ग्वालियर में 'सोने' का संविधान...मूल हस्ताक्षर और गणतंत्र की असली कहानी, सिंधिया घराने से क्या नाता?  

Republic Day 2026: ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित केंद्रीय पुस्तकालय में भारतीय संविधान की एक दुर्लभ मूल प्रति सुरक्षित है. यह पूरी तरह हस्तलिखित है और सोने सुसज्जित है. इसमें संविधान सभा के सभी 286 सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद हैं. गणतंत्र दिवस सहित विशेष अवसरों पर इसे आम लोगों को दिखाया जाता है. 

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ग्वालियर के केंद्रीय पुस्तकालय में संविधान की एक मूल प्रति रखी है.

Republic Day 2026 Special: इस समय देश 77वें गणतंत्र दिवस के उत्सव की तैयारियों में जुटा है. यह गणतंत्र हमें लंबे स्वतंत्रता आंदोलन और लाखों लोगों के बलिदान के बाद मिला है. स्वतंत्र भारत को गणतंत्र के रूप में स्थापित करने का कार्य हमारे संविधान ने किया है. इसके निर्माण के लिए देश के अनेक नेताओं, समाज सुधारकों, न्यायवेत्ताओं आदि ने देशभर में घूम-घूमकर देश की जरूरतों, मान्यताओं और परिस्थितियों का वर्षों तक अध्ययन किया. लंबी कवायद के बाद 26 नवंबर 1949 को देश के लिए एक सर्वश्रेष्ठ संविधान का निर्माण किया गया, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया.

इसी कारण यह दिन हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं. वैसे तो भारतीय संविधान हमारी संसद का हिस्सा है, लेकिन ग्वालियर से इसका नजदीकी रिश्ता भी है. साथ ही ग्वालियर अंचल के लिए बड़े गौरव की बात है कि संविधान की एक मूल प्रति ग्वालियर में भी सुरक्षित है, गणतंत्र दिवस पर यह आम लोगों को दिखाई जाती है. जिसके लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं. 

Original Indian Constitution: ग्वालियर में मौजूद है संविधान की एक मूल प्रति

दरअसल, ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित केंद्रीय पुस्तकालय में भारतीय संविधान की एक मूल और दुर्लभ प्रति पूरे सम्मान के साथ सुरक्षित रखी हुई है, जिसे हर वर्ष संविधान दिवस, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर आम लोगों को दिखाने की व्यवस्था की जाती है. यह केंद्रीय पुस्तकालय अब डिजिटल हो चुका है, लिहाजा इसकी डिजिटल कॉपी भी देखने को मिलती है. हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग संविधान की इस मूल प्रति देखने के लिए ग्वालियर पहुंचते हैं. वर्ष 1927 में सिंधिया शासकों द्वारा इस केंद्रीय पुस्तकालय की स्थापना कराई गई थी. उस समय यह मोती महल में स्थापित था, स्वतंत्रता से पहले इसका नाम आलीजा बहादुर लाइब्रेरी था. बाद में इसे महाराज बाड़ा स्थित एक भव्य स्वतंत्र भवन में स्थानांतरित किया गया. स्वतंत्रता के पश्चात इसका नाम संभागीय केंद्रीय पुस्तकालय कर दिया गया.

ऐसे ग्वालियर पहुंची संविधान की यह मूल प्रति

ग्वालियर के केंद्रीय पुस्तकालय में रखी संविधान की यह मूल प्रति यहां कब और कैसे पहुंची, यह सवाल आमतौर पर लोगों के मन में उठता है. अंग्रेजी भाषा में पूरी तरह हस्तलिखित गणतंत्र के इस महत्वपूर्ण दस्तावेज की कुल 16 प्रतियां तैयार की गई थीं. इनमें से एक प्रति संसद भवन में रखी गई, जबकि नौ अन्य प्रतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजने का निर्णय संविधान सभा और संसद ने लिया था. इसका उद्देश्य यह था कि आम लोग अपने संविधान को देख सकें और इससे उनका भावनात्मक रिश्ता बन सके. इसी निर्णय के तहत संविधान की एक मूल प्रति ग्वालियर के केंद्रीय पुस्तकालय को भेजी गई थी. इसकी सुरक्षा और संरक्षण की विशेष व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई थी.

संविधान सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर.

Constitution History India: संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं मौजूद

ग्वालियर में मौजूद संविधान की प्रति की एक खास बात यह भी है कि इसकी सभी 11 पांडुलिपियों के अंतिम पन्ने पर संविधान सभा के सभी 286 सदस्यों के मूल हस्ताक्षर अंकित हैं. इनमें सबसे ऊपर पहला हस्ताक्षर देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का है. इनके अलावा संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के भी हस्ताक्षर मौजूद हैं. 

Central Library Gwalior: पूरा संविधान कैलीग्राफी में, सोने से की गई है सज्जावट 

केंद्रीय पुस्तकालय के अधिकारी भी मानते हैं कि यहां संविधान की मौजूदगी उनके लिए गर्व की बात है. उनका कहना है कि यह पूरा संविधान हस्तलिखित है और सुंदर शब्दांकन के लिए विशेष कैलीग्राफी करवाई गई है. संविधान की इस पांडुलिपि की सजावट भी बेहद अद्भुत है. इसके पहले पन्ने को सोने से सजाया गया है. इसके अलावा हर पृष्ठ की सज्जा और नक्काशी पर भी सोने की पॉलिश की गई है.

पूरे भारतीय इतिहास की झलक भी मिलती है

संविधान की इस पांडुलिपि में भारत के गौरवशाली इतिहास की झलक भी देखने को मिलती है. इसके अलग-अलग पन्नों पर इतिहास के विभिन्न कालखंडों जैसे मोहनजोदड़ो, महाभारत काल, बौद्ध काल, अशोक काल और वैदिक काल की मुद्राएं, सील और चित्र अंकित हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारी भारतीय संस्कृति, परंपराएं, राज व्यवस्था और सामाजिक संरचना अनादिकाल से ही सुव्यवस्थित और गौरवशाली रही हैं. संविधान की इस प्रति को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंच रहे हैं.  

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