पुणे: पानी से बाहर आया सदियों पुराना पांडवकालीन मंदिर! भाटघर बांध का जलस्तर कम होने से दिखा अद्भुत नजारा

पुणे के भोर तालुका में भाटघर बांध का जलस्तर घटते ही सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर पानी से बाहर आ गया है. यह मंदिर साल के अधिकतर समय पानी में डूबा रहता है और सिर्फ मई के आखिर में दिखाई देता है.

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पुणे के भोर तालुका से एक ऐसा नजारा सामने आया है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. भाटघर बांध का जलस्तर जैसे ही कम हुआ, पानी के नीचे छिपा सदियों पुराना एक भव्य मंदिर अचानक सामने आ गया. यह कोई आम मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास और आस्था का अनोखा संगम है, जो साल के ज्यादातर समय पानी में डूबा रहता है और सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही दुनिया को दिखाई देता है.

पानी घटते ही दिखा इतिहास का अनमोल खजाना

पुणे के भोर तालुका में स्थित भाटघर बांध का जलस्तर इन दिनों काफी कम हो गया है. बताया जा रहा है कि बांध में अब केवल 6 फीसदी पानी ही बचा है. जैसे ही पानी पीछे हटा, वैसे ही इसके कैचमेंट एरिया में नदी के बीच स्थित कांबरे गांव का ऐतिहासिक कांबरेश्वर मंदिर पूरी तरह बाहर नजर आने लगा.

साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए दिखता है मंदिर

यह मंदिर साल के 12 महीनों में से करीब 10 महीने पानी में पूरी तरह डूबा रहता है. हर साल मई के आखिर में जब बांध का पानी कम होता है, तब यह मंदिर अपने पूरे स्वरूप में दिखाई देता है. यही वजह है कि इस समय यहां इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और आम लोगों की भीड़ उमड़ रही है.

पांडवकालीन माना जाता है यह मंदिर

स्थानीय लोगों और इतिहास से जुड़े जानकारों के मुताबिक, कांबरेश्वर मंदिर को पांडव काल का माना जाता है. इसकी प्राचीन बनावट और शिल्पकला इसे बेहद खास बनाती है. मंदिर का गर्भगृह हमेशा घुटनों तक पानी से भरा रहता है, जो इसे और रहस्यमय बना देता है.

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मंदिर के अंदर भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है. इसके साथ ही माता पार्वती की मूर्ति और सामने नंदी महाराज विराजमान हैं. श्रद्धालु पानी में हाथ डालकर शिवलिंग को स्पर्श करते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेते हैं. यह अनुभव लोगों के लिए बेहद अलग और भावनात्मक होता है.

इंजीनियरिंग भी करती है हैरान

सैकड़ों साल पुराना होने के बावजूद इस मंदिर की बनावट आज भी मजबूत है. मंदिर का शिखर चूना पत्थर, रेत और पकी हुई ईंटों से बनाया गया है, जबकि दीवारें बड़े पत्थरों को तराशकर खड़ी की गई हैं. मंदिर के सामने वीरगळ यानी शहीद योद्धाओं की स्मृति में बनी शिलाएं भी मौजूद हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाती हैं.

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पानी में रहकर भी मजबूती बरकरार

दशकों तक पानी में डूबे रहने और लहरों के लगातार असर के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है. हालांकि समय के साथ कुछ हिस्सों को नुकसान जरूर पहुंचा है, लेकिन इसकी नींव और मुख्य ढांचा अभी भी बेहद मजबूत नजर आता है. 

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