इंदौर में मिल चुका था रेड फ्लैग, फिर भी क्यों नहीं टला छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड? विधानसभा में बड़ा खुलासा

मध्य प्रदेश विधानसभा में सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि 2023 में इंदौर से लिए गए एक कफ सिरप सैंपल में खतरनाक डाइएथिलीन ग्लाइकोल की अत्यधिक मात्रा पाई गई थी. बाद में 2025 के छिंदवाड़ा कांड में भी यही जहरीला रसायन मौतों की वजह बना. सवाल उठ रहा है कि क्या शुरुआती चेतावनी के बाद सख्त कदम उठाए जाते तो त्रासदी टाली जा सकती थी?

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MP Budget Session 2026: मध्‍य प्रदेश में छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड 2025 ने जब पूरे प्रदेश को झकझोर दिया, तब उससे काफी पहले इंदौर में खतरे का अलार्म बज चुका था. विडम्‍बना है क‍ि इंदौर में खतरनाक संकेत सामने आने के बावजूद छिंदवाड़ा कफ सिरप से मौतें रोकी नहीं जा सकीं. यह चौंकाने वाला खुलासा मध्य प्रदेश विधानसभा में हुआ है.

मध्‍य प्रदेश व‍िधानसभा के बजट सत्र में लगाए गए एक प्रश्न के जवाब में सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 2023 में इंदौर से उठाए गए खांसी की सिरप के सैंपल ने वही घातक पैरामीटर फेल किया था, जिसने बाद में छिंदवाड़ा कांड को जन्म दिया. यह प्रश्न विधायक राजन मंडलोई ने पूछा था और इसका लिखित जवाब लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने दिया.

2023 का इंदौर रेड फ्लैग: वह सिरप जो बुरी तरह फेल हुआ

16 जून 2023 को इंदौर से लिया गया एक सैंपल “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” पाया गया. कारण था डाइएथिलीन ग्लाइकोल की मात्रा निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक होना. उक्त उत्पाद का नाम नेचुरकोल्ड सिरप था, जो खांसी और जुकाम के इलाज के लिए प्रयुक्त संयोजन दवा है, जिसमें पैरासिटामोल, फिनाइलएफ्रिन हाइड्रोक्लोराइड और क्लोरफेनिरामिन मैलेट शामिल हैं. प्रयोगशाला रिकॉर्ड में निर्माता के रूप में रिमैन लैब्स प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर का नाम दर्ज है. बैच नंबर ई 22053, निर्माण तिथि मार्च 2022 और समाप्ति तिथि फरवरी 2025 दर्ज है. 

rajan mandloi barwani MLA

सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट में डाइएथिलीन ग्लाइकोल 32.65 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि इसकी अधिकतम अनुमेय सीमा 0.1 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए. इसके बाद केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला ने दोबारा जांच में 30.95 प्रतिशत डाइएथिलीन ग्लाइकोल की पुष्टि की और सैंपल को फिर से “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” घोषित किया. सीधे शब्दों में कहें तो यह मामूली गुणवत्ता दोष नहीं था. यह ऐसा रासायनिक प्रदूषण था, जिस पर तत्काल आपात स्तर की कार्रवाई होनी चाहिए थी. कार्रवाई हुई, लेकिन समयरेखा सवाल खड़े करती है

सरकारी जवाब में यह भी उल्लेख है कि 5 अप्रैल 2024 को निर्माण लाइसेंस निलंबित किया गया. लेकिन आपराधिक प्रकरण 8 अक्टूबर 2025 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, इंदौर की अदालत में प्रस्तुत किया गया. यही वह अंतर है, जिस पर विधानसभा में सवाल उठाया गया. क्योंकि छिंदवाड़ा की त्रासदी उस समय के बाद हुई, जब इंदौर की चेतावनी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो चुकी थी.

छिंदवाड़ा में बाद में फेल सैंपल, लेकिन कंपनी अलग

दस्तावेज यह भी स्पष्ट करते हैं कि छिंदवाड़ा से जुड़े बाद के फेल सैंपल किसी अन्य उत्पाद और अन्य कंपनियों के थे. वे इंदौर वाली कंपनी या उसी बैच से संबंधित नहीं थे. यही तथ्य इस मामले को और गंभीर बनाता है. यह एक फैक्ट्री का मामला नहीं लगता. यह एक पैटर्न की तरह दिखता है.

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साल 2025 और 2026 के बीच छिंदवाड़ा और जबलपुर से उठाए गए कई सैंपल फिर से डाइएथिलीन ग्लाइकोल की अत्यधिक मात्रा के कारण फेल पाए गए. कुछ मामलों में यह स्तर 46 प्रतिशत के आसपास दर्ज किया गया. यानी इंदौर में भारी चूक दर्ज होने के बाद भी, अन्य जिलों में वही घातक रसायन अलग कंपनियों की दवाओं में मिलता रहा.

छिंदवाड़ा में बचाई जा सकती थी जान 

विधायक राजन मंडलोई का सवाल सीधा और तीखा है. यदि 2023 में ही इंदौर का सैंपल डाइएथिलीन ग्लाइकोल की खतरनाक मात्रा के साथ फेल हो चुका था, तो छिंदवाड़ा की दुखद घटना रोकने के लिए और सख्त, त्वरित और व्यापक कदम क्यों नहीं उठाए गए? विधानसभा में रखे गए दस्तावेज आंकड़े देते हैं, कार्रवाई का विवरण देते हैं, लेकिन समयरेखा एक असहज प्रश्न छोड़ जाती है. चेतावनी पहले आ चुकी थी. हादसा बाद में हुआ और अब सवाल यह है कि क्या बीच का समय जीवन बचा सकता था?  

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छिंदवाड़ा कफ स‍िरप कांड 2025 क्‍या है? 

बता दें कि अक्टूबर 2025 में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 'कोल्ड्रिफ़' (Coldrif) नामक कफ सिरप पीने से कई बच्चों की किडनी खराब होने और मौतों का स‍िलस‍िला शुरू हुआ था. देखते ही देखते 24 से अधिक बच्चों की मौत इस ज़हरीले सिरप के कारण हो गई.

जांच में इस कफ सिरप में खतरनाक 'डायएथिलीन ग्लाइकॉल' (Diethylene Glycol) पाए जाने की पुष्टि हुई, जिसके बाद मध्‍य प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और निर्माता कंपनी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की. तमिलनाडु की 'श्रीसन फार्मास्युटिकल्स'  द्वारा निर्मित कोल्ड्रिफ़ सिरप में जहरीले रसायन पाए गए. बच्चों में उल्टी, पेट दर्द, पेशाब में कमी और गंभीर किडनी फेलियर के मामले भी देखे गए.

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