मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट पर मुकाबला अब सिर्फ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक हाई-वोल्टेज राजनीतिक थ्रिलर में तब्दील हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी ने महेश केवट को अपने तीसरे उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारकर पूरे चुनावी गणित को दिलचस्प बना दिया है. महेश केवट ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में अपना नामांकन दाखिल कर दिया है. दूसरी तरफ, इस अचानक हुए घटनाक्रम से कांग्रेस पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई है. सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने और किसी भी तरह की सेंधमारी से बचाने के लिए उन्हें तेलंगाना, कर्नाटक या हिमाचल प्रदेश शिफ्ट करने की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है.
नंबर 11 का दिलचस्प संयोग
इस पूरी चुनावी कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ 'नंबर 11' का संयोग है. संयोग ऐसा है कि महेश केवट गणित से स्नातक हैं और इस चुनाव में भी पूरा खेल गणित पर ही टिका हुआ है. साल 2022 में निवाड़ी नगर परिषद अध्यक्ष चुनाव के दौरान महेश केवट और बीजेपी के 10 अन्य कार्यकर्ताओं (कुल 11 लोगों) को कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करने के आरोप में 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. लेकिन राजनीति का पहिया ऐसा घूमा कि न सिर्फ उनका निष्कासन रद्द हुआ, बल्कि वर्तमान में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को बीजेपी ने राज्यसभा का टिकट दे दिया. अब नियति का खेल देखिए कि कभी 11 नंबर की वजह से पार्टी से बाहर होने वाले केवट को राज्यसभा पहुंचने के लिए भी लगभग 11 अतिरिक्त वोटों की ही जरूरत है.
तीसरी सीट का गणित और दोनों दलों की ताकत
मध्य प्रदेश विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखें तो कुल 230 सीटें हैं. राज्यसभा की एक सीट पर जीत दर्ज करने के लिए लगभग 58 वोटों की आवश्यकता होती है. विधानसभा में बीजेपी के पास 165 विधायक हैं. अपनी दो सीटों को सुरक्षित जीतने के लिए बीजेपी को 116 वोटों की जरूरत होगी, जिसके बाद उसके पास 49 अतिरिक्त वोट बचते हैं. तीसरी सीट पर महेश केवट को जिताने के लिए बीजेपी को और 9 से 11 अतिरिक्त वोटों की जुगाड़ करनी होगी. दूसरी तरफ, कांग्रेस के पास कुल 61 विधायक हैं, जो जीत के आंकड़े से महज 3 वोट ज्यादा हैं. तकनीकी तौर पर कांग्रेस की सीट सुरक्षित दिख रही है, लेकिन मार्जिन बहुत कम होने के कारण बीजेपी की एंट्री ने कांग्रेस के खेमे में धड़कनें बढ़ा दी हैं.
बीजेपी की रणनीति और कांग्रेस की किलेबंदी
बीजेपी ने यह तीसरा उम्मीदवार उतारकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं. पार्टी इसके जरिए कांग्रेस को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर करना चाहती है और विपक्षी विधायकों की एकजुटता की परीक्षा ले रही है. इसके साथ ही महेश केवट को उतारकर बीजेपी ने ओबीसी और निषाद/केवट समाज को एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी दिया है, जिससे कांग्रेस के कुछ विधायकों पर सामाजिक और राजनीतिक दबाव बन सकता है. मुख्यमंत्री मोहन यादव और कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय समेत बीजेपी नेताओं का दावा है कि वे यह सीट जीतने के लिए ही मैदान में उतरे हैं. वहीं, कांग्रेस इस कदम को लोकतंत्र पर हमला और विधायकों की 'चोरी' का प्रयास बता रही है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और वरिष्ठ नेता कांतिलाल भूरिया का कहना है कि उनके विधायक बिकाऊ नहीं हैं और वे एकजुट हैं. विधायकों के मैनेजमेंट के लिए कांग्रेस ने दिल्ली से बीके हरिप्रसाद और भंवर जितेंद्र सिंह को ऑब्जर्वर बनाकर मध्य प्रदेश भेजने की तैयारी की है, जबकि विधायकों को तेलंगाना भेजने की चर्चाएं भी तेज हैं क्योंकि कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन खुद तेलंगाना की पार्टी प्रभारी हैं.
अंतर्मन की आवाज बनाम मैनेजमेंट का महायुद्ध
चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के भीतर कुछ नेताओं की नाराजगी और इस्तीफों ने बीजेपी के हौसले बढ़ा दिए हैं. बीजेपी विधायक उमाकांत शर्मा और आशीष शर्मा जैसे नेता खुले तौर पर दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस के पर्याप्त विधायक उनके संपर्क में हैं और कई बार नेता 'अंतर्मन की आवाज' पर वोट करते हैं. हालांकि, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार इसे बीजेपी की तरफ से खड़ा किया गया एक डमी कैंडिडेट बता रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यदि मीनाक्षी नटराजन की जगह कोई और उम्मीदवार होता तो शायद यह स्थिति नहीं बनती, क्योंकि वे राहुल गांधी की बेहद करीबी और हाईकमान की पसंद हैं. राज्यसभा चुनाव में वोटिंग खुली होती है, लेकिन सियासी संदेश बंद कमरों में तय होते हैं. अब देखना यह होगा कि क्या महेश केवट प्रतिकूल धाराओं को चीरकर बीजेपी की नैया पार लगा पाते हैं या फिर कांग्रेस अपनी इस परीक्षा में सफल रहती है. कुल मिलाकर, यह मुकाबला अब मैनेजमेंट के एक बड़े महायुद्ध में बदल चुका है.
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