बहुओं के साथ दुराचार करने वाले बेटे को मां ने ही दिलाई सजा, जज ने फैसले में लिखी रामचरितमानस की चौपाई

जोधपुर में दुराचार के एक मामले में एक मां ने अपने ही बेटे के खिलाफ गवाही दी और उसे कठोर सजा दिलवाई.

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जोधपुर की पॉक्सो विशेष न्यायालय ने ऐसे मामलों में कठोर दंड को आवश्यक बताया
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सास-बहू के रिश्तों में खटास, शिकायतें, उलाहना, झगड़ों की बातें असामान्य नहीं मानी जाती. इसी प्रकार से बेटों के लिए मां की ममता और त्याग की कहानियां भी अनसुनी नहीं हैं. लेकिन राजस्थान के जोधपुर जिले में एक ऐसी मां की कहानी सामने आई है जिसने अपनी बहुओं को इंसाफ दिलाने के लिए अपने ही बेटे से भिड़ गई. इस मां ने बेटे के लिए मोह को त्याग कर मानवता, न्याय और सच्चाई का रास्ता चुना. जोधपुर की एक पॉक्सो स्पेशल कोर्ट ने एक आरोपी को अपने ही दो छोटे भाइयों की पत्नियों के साथ दुराचार का दोषी ठहराया और उसे 10 साल जेल की सजा सुनाई.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला पांच साल पुराना है. जोधपुर के पीपाड़ थाने के एक गांव में जुलाई 2021 में एक परिवार की ओर से मामला दर्ज किया गया. इसमें आरोप लगाया कि आरोपी ने परिवार की छोटी बहू के साथ दुराचार करने की कोशिश की जब वह सो रही थी. लेकिन उसके चिल्लाने पर सास चली आई और आरोपी बेटा भाग गया.

इसके बाद यह भी पता चला कि आरोपी ने कुछ समय पहले बड़ी बहू के साथ भी दोपहर में दुराचार किया था जब वह शौच के लिए बाहर गई थी. बड़ी बहू ने इस घटना के बारे में अपने पति को भी बताया था. लेकिन लोक-लाज की वजह से उन्होंने इस घटना के बारे में किसी और को नहीं बताया. लेकिन छोटी बहू के साथ दोबारा ऐसी घटना होने के बाद छोटी बहू ने थाने में शिकायत दर्ज करवाई.

मां की गवाही रही निर्णायक

इस पूरे मामले में मां की भूमिका सबसे अहम रही. उसने ना सिर्फ अपनी बहुओं को बचाया बल्कि पहले उसने पुलिस में भी अपना बयान दर्ज करवाया, और बाद में जब अदालत में गवाही देने का समय आया तब भी उसने अपना मन नहीं बदला. उसने अपने ही बेटे को आदतन अपराधी बताते हुए उसे कड़ी से कड़ी सजा देने का अनुरोध किया.

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सुनवाई पूरी करने के बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को अलग-अलग धाराओं में दोषी ठहराया और 10 साल की सख्त कैद और 85 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. 

फैसले में मानस की चौपाई

पॉक्सो विशेष अदालत के न्यायाधीश डॉ. दुष्यंत दत्त ने अपने फैसले में रामचरितमानस तथा कई श्लोकों का उल्लेख करते हुए इस अपराध को गंभीर बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कठोर सजा आवश्यक है. उन्होंने फैसले में लिखा - 'अनुजवधू भगिनी सुतनारी, कन्या सम एति चारि. एहि को देख कुदृष्टि से, ताहि बधे कछु पाप न होई.' तुलसीदास जी ने इन पंक्तियों में लिखा है छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी एवं स्वयं की पुत्री अपनी पुत्री के समान होती हैं और इन पर बुरी नजर डालता है तो उसे सजा देने में पाप नहीं लगता.

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