Prayagraj Magh Mela Dispute: प्रयागराज माघ मेले में गंगा स्नान के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्यों के साथ हुए विवाद पर उठे धरने के 11वें दिन आंदोलन समाप्त हो गया है. इस मामले में शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज ने प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक भावनाओं की अनदेखी की गई, छात्रों के साथ बर्बरता हुई और प्रशासन ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया.
दरअसल, शंकराचार्य सदानंद सरस्वती एमपी के भिंड जिले के गोहद क्षेत्र स्थित खनेता धाम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ और संत समागम में शामिल हुए थे. बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और संतों की मौजूदगी में उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप हुआ तो संत समाज मौन नहीं रहेगा.
विद्यार्थियों से मारपीट पर शंकराचार्य का रोष
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि प्रशासन ने ब्राह्मण विद्यार्थियों और छोटे बच्चों को घसीटकर ले जाने के साथ‑साथ उनके साथ मारपीट भी की, जो अत्यंत अमानवीय है. उन्होंने कहा कि यदि छात्र प्रशासन की बात नहीं मान रहे थे, तो उन्हें सम्मानपूर्वक बस में बैठाकर शिविर तक छोड़ा जा सकता था या कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हिरासत में लिया जा सकता था. लेकिन जिस तरह से छात्रों के साथ व्यवहार किया गया, वह किसी बड़े अपराधी के साथ किए जाने जैसा प्रतीत हुआ.
शिखा पकड़कर अपमान करने पर कड़ा विरोध
उन्होंने विशेष रूप से शिखा पकड़कर विद्यार्थियों को अपमानित किए जाने की घटना पर गंभीर आपत्ति जताई. उनका कहना था कि हिंदू समाज में शिखा श्रद्धा और पहचान का प्रतीक है और उसे पकड़कर अपमानित करना केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और धार्मिक प्रताड़ना भी है. उन्होंने कहा कि ऐसा काम इतिहास में बाहरी आक्रमणकारियों और विधर्मी द्वारा किया जाता था, लेकिन आज अपनी ही पुलिस द्वारा ऐसा होना अत्यंत दुखद है.
“यह कैसी स्वतंत्रता?” धार्मिक अधिकारों पर सवाल
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने कहा कि देश स्वतंत्र होने के बावजूद धार्मिक अनुयायियों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जो चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि प्रयागराज में करोड़ों लोग गंगा स्नान करते हैं, ऐसे में लगभग 100 लोगों के एक समूह को रोकना और उन पर बल प्रयोग करना प्रशासन की हठधर्मिता दर्शाता है.
छोटे समूहों में जाने की अनुमति दी जा सकती थी
उन्होंने कहा कि यदि सुरक्षा को लेकर चिंता थी, तो प्रशासन उन लोगों को छोटे‑छोटे समूहों में बांटकर सुरक्षित स्नान की अनुमति दे सकता था. इसके बजाय दमनकारी रवैया अपनाया गया, जिसे शंकराचार्य ने धार्मिक असहिष्णुता और संवेदनहीनता का उदाहरण बताया.
धर्म में अनावश्यक दखल पर चेतावनी
अपने उद्बोधन में शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि शासन‑प्रशासन को धर्म के क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, इसलिए शासकों का पहला कर्तव्य जनता की भावनाओं का सम्मान करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना होता है. उन्होंने याद दिलाया कि शासन जनता का सेवक है, मालिक नहीं.














