- धौलपुर के चंबल मुक्तिधाम में एक बेटी ने अपनी 85 वर्षीय मां का अंतिम संस्कार पुत्र की तरह किया।
- रीता ने करीब चौदह साल तक मां की सेवा की और उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान किया।
- रीता ने समाज की पुरानी रूढ़ियों को तोड़ते हुए वैदिक पद्धति से मां को मुखाग्नि दी।
समाज में आज भी कई जगह यह माना जाता है कि मुखाग्नि देने का अधिकार केवल पुत्र को है, लेकिन धौलपुर के चंबल मुक्तिधाम से एक ऐसी खबर सामने आई जिसने पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर मानवता और ममता की नई परिभाषा लिखी है. यहां एक बेटी ने अपनी 85 वर्षीय मां का अंतिम संस्कार कर न केवल पुत्र का धर्म निभाया, बल्कि एक मिसाल भी पेश की.
14 साल तक की सेवा, अंतिम समय में बनीं 'श्रवण कुमार'
धौलपुर की रहने वाली रीता ने अपनी मां कमला देवी की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी. करीब 14 साल पहले पिता के निधन के बाद, जब पारिवारिक परिस्थितियों और जमीन के विवाद के कारण मां अकेली पड़ गईं, तो रीता उन्हें अपने ससुराल (चितौरा गांव) ले आईं.
पिछले 5 वर्षों से मां की तबीयत काफी खराब थी और वह चलने-फिरने में भी असमर्थ थीं. रीता ने एक बेटे की तरह दिन-रात अपनी मां की सेवा की. सोमवार को जब कमला देवी ने अंतिम सांस ली, तो पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई.
मां की अंतिम इच्छा: "बेटी ही दे मुखाग्नि"
रीता ने बताया कि उनकी मां का उनसे विशेष लगाव था. मां की अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार उनकी सबसे छोटी बेटी रीता ही करे. अपनी मां के प्रति अगाध प्रेम और उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए, रीता ने समाज की पुरानी परंपराओं से ऊपर उठकर चंबल मुक्तिधाम में सनातन और वैदिक पद्धति से मुखाग्नि दी.
मृतका की बेटी रीता ने बताया, "मेरे भाई नहीं हैं, हम तीन बहनें (रेखा, रुक्मणी और रीता) हैं. मां हमेशा चाहती थीं कि मैं ही उनका अंतिम विदाई का फर्ज निभाऊं. मैंने वही किया जो एक संतान को अपने माता-पिता के लिए करना चाहिए."
भावुक हो गया श्मशान घाट का माहौल
जब रीता ने अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं. श्मशान का माहौल पूरी तरह भावुक हो गया. स्थानीय लोगों का कहना है कि रीता ने जिस तरह से अपनी मां की सेवा की और आज जो साहस दिखाया है, वह समाज में बेटियों के प्रति नजरिया बदलने वाला है.














