वो खौफ के चार दिन... शरण्या ने NDTV को बताया घने जंगल में कैसे जिंदा रहीं? पास था सिर्फ नदी का पानी

Kerala Trekkers Sharanya: लापता शरण्या को सुरक्षित ढूंढने के लिए जंगल और पहाड़ों के बीच रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया. वो रविवार को सुरक्षित मिलीं. वे चार दिनों तक खूंखार जानवरों वाले जंगल में चलती रहीं, उनके पास सिर्फ पीने का पानी ही बचा था.

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ट्रैकिंग के दौरान शरण्या हुई थी लापता

Kerala Trekkers Sharanya: कर्नाटक के ताडियांडामोल पहाड़ी से लापता हुई केरल की शरण्या (Sharanya) चार दिन बाद सुरक्षित मिल गई है. शरण्या कर्नाटक के कोडागु के ताडियांडामोल पहाड़ी पर ट्रैकिंग के दौरान लापता हो गई थीं. वो चार दिनों तक खूंखार जानवरों वाले जंगल में चलती रहीं, मोबाइल फोन की बैटरी भी खत्म हो गई थी. उनके पास सिर्फ पीने का पानी ही बचा था. लेकिन, शरण्या ने हार नहीं मानी और जिंदगी के लिए लड़ती रहीं. 

जंगल की अंधेरी रात भी उसने खुले आसमान के नीचे बिताया. हालांकि चार दिन बाद रविवार को वो जंगल में एक सुनसान जगह पर मिलीं. इलाके के आदिवासी लोगों ने उन्हें सुरक्षित ढूंढ निकला. रेस्क्यू के बाद शरण्या ने NDTV के संवाददाता दीपक बोपन्ना से खास बातचीत की.

12 लोगों के साथ शरण्या कर रही थीं ट्रैकिंग

शरण्या ने बताया कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी मेरी तलाश शुरू हो जाएगी. रविवार को अचानक कुछ स्थानीय लोगों से मेरी मुलाकात हुई, जो मुझे खोज रहे थे और उन्होंने मुझे बचाया.

उन्होंने कहा कि मैं बुधवार को ट्रैकिंग करने की योजना बनाई थी. इसके लिए मैं पास के एक गांव में होमस्टे में रुकी थी. गुरुवार की सुबह मैं चेक पोस्ट पर पहुंची और 8 बजे लगभग 12 लोगों के साथ ट्रैकिंग शुरू की. हम लगभग सुबह 10:40 बजे चोटी पर पहुंचे और फिर नीचे उतरना शुरू किया.

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ऐसे शरण्या भटक गई थीं रास्ता

शरण्या ने आगे बताया कि बीच में ही मैं रास्ता भटक गई. मैं थोड़ी तेजी से चल रही थी और फिर उनसे मैं आगे निकल गई. जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वो लोग मुझे दिखाई नहीं दिए. मैं लोगों को ढूंढ़ने की कोशिश की और फिर मैं उसी दिशा में आगे बढ़ी. लेकिन मुझे कोई भी दिखाई नहीं दिया. फिर मैं अपने रास्ते पर वापस लौटने की कोशिश की, लेकिन तब तक मैं एक घने जंगल के अंदर पहुंच गई थी. 

नदी की पानी पीकर लड़ती रही जिंदगी से जंग

उन्होंने बताया कि मैं अपने साथ खाना नहीं रखा था, क्योंकि यह एक आसान ट्रैक था. मेरे पास सिर्फ पानी की सुविधा थी. मैं जहां रुकी थी, उसके पास ही एक छोटी सी नदी थी, और मैंने उसी का पानी पीकर अपना गुजारा किया. मैंने दिन में लगभग तीन बार सिर्फ पानी पिया.

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शरण्या आगे बताती हैं कि हैरानी की बात है कि मुझे ज़्यादा डर नहीं लगा. एक बड़ी चट्टान और एक संकरी धारा के पास एक जगह ढूंढ ली, जो मुझे थोड़ी सुरक्षित लगी... वहां जानवरों का आना-जाना आसान नहीं था. रात में सिर्फ आवाज़ें आ रही थीं, जिससे मैं थोड़ी घबरा गई, लेकिन मैंने खुद को संभाल लिया. दोपहर करीब 2:45 बजे उतरते समय मेरा फोन बंद हो गया, उसके बाद मेरा किसी से कोई संपर्क नहीं हो पाया. मैंने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन मुझे किसी की आवाज या जवाब नहीं सुनाई दिया. होमस्टे के मालिक ने मुझे फोन किया. वो चेकपोस्ट पर मेरा इंतजार कर रहा था. मैंने उससे बताया कि मैं रास्ता भटक गई हूं. उसके बाद मेरा फोन बंद हो गया. 

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