भारतीय फुटबॉल का वो बड़ा चेहरा, जो पाकिस्तान से जान बचाकर भागे थे, बड़ी दिलचस्प है कहानी

भारत आने के बाद जरनैल सिंह को फुटबॉल में दिलचस्पी जगी. यह दिलचस्पी जुनून में बदल गई और इसके बाद उन्होंने भारत के बड़े और प्रतिष्ठित क्लब के साथ ही देश के लिए भी लंबे समय तक खेला.

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Jarnail Singh Dhillon
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  • जरनैल सिंह ढिल्लों का जन्म 20 फरवरी 1936 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में हुआ था और वे भारत के प्रमुख फुटबॉलर थे
  • वे 1965 से 1967 तक भारत की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के कप्तान रहे और सेंटर-बैक की भूमिका निभाई
  • जरनैल सिंह ने 1962 के एशियाई खेलों में भारत के साथ स्वर्ण पदक जीता और 1960 के ओलंपिक में भी हिस्सा लिया
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जरनैल सिंह ढिल्लों का नाम देश के बेहतरीन फुटबॉलर के रूप में लिया जाता है. वह 1965 से 1967 तक भारत की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के कप्तान रहे थे. जरनैल सिंह का जन्म 20 फरवरी 1936 को फैसलाबाद बाद में हुआ था. यह स्थान मौजूदा समय में पाकिस्तान स्थित पंजाब प्रांत का हिस्सा है. भारत विभाजन के समय पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध हो रही हिंसा में जरनैल के कई घरवाले मारे गए थे. हिंसा से बचने के लिए 12 साल की उम्र में वह 1948 में करीब 50 दूसरे पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के साथ एक ट्रक में अमृतसर पहुंचे थे और तब से भारत ही उनका घर हो गया. 

भारत आने के बाद जरनैल सिंह को फुटबॉल में दिलचस्पी जगी. यह दिलचस्पी जुनून में बदल गई और इसके बाद उन्होंने भारत के बड़े और प्रतिष्ठित क्लब के साथ ही देश के लिए भी लंबे समय तक खेला. 1952 से 1956 तक माहिलपुर के खालसा कॉलेज की फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व करने के बाद, सिंह ने 1956 में पंजाब के होशियारपुर जिले में श्री गुरु गोबिंद सिंह खालसा कॉलेज के खालसा स्पोर्टिंग क्लब में अपने सीनियर क्लब करियर की शुरुआत की. 1959 में वह मोहन बागान का हिस्सा बने और 1968 तक इस टीम का प्रतिनिधित्व किया. इस टीम के साथ उन्होंने युगांडा, केन्या, जांजीबार और तांगानिका में मैच खेले.

जरनैल सिंह सेंटर-बैक के तौर पर खेलते थे. 1960 के दशक में एशिया के सर्वश्रेष्ठ रक्षकों में से एक माने जाने वाले जरनैल सिंह ने 1960 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में हिस्सा लिया था. जकार्ता में 1962 के एशियाई खेलों में, सिंह ने भारत के साथ स्वर्ण पदक जीता. 1964 के मर्डेका कप में, वे भारतीय टीम का हिस्सा थे जो उपविजेता रही.

सिंह ने संतोष ट्रॉफी में बंगाल का प्रतिनिधित्व भी किया और उसी प्रतियोगिता में पंजाब के साथ खेलने से पहले 1958-59, 1959-60, 1962-63 और 1969-70 में इसे जीता. उन्होंने जालंधर में पंजाब के साथ मैसूर को हराकर 1970-71 की संतोष ट्रॉफी भी जीती. जरनैल सिंह की कोचिंग में पंजाब ने 1974-75 में संतोष ट्रॉफी का खिताब जीता था. एक फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें 1964 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया था.

जरनैल सिंह ने पंजाब के खेल विभाग के उप निदेशक के रूप में 1985 से 1990 तक और 1990 से 1994 तक निदेशक के रूप में काम किया. जरनैल के बेटे जगमोहन सिंह भी एक फुटबॉलर थे, जो भारत के लिए डिफेंडर के तौर पर खेले और 1993 में पाकिस्तान में हुए सार्क गोल्ड कप में हिस्सा लिया. जगमोहन के असमय निधन के बाद सिंह कनाडा में बस गए. 13 अक्टूबर 2000 को कनाडा के वैंकूवर में अस्थमा की बीमारी की वजह से 64 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

पाकिस्तान से एक शरणार्थी के रूप में आकर देश के फुटबॉल का बड़ा चेहरा बनने की जरनैल सिंह ढिल्लों की कहानी काफी प्रेरणादायी है.

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