प्रकाशित एक शोध में पाया गया कि एआई से बार‑बार ऐसी तस्वीरें बनाने को कहा गया, जिसमें अश्वेत अफ्रीकी डॉक्टर सफेद बच्चों का इलाज कर रहे हों, लेकिन 300 से ज्यादा कोशिशों के बावजूद एआई हर बार मरीज को अश्वेत ही दिखाता रहा. यह दर्शाता है कि एआई अपने प्रशिक्षण डेटा की सीमाओं में फंसा हुआ है.

समस्या सिर्फ शैली की नहीं, बल्कि परिणामों की है

अगर, एआई का आउटपुट बिना सोचे‑समझे स्वीकार कर लिया जाए, तो यह समाज में मौजूद छिपे पूर्वाग्रहों को और मजबूत कर देता है.

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क्या एआई दोस्त हो सकता है?

दार्शनिक माइका लॉट और विलियम हैसलबरगर कहते हैं कि दोस्ती के लिए जरूरी है कि दूसरा व्यक्ति आपकी परवाह करे, लेकिन एआई के पास न अपनी भावनाएं हैं, न अपना कोई हित. वह सिर्फ कंपनी द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर जवाब देता है. जब कंपनियां एआई को “साथी” के रूप में पेश करती हैं, तो यह एक एकतरफा और व्यावसायिक रिश्ता बन जाता है.

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