आपने हमेशा घर के बाहर लगी नेमप्लेट में दादा, पिता या बेटे के नाम देखे होंगे, लेकिन कभी भी घर की नेमप्लेट पर किसी महिला या बेटी का नहीं लिखा देखा होगा. क्योंकि अक्सर कहा जाता है कि बेटियों का कोई घर नहीं होता. ससुराल में वो पराए घर से आई कहलाई जाती हैं और मायके में पराए घर का धन, लेकिन हरियाणा के अंबाला के एक गांव में एक नई मिसाल देखने को मिली है. जहां दीवारों पर घर की पहचान के लिए सम्मान के साथ महिलाओं के नाम दर्ज हो रहे हैं. अंबाला के इस गांव में महिलाओं और बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है.
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महिलाओं और बेटियों की नेमप्लेट
दरअसल, अंबाला के घनी खेड़ा गांव में घर के बाहर पढ़ी-लिखी बेटी-बहुओं के नाम की प्लेट लगाई जा रही है. गांव की पंचायत ने यह फैसला किया और इसके बाद से घर के बाहर बेटियों की शिक्षा के साथ उनके नाम की नेमप्लेट लगाई जाती है. गांव में 30 से अधिक घरों के बाहर नेमप्लेट लग चुकी और बाकी लोग भी धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ रहे हैं. गांव में कई घर ऐसे भी हैं जहां दो या उसके अधिक महिलाओं और बेटियों की नेमप्लेट लगी हैं. ऐसा ही एक घर तमन्ना का है. तमन्ना ग्रेजुएट और उनकी मां आशा रानी पोस्ट ग्रेजुएट हैं. बीबीसी को आशा रानी ने बताया कि पंचायत के इस फैसले से बेटियों के साथ-साथ लोगों को पढ़ाई करने के लिए प्रेरणा मिलेगी.
तमन्ना ने बताया कि उनके घर के बाहर उनके पापा और दादा के नाम की नेमप्लेट नहीं है, बल्कि उनकी और उनकी मां के नाम की नेमप्लेट लगी है. वहीं, गांव के लोगों का कहना है कि जब कोई बाहर से आएगा तो वह नेमप्लेट पढ़कर रही समझ जाएगा कि इस घर में पढ़ी-लिखी महिलाएं हैं. जिससे उनका बोलने का तरीका पहले से ही बदल जाएगा और उसे पता रहेगा कि महिला पढ़ी-लिखी हैं तो किस हिसाब से बात करनी है.
गांव की पंचायत के मुताबिक, पंचायत ने 5 सदस्यों की महिला ग्राम सभा बुलाई थी, जिसमें विचार आया गांव में कितनी बहू-बेटियां पढ़ी लिखी है. इसका एक सर्वे किया जाए, जो कम से कम ग्रेजुएशन हैं. सर्वे में 30 बहू-बेटियां ऐसी हैं, जिन्होंने कम से कम ग्रेजुएशन तक पढ़ाई कर रखी है. इसके बाद घर के बाहर उनके नाम की प्लेट लगाना और उमसे शिक्षा भी लिखी गई.














