- लगभग बीस हजार आदिवासी किसान अपनी जमीन और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर मुंबई की ओर लॉन्ग मार्च कर रहे हैं
- मार्च के कारण मुंबई-आगरा हाईवे पर आठ से दस किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें लग गईं और यातायात प्रभावित हुआ है
- प्रशासन ने हाईवे पर पुलिस तैनात कर एक तरफ से ट्रैफिक चलाने की व्यवस्था की है और सरकार ने बैठक बुला ली है
अपनी जमीन और हक की खातिर 20 हजार आदिवासी किसानों का 'लॉन्ग मार्च' अब मुंबई की ओर बढ़ चला है. किसान अपनी जमीन और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर बीते कई दिनों से सड़कों पर उतर आए हैं.रविवार रात राजुर बहुला में विश्राम के बाद, सोमवार सुबह होते ही हजारों पैरों की पदचाप ने मुंबई-आगरा हाईवे को जैसे थाम दिया.
सड़कों पर दिखा इस लॉन्ग मार्च का असर
मार्च और सड़क के काम की वजह से हाईवे पर 8 से 10 किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें लग गई. छुट्टी के दिन सैर-सपाटे पर निकले पर्यटक और आम यात्री घंटों से फंसे रहे. कई-कई घंटों तक वाहन हाईवे पर रेंगती दिख रही हैं.
प्रशासन ने पुलिस की तैनाती बढ़ाई
हाईवे के एक ही तरफ से ट्रैफिक चलाया जा रहा है. इस बीच, सरकार ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश शुरू कर दी है. मंगलवार दोपहर 4 बजे मुंबई में एक अहम बैठक बुलाई गई है. आदिवासी नेताओं का साफ कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं,बल्कि मांगों पर ठोस फैसले चाहिए!जब तक फैसला जमीन पर नहीं दिखेगा, कदम पीछे नहीं हटेंगे.
क्यों आर-पार की लड़ाई में है किसान?
इन प्रदर्शनकारियों की मांगें उनके अस्तित्व से जुड़ी हैं. उनकी मांग है कि बरसों से जोत रहे खेत अब उनके नाम हों.बकाया कर्ज पूरी तरह माफ हो और MSP की कानूनी गारंटी मिले.नार-पार और दमनगंगा का पानी गुजरात नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों को मिले.आदिवासियों के मौजूदा कोटे से कोई छेड़छाड़ न हो और पुरानी पेंशन योजना बहाल की जाए.नजरें अब मंगलवार होने वाली बैठक पर टिकी हैं. क्या सरकार इन आदिवासियों के आक्रोश को शांत कर पाएगी, या मुंबई में एक बार फिर मराठा आंदोलन जैसी तस्वीर दिखेगी.
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