- MP की मेडिकल यूनिवर्सिटी ने नियमों की अवहेलना कर इंदौर और जबलपुर के कॉलेजों को करोड़ों रुपये जारी किए हैं
- यूनिवर्सिटी ने नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेजों का डेटा वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जिससे पारदर्शिता का अभाव हुआ
- ऑडिट रिपोर्ट में 551 संस्थानों से प्राप्त करोड़ों की एंडोमेंट राशि के अभाव और अधूरे रिकॉर्ड का खुलासा हुआ है
MP Nursing Paramedical Scam: मध्य प्रदेश की इकलौती मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक अराजकता और करोड़ों के वित्तीय भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है. विधानसभा में पेश CAG यानि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने NDTV द्वारा उजागर की गई अनियमितताओं की पुष्टि कर दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ने नियमों को ताक पर रखकर इंदौर और जबलपुर के कॉलेजों को 55.52 करोड़ रुपये जारी किए, जबकि 551 संस्थानों से प्राप्त 98.60 करोड़ रुपये की एंडोमेंट राशि का कोई अता-पता नहीं है. मानकों की अनदेखी कर दी गई 'बैकडेटेड' मान्यता और 67% पदों के खाली होने की वजह से हजारों छात्रों का भविष्य अधर में है, जहां 3 साल का कोर्स 7 साल में भी पूरा नहीं हो पा रहा है.
वेबसाइट पर डेटा नहीं, छात्रों के साथ धोखा
CAG ने पाया कि मेडिकल यूनिवर्सिटी ने नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेजों से जुड़ा आवश्यक डेटा अपनी वेबसाइट पर अपलोड ही नहीं किया. किस कॉलेज को किस कोर्स की मान्यता है, कितने छात्र नामांकित हैं, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी. इससे छात्रों के लिए यह जानना असंभव हो गया कि वे जिस संस्थान में पढ़ रहे हैं, वह वैध रूप से संबद्ध है या नहीं. NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया था कि कई कॉलेजों में कक्षाएं बंद थीं, लैब में जाले लगे थे और स्टाफ मौजूद नहीं था। अब CAG की रिपोर्ट बताती है कि नियामक स्तर पर भी पारदर्शिता का अभाव था.CAG ने 76 संस्थानों का निरीक्षण किया, जिनमें से 32 में गंभीर कमियां पाई गईं.इससे जाहिर है कि मानकों के अनुरूप संसाधन और बुनियादी ढांचा न होने के बावजूद कॉलेजों को संबद्धता दे दी गई.
55 करोड़ रुपये नियमों के खिलाफ जारी
रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं का भी खुलासा हुआ है. विश्वविद्यालय निधि से रखरखाव मद में राशि केवल संबद्ध संस्थानों को दी जा सकती है, लेकिन मेडिकल यूनिवर्सिटी ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज को 39.69 करोड़ रुपये और जबलपुर मेडिकल कॉलेज को 15.83 करोड़ रुपये, कुल 55.52 करोड़ रुपये, जारी कर दिए. यूनिवर्सिटी ने कहा कि यह व्यय कार्यकारी परिषद के निर्णय के आधार पर किया गया, लेकिन CAG ने इस दलील को खारिज करते हुए सरकार को राशि वापस लेने के निर्देश दिए.
रिकॉर्ड अधूरे, 98.60 करोड़ जमा नहीं
ऑडिट में यह भी सामने आया कि 551 संस्थानों से प्राप्त 98.60 करोड़ रुपये की एंडोमेंट राशि जमा ही नहीं की गई. यूनिवर्सिटी के पास न तो पूर्ण नकद लेखा थे और न ही वार्षिक खाते तैयार किए गए. जब संबद्ध कॉलेज बंद हुए तो छात्रों के हितों की रक्षा के लिए कोई वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध नहीं थी.
184 पद खाली, आउटसोर्सिंग पर 84 लाख खर्च
मेडिकल शिक्षा विभाग ने 275 पद स्वीकृत किए थे, लेकिन 11 साल बाद भी 2023 तक 184 पद खाली पड़े रहे. स्थापना से ही रेक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, वित्त अधिकारी और सहायक रजिस्ट्रार सहित 16 महत्वपूर्ण पद कभी भरे ही नहीं गए.
यहां तक कि सहायक ग्रेड-3 सह डेटा एंट्री ऑपरेटर का पद भी आउटसोर्स किया गया, जिसे सीधे भरना था.
तीन साल की बैकडेटेड मान्यता
NDTV की जांच में सामने आया था कि पैरामेडिकल काउंसिल ने 2022-23, 2023-24 और 2024-25 तीन शैक्षणिक सत्रों को एक साथ पूर्व प्रभाव से मान्यता दी. इससे तीन बैच के छात्र एक साथ पढ़ने को मजबूर हुए. ऐसी स्थिति बनी कि 2025 में 12वीं पास करने वाला छात्र 2023 बैच में दाखिल हुआ. मामला हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और काउंसिल पर विरोधाभासी हलफनामे देने के आरोप हैं.अब CAG की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि समस्या केवल कॉलेजों तक सीमित नहीं थी, बल्कि मेडिकल यूनिवर्सिटी के स्तर पर भी गड़बड़ियां थीं.
जमीनी हकीकत: सालों की बर्बादी
आगर-मालवा, सतना, छिंदवाड़ा, भोपाल और बुरहानपुर जैसे जिलों में NDTV ने खाली कक्षाएं,बंद लैब और परीक्षा के इंतजार में बैठे छात्रों को दिखाया था.कई छात्र तीन साल से प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम दोहरा रहे हैं. 2021 बैच के छात्र 2025 में भी डिग्री पूरी नहीं कर पाए हैं. नर्सिंग में 28,560 स्वीकृत सीटों में से केवल 17,735 पर ही पंजीयन हुआ है, यानी करीब 38 प्रतिशत सीटें खाली हैं.21 सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में से सिर्फ 8 को मान्यता मिली है.
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सीधा असर
पैरामेडिकल और नर्सिंग शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है. लेकिन प्रशासनिक देरी, अनियमित संबद्धता, वित्तीय गड़बड़ियों और बैकडेटेड मान्यता ने पूरी व्यवस्था को हिला दिया है.एमबीबीएस छात्र जहां पांच साल में डिग्री पूरी कर लेते हैं, वहीं पैरामेडिकल छात्र तीन साल का कोर्स पांच से सात साल में भी पूरा नहीं कर पा रहे.NDTV के खुलासों के बाद अब CAG की रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता है और इस विफलता की सबसे बड़ी कीमत छात्र और आखिरकार मरीज चुकाएंगे.
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