छत्तीसगढ़ में स्वैच्छिक अनुदान घोटाला; RTI से खुली पोल, चिरमिरी में स्वास्थ्य मंत्री पर लगे गंभीर आरोप

RTI: मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मिश्रा के अनुसार मंत्री के बेहद करीबी लोग स्वयं कलेक्टर कार्यालय पहुँचकर अनुदान के चेक प्राप्त करते हैं और इसके बाद लाभार्थियों के घर जाकर चेक सौंपते हुए फोटो खिंचवाते हैं. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर इस तरह प्रचारित किया जाता है मानो यह राशि सरकारी नहीं बल्कि मंत्री या उनके समर्थकों का निजी दान हो.

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RTI: छत्तीसगढ़ में स्वैच्छिक अनुदान घोटाला; RTI से खुली पोल, चिरमिरी में स्वास्थ्य मंत्री पर लगे गंभीर आरोप

CG News: छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़‑चिरमिरी‑भरतपुर (MCB) जिले में स्वैच्छिक अनुदान वितरण को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है. चिरमिरी निवासी आरटीआई कार्यकर्ता राजकुमार मिश्रा ने जनदर्शन के दौरान कलेक्टर को लिखित शिकायत सौंपकर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल पर शासकीय स्वैच्छिक अनुदान को नियमों के विरुद्ध बांटने का गंभीर आरोप लगाया है. मिश्रा का दावा है कि मंत्री ने इस शासकीय योजना को व्यक्तिगत उपकार और राजनीतिक पहुँच के साधन की तरह इस्तेमाल करते हुए अपात्र व्यक्तियों और अपने करीबी समर्थकों में सरकारी धन का वितरण कराया. पढ़िए चिरमिरी से फलिता भगत की रिपोर्ट.

RTI: अनुदान पर लगी आरटीआई का जवाब

अपात्रों को अनुदान देने का आरोप

राजकुमार मिश्रा के अनुसार जिस तरह बिना पात्रता और बिना वास्तविक आवश्यकता के अनुदान स्वीकृत किया गया, वह सीधे‑सीधे शासन को लाखों रुपये की आर्थिक क्षति, वित्तीय अनियमितता और आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है. शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अनुदान राशि का वितरण पूरी तरह नियम विरुद्ध तरीके से किया गया, जिससे शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

RTI: अनुदान को लेकर दर्ज हुई शिकायत

मंत्री के करीबी बांटते रहे चेक, सोशल मीडिया पर प्रदर्शन

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मिश्रा के अनुसार मंत्री के बेहद करीबी लोग स्वयं कलेक्टर कार्यालय पहुँचकर अनुदान के चेक प्राप्त करते हैं और इसके बाद लाभार्थियों के घर जाकर चेक सौंपते हुए फोटो खिंचवाते हैं. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर इस तरह प्रचारित किया जाता है मानो यह राशि सरकारी नहीं बल्कि मंत्री या उनके समर्थकों का निजी दान हो. जबकि शासकीय नियम स्पष्ट हैं कि स्वैच्छिक अनुदान की राशि केवल सक्षम शासकीय अधिकारी द्वारा ही वितरित की जा सकती है, न कि किसी मंत्री, जनप्रतिनिधि या उनके निजी प्रतिनिधि द्वारा. इसके बावजूद कथित रूप से नियमों को खुलेआम नजरअंदाज किया गया.

RTI: अनुदान पर लगी आरटीआई का जवाब

आरटीआई से हुआ बड़ा खुलासा

राजकुमार मिश्रा द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों में वर्ष 2023‑24 और 2024‑25 के दौरान स्वीकृत अनुदानों को लेकर कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं. दस्तावेजों के अनुसार मंत्री की अनुशंसा पर कई ऐसे लोगों को राशि दी गई जिनकी पात्रता संदेह के घेरे में है.

शिकायत में दावा किया गया है कि बुजुर्ग और अशिक्षित महिलाओं एवं पुरुषों को “शिक्षा मद” में 20‑20 हजार रुपये दिए गए, जबकि उनका शिक्षा से कोई लेना‑देना नहीं है.

वहीं कुछ मामलों में एक ही परिवार के कई सदस्यों को अलग‑अलग बीमारी दर्शाकर 25‑25 हजार रुपये की राशि स्वीकृत की गई.

RTI: अनुदान पर लगी आरटीआई का जवाब

उच्च वेतन पाने वाले कर्मचारियों को भी अनुदान

मिश्रा का आरोप है कि अनुदान सिर्फ जरूरतमंदों तक सीमित नहीं रहा. दस्तावेजों में ऐसे एसईसीएल कर्मचारियों के नाम भी सामने आए हैं, जिन्हें एक लाख रुपये से अधिक मासिक वेतन मिलता है, इसके बावजूद उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर शासकीय अनुदान दे दिया गया. आरोप है कि कई लाभार्थी मंत्री के राजनीतिक समर्थक, करीबी सहयोगी या निजी संपर्क वाले लोग हैं, जिनके मामलों में गंभीर कारण तो दूर, गलत कारण दर्शाकर राशि स्वीकृत कराई गई.

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संविधान के अनुच्छेद 266(3) के उल्लंघन का आरोप

राजकुमार मिश्रा ने शिकायत में कहा है कि यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(3) का खुला उल्लंघन है, जिसमें सरकारी धन के उपयोग को लेकर सख्त प्रावधान किए गए हैं. मिश्रा का कहना है कि यदि मंत्री द्वारा अपात्र व्यक्तियों की अनुशंसा न की जाती, तो सरकार का लाखों रुपये का राजस्व बचाया जा सकता था.

कलेक्टर से विस्तृत जांच की मांग

आरटीआई कार्यकर्ता ने कलेक्टर से मांग की है कि सभी लाभार्थियों के आधार कार्ड, उम्र, बैंक खाते, अनुदान स्वीकृति के कारण और राशि के वास्तविक उपयोग की विस्तृत और निष्पक्ष जांच कराई जाए. साथ ही जिन मामलों में नियमों का उल्लंघन पाया जाए, उनमें जिम्मेदार अधिकारियों और अनुशंसा करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए. अब पूरा मामला प्रशासन के पाले में है. सवाल यह है कि स्वैच्छिक अनुदान घोटाले की जांच कितनी गहराई से होगी और क्या दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई हो पाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा.

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