- नोएडा सेक्टर 150 में युवराज मेहता की कार बेसमेंट के नाले में गिरने के बाद करीब डेढ़ घंटे तक मदद नहीं मिल सकी
- पुलिसकर्मी और दमकल विभाग के कर्मचारी ठंड और तैरने में असमर्थता के कारण युवराज को बचाने में नाकाम रहे
- डिलीवरी ब्वॉय मोहिंदर ने अपनी जान जोखिम में डालकर पानी में छलांग लगाकर युवराज की तलाश की लेकिन सफलता नहीं मिली
नोएडा के सेक्टर 150 में हादसे का शिकार हुए युवराज मेहता को बचाया जा सकता था. नाले के किनारे मॉल के बेसमेंट में भरे पानी में युवराज लगभग 12 बजे कार के साथ गिरा था. 1 बजकर 45 मिनट तक वह मदद के लिए चिल्लाता रहा, मोबाइल टॉर्च को जलाकर मदद की गुहार लगाता रहा. लेकिन पुलिस, दमकल विभाग के मौजूद होने के बावजूद युवराज को बचाया नहीं जा सकता. आखिर, इस लगभग डेढ़ घंटे में हुआ क्या? क्यों नहीं पुलिस और दमकल विभाग के कर्मचारी युवराज को नहीं बचा पाए? इन सभी सवालों का जवाब पूरी ईमानदारी के साथ वहां, मौजूद एक डिलीवरी ब्वॉय मोहिंदर ने दिया. मोहिंदर, वही शख्स है, जिसने अपनी जान की परवाह किये बगैर जमा देने वाली ठंड में युवराज को बचाने के लिए पानी में छलांग लगा दी थी. मोहिंदर ने बताया...
घटना उस रात 12 बजे हुई. मैं रात 1:45 बजे वहां पहुंचा. मैं एक ऑर्डर डिलीवर करने जा रहा था. तब मैंने देखा कि वहां काफी भीड़ थी. भीड़ को देखकर मैं समझ गया कि कोई दुर्घटना हुई है, क्योंकि उस रात घना कोहरा था. मैंने पास जाकर वहां खड़े लोगों से पूछा- भाई क्या हुआ है? फायर ब्रिगेड के लोगों ने बताया कि एक शख्स अपनी कार के साथ गड्ढे में गिर गया है. ये सुन एकदम से मुझे 15 दिन पहले हुई घटना याद आ गई, जब ऐसी ही दुर्घटना इस जगह पर हुई थी. स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, लेकिन अंतर बस इतना ही था कि मैं तब पहले यहां पहुंच गया था और मैंने उस ड्राइवर को बचा लिया था.
मैंने पूछा कि कितनी देर पहले लड़के की कार कार गड्ढे में गिरी? किसी ने बताया कि एक लड़का रात करीब 12 बजे अपनी कार के साथ पानी में गिर गया था. मैंने देखा कि सरकारी कर्मचारी काफी घबराए हुए थे. तब मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं अंदर जा सकता हूं? वे लोग मुझे बड़ी हैरानी से देखने लगे, फिर एकाएक उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे तैरना आता है? मैंने कहा हां... इसके बाद मैंने तुरंत अपने कपड़े उतारे, कमर में रस्सी बांधी और सीधे कम से कम 50 मीटर नीचे पानी में कूद गया.
सड़क पर करीब सौ लोग खड़े थे, लेकिन मैं इतना अंदर चला गया कि वहां से मुझे एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था. वे दूर से टॉर्च की रोशनी से मुझे इशारे कर रहे थे कि मुझे कार कहां ढूंढनी चाहिए. मेरे पहुंचने से ठीक दस मिनट पहले ही लड़के की कार पानी में पूरी तरह से डूब गगई थी. उससे पहले, लड़का डेढ़ घंटे तक फंसा रहा और लगातार मदद के लिए पुकारता रहा. गिरने के बाद उसने अपने पिता को फोन करके कहा- मैं खाई में गिर गया हूं, प्लीज मुझे बचा लीजिए. पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई, लेकिन ज़्यादातर पुलिसकर्मी बुज़ुर्ग थे, शायद 50 साल से ज़्यादा उम्र के. युवा पुलिसकर्मी खुद नहीं उतरे, क्योंकि उस दिन तापमान बेहद कम था, जमा देने वाली ठंड पड़ रही थी. वहां मौजूद पुलिसवालों को तैरना भी नहीं आता था, इसलिए वे पानी में नहीं उतरे.
पुलिस ने तुरंत दमकल विभाग को बुलाया, जो 20 मिनट के भीतर पहुंच गया. मैंने कम से कम 30 से 40 मिनट तक गड्ढे में लड़के की तलाश की. हालांकि, पहले कोई पानी में कूद गया होता, तो युवराज को बचाया जा सकता था. दमकल विभाग के लोगों ने मुझे बताया कि लड़के ने लगभग 5 मिनट पहले मदद के लिए चिल्लाना बंद कर दिया था. ऐसे में उसके बचने के चांस बहुत कम थे. मुझे जब कार नहीं मिली, तो दमकल विभाग ने एसडीआरएफ को कॉल किया गया, वो लगभग साढ़े चार बजे आई. वो अपने साथ नाव भी लेकर आए थे. मैं वहां से लगभग साढ़े 5 बजे निकला, लेकिन तब तक बॉडी को नहीं निकाला जा सका था. जहां दुर्घटना हुई, वह मोड़ इतना खतरनाक है कि अगर कोई अनजान व्यक्ति कोहरे में वहां से गुज़रे, तो उसके गड्ढे में गिरने की 101% संभावना है. वहां कोई दीवार भी नहीं है, जिससे कोई वाहन टकराकर बच सके.
दो बिल्डर कंपनियों के खिलाफ FIR दर्ज
नोएडा के सेक्टर-150 में बिल्डर साइट पर एक इंजीनियर की मौत के मामले ने नोएडा प्राधिकरण और नामजद बिल्डर कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इस मामले में दो बिल्डर कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. जानकारी के अनुसार उन पर नोएडा प्राधिकरण का करीब 3000 करोड़ रुपए का बकाया है. हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा बकाया होने के बावजूद प्राधिकरण न तो अपनी राशि वसूल कर पाया और न ही निर्माण स्थल पर न्यूनतम सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित करा सका.
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प्रशासन की लापरवाही ने ली जान!
सेक्टर-150 में जिस साइट पर हादसा हुआ, वहां सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी की जा रही थी. मौके पर न तो सेफ्टी बेरिकेट्स लगाए गए थे और न ही चेतावनी संकेतक मौजूद थे. इसी लापरवाही के चलते एक इंजीनियर की जान चली गई. घटना के बाद प्राधिकरण और बिल्डर की मिलीभगत को लेकर सवाल उठने लगे हैं. 7 जुलाई 2014 को लोटस ग्रीन बिल्डर को स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के नाम पर इस जमीन का अलॉटमेंट किया गया था. नियमों के तहत इस जमीन का उपयोग खेल और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए किया जाना था, लेकिन आरोप है कि बिल्डर कंपनी ने नियमों को ताक पर रखकर इस जमीन को अलग-अलग लोगों और संस्थाओं को बेच दिया. इससे न सिर्फ सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचा, बल्कि परियोजना का मूल उद्देश्य भी समाप्त हो गया.
सबसे बड़ा सवाल नोएडा प्राधिकरण की भूमिका पर उठ रहा है. जिस प्राधिकरण से अपने हजारों करोड़ रुपए का बकाया तक नहीं वसूला गया, वही प्राधिकरण साइट पर काम कर रहे लोगों की सुरक्षा के लिए जरूरी उपकरण और इंतजाम भी नहीं करा सका. लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बकाया वसूली और सख्त निगरानी की जाती, तो शायद यह हादसा टल सकता था.














