'खुद के लिए नहीं लड़ सकी' वाले बयान पर वसुंधरा की सफाई, बोलीं- आज भी षड्यंत्रकारी मौजूद

खुद को न बचा पाने और खुद के न लड़ पाने वाले वसुंधरा के बयान ने राजस्थान के सियासी पारे को हाई पर पहुंचा दिया था. अब अपने बयान पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा ने सफाई दी है.

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'खुद के लिए नहीं लड़ सकी' वाले बयान वसुंधरा राजे की सफाई

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने उस बयान पर सफाई दी है, जिसको लेकर बीते कुछ दिन से प्रदेश की सियासत गरमाई हुई है. पूर्व सीएम वसुंधरा ने शनिवार को कहा कि उनकी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया. बयान को गलत संदर्भ से जोड़कर प्रचारित किया गया. जो षड्यंत्र के अलावा कुछ भी नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि मैंने कभी पद की बात नहीं की. मैं पहले भी कई बार कह चुकी हूं कि मेरे लिए जनता के प्यार से बड़ा कोई पद नहीं है. जो प्रदेश में मुझे सर्वाधिक मिल रहा है.

वसुंधरा बोलीं- आज भी षड्यंत्रकारी मौजूद

दरअसल, वसुंधरा ने बीते 09 अप्रैल को बारां में दिए अपने बयान पर सफाई दी और कहा कि उनकी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया. उन्होंने आगे कहा कि आज भी कुछ षड्यंत्रकारी लोग मौजूद हैं, जो संवाद की बातों का अलग अर्थ निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन भगवान की दया और जनता के प्यार से ऐसे लोग कभी सफल नहीं होंगे.

कौन से बयान से हुआ उपजा था विवाद?

वसुंधरा ने कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र से होकर एक फ़ोरलेन सड़क बन रही है, जिसके बाइपास का वहां के लोग एलाइमेंट बदलवाना चाहते थे. मैं उनको उदाहरण दे कर समझा रही थी कि धौलपुर में मेरे घर के सामने से राष्ट्रीय राजमार्ग निकला तो मुझे भी अपने घर की बाउंड्री पीछे लेनी पड़ी थी. मैं अपने आपके लिए नहीं लड़ सकी. जब मेरा घर ही रोड में चला गया. नियमों के कारण मैं अपना घर ही टूटने से नहीं बचा सकी तो आपका कैसे बचाऊंगी.

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मदन राठौड़ का मारवाड़ी अंदाज में जवाब

वसुंधरा का यही बयान राजस्थान की राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया. विपक्षी नेताओं ने भी उनके इस बयान को लेकर चुटकी लेने से पीछे नहीं रहे. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी वसुंधरा के बीते दिन दिए गए बयान पर मारवाड़ी अंदाज में जवाब दिया. उन्होंने कहा, "चिट्ठी चूर-चूर करे, मांगे डाल और घी, मोदी सु कुन झगड़ो करे, चिट्ठी खानी नाल.' राजनीतिक गलियारों में इस कटाक्ष को राजे के लिए एक सीधा और कड़ा संदेश माना जा रहा है.

मदन राठौड़ ने जिस दोहे का जिक्र किया, वह राजस्थानी लोकजीवन की एक पुरानी कहावत है. यहां 'चिट्ठी' का मतलब रोटी से है, जबकि 'मोदी' का मतलब अनाज के दुकानदार से है. कहावत कहती है कि सूखी रोटी को भी चूर-चूर करके उसमें खूब सारी दाल और घी डालकर उसका आनंद लेना चाहिए. यानी जो मिला है उसे बेहतर बनाकर उसका सुख लेना चाहिए. जिससे हमें अनाज मिलना है, जिससे हमारा घर चलता है, उससे भला कौन झगड़ा मोल ले? अगर उससे झगड़ा किया तो फिर रोटी किसके साथ खाएंगे?

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