- मुंबई में मस्जिद बंदर स्टेशन का नाम एक यहूदी सिनेगॉग से जुड़ा है, न कि किसी मस्जिद से
- यह सिनेगॉग सैमुअल नामक यहूदी सैनिक ने बनवाया था, जिसे टीपू सुल्तान ने कैद किया था
- सिनेगॉग का नाम ‘गेट ऑफ मर्सी’ रखा गया, जो भारत का सबसे पुराना यहूदी धार्मिक स्थल है
अगर आप मुंबई में सेंट्रल रेलवे की लोकल ट्रेन के जरिये सीएसएमटी से ठाणे की ओर जाने के लिये बैठते हैं, तो पहला स्टेशन आता है, मस्जिद बंदर. बहुत कम लोगों को पता होगा कि इस स्टेशन के नाम का संबंध मैसूर के शासक टीपू सुल्तान से है. दिलचस्प बात ये भी है कि मस्जिद स्टेशन का नाम इलाके की किसी मस्जिद पर नहीं पड़ा, बल्कि इसका नामकरण एक यहूदी धर्मस्थल पर हुआ है.
टीपू सुल्तान पर सियासी घमासान
महाराष्ट्र में इन दिनों मैसूर के शासक टीपू सुल्तान को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई के प्रमुख हर्षवर्धन सकपाल ने छत्रपति शिवाजी की तुलना टीपू सुलतान से कर दी, जिससे सियासी भूचाल आ गया. महाराष्ट्र में जगह-जगह बीजेपी ने सकपाल के खिलाफ प्रदर्शन किया. पुणे में तो बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झडप भी हो गयी. मुंबई में भी विरोध प्रदर्शन हुए. हालांकि, टीपू सुल्तान कभी मुंबई आये नहीं, लेकिन एक यहूदी धर्मस्थल के जरिये उनका रिश्ता इस शहर से रहा है. ये धर्मस्थल, जिसे सिनेगॉग कहते हैं, मुंबई के मस्जिद रेल स्टेशन के बेहद करीब है. आइये जानते हैं वो दिलचस्प कहानी.
बॉम्बे द्वीप का हिस्सा था मस्जिद बंदर
मूल रूप से मस्जिद बंदर, बॉम्बे द्वीप का हिस्सा था, जो बॉम्बे के उन सात द्वीपों में से एक था, जो समंदर को पाटकर आपस में जोड़े गए थे और 19वीं सदी के मध्य तक आधुनिक समय के बंबई शहर का हिस्सा बन चुके थे. साल 1661 तक, ये द्वीप पुर्तगाली शासन के अंतर्गत थे और जब पुर्तगाली राजकुमारी, कैथरीन ऑफ ब्रैगेंजा ने इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से शादी की तो इसे दहेज के रूप में इंग्लैंड को सौंप दिया गया. इस इलाके की सबसे पुराने ऐतिहासिक ढांचों में से एक सैमुअल स्ट्रीट पर स्थित जूनी मस्जिद है. वैसे तो उर्दू के शब्द ‘मस्जिद' का मतलब प्रार्थना स्थल होता है, लेकिन हकीकत में यह ढांचा एक ‘सिनेगॉग' यानी यहूदियों का धार्मिक केंद्र था. इतिहासकार बताते हैं कि इस सिनेगॉग का निर्माण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के एक यहूदी सैनिक सैमुअल ने करवाया था, जिसे मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने पकड़ लिया था. टीपू सुल्तान की मां के अनुरोध पर उसे माफी दे दी गई और कैदियों की अदला-बदली में वह अंग्रेजों के पास वापस आ गया. टीपू सुल्तान की ओर से रिहा किए जाने के बाद कमांडर सैमुअल बॉम्बे में बस गया और ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के लिए उसने एक सिनेगॉग का निर्माण करवाया. पहले यह सिनेगॉग दूसरी जगह पर था, लेकिन 1860 में इसका पुनर्निर्माण सैमुअल स्ट्रीट पर किया गया.
‘गेट ऑफ मर्सी सिनेगॉग'
चूंकि ईश्वर ने सैमुअल पर दया दिखाई थी इसलिये इसका नाम ‘गेट ऑफ मर्सी सिनेगॉग' यानी कि 'दया का द्वार', दिया गया. यह भारत का सबसे पुराना सिनेगॉग है. सैमुअल स्ट्रीट के दक्षिण छोर पर स्थित यह सिनेगॉग बेहद छोटी सी यहूदी आबादी की मौजूदगी का भी संकेत देता है. सैमुअल स्ट्रीट से सटा इलाका ‘इजराइल मोहल्ला' के नाम से जाना जाता है.
मस्जिद बंदर को जहां अपने नाम का पहला हिस्सा इस सिनेगॉग से मिला है, जिसे ‘मस्जिद' कहा जाता है, वहीं दूसरा हिस्सा बंदरगाहों से मिला है. मराठी में पोर्ट या बंदरगाह को ‘बंदर' कहते हैं. मुंबई के पूर्वी तट पर कर्नाक बंदर, दाना बंदर और मैलेट बंदर जैसे कई बंदरगाह हैं. ‘मस्जिद बंदर' नाम तब आधिकारिक रूप से स्वीकृत हो गया, जब इस इलाके में भारतीय रेल ने इस इलाके के स्टेशन का नाम ‘मस्जिद' रख दिया.
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मस्जिद बंदर के करीब रहे थे टीपू सुल्तान के परिवार के सदस्य
टीपू सुल्तान का मुंबई शहर से एक और रिश्ता है, जो कि मस्जिद बंदर से करीब चार किलोमीटर के फासले पर मजगांव में है. 1799 में अंग्रेज-मैसूर जंग में टीपू की मौत के बाद उसके कई रिश्तेदार देश के अलग-अलग इलाकों में जा बसे. टीपू के विस्तारित परिवार के ऐसे ही एक सदस्य थे, नवाब अयाज अली जो अपने घरवालों के साथ मुंबई के मजगांव और भायखला इलाके में रहने लगे. नवाब अयाज की मुंबई में ही मृत्यु भी हुई और कई सालों तक उनकी कब्र मजगांव में मौजूद थी.
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