Mother’s Day: जान जोखिम में डालकर रोके 500 बाल विवाह, 200 बच्चों को बाल मजदूरी से कराया मुक्त, कांस्टेबल ज्योति तिवारी की प्रेरणादायक कहानी

Mothers Day Special: बाल विवाह रोकना ज्योति तिवारी के लिए आसान नहीं रहा. कई बार बाल विवाह रोकने के लिए आधी रात को दूर दराज के गांवों में पहुंच जाती थीं. इस दौरान उन्हें ग्रामीणों के विरोध और हमलों का भी सामना करना पड़ा.

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Constable Jyoti Tiwari: बाल विवाह को रोकते हुए कांस्टेबल ज्योति तिवारी

Constable Jyoti Tiwari Inspirational story: मां केवल वह नहीं होती जो जन्म दे, बल्कि वह भी मां कहलाने की हकदार होती है जो किसी का भविष्य संवार दे. मदर्स डे पर ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है महिला आरक्षक ज्योति तिवारी (Constable Jyoti Tiwari) की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सैकड़ों मासूम बच्चियों का जीवन बर्बाद होने से बचाया. आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और मजबूरियों के कारण जिन बच्चियों का कम उम्र में विवाह कराया जा रहा था, उन बाल विवाहों को रोकने के लिए ज्योति तिवारी वर्षों से लगातार संघर्ष कर रही हैं.

Constable Jyoti Tiwari Inspirational story: बाल विवाह रोकवाने पहुंची महिला आरक्षक ज्योति तिवारी

500 से अधिक बाल विवाह रुकवा

महिला आरक्षक ज्योति तिवारी अब तक 500 से अधिक बाल विवाह रुकवा चुकी हैं. वहीं 200 से ज्यादा बच्चों को बाल मजदूरी के दलदल से बाहर निकालकर उन्हें फिर से स्कूल पहुंचाने का काम भी उन्होंने किया है. यही वजह है कि जिन बच्चों का बचपन और भविष्य ज्योति के प्रयासों से सुरक्षित हुआ, वे आज उन्हें मां का दर्जा देते हैं.

200 से जयादा बच्चों को बाल मजदूरी से कराया मुक्त

ज्योति तिवारी बताती हैं कि जब वे बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को रेस्क्यू करती थीं, तब उनकी दर्दभरी कहानियां सुनकर मन द्रवित हो जाता था. कोई बच्चा पिता के निधन के बाद परिवार चलाने के लिए मजदूरी कर रहा था, तो कोई अनाथ होने के कारण खुद का पेट भरने के लिए काम करने को मजबूर था. कई बच्चे होटल, ढाबों और फैक्ट्रियों में काम करते मिले. ऐसे बच्चों को रेस्क्यू कर उन्होंने न केवल बाल मजदूरी से मुक्त कराया बल्कि उनका स्कूलों में दाखिला भी करवाया. 

Constable Jyoti Tiwari Inspirational story: बाल मजदूरी कर रहे बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाया.

कई बार ग्रामीणों के विरोध और हमलों का करना पड़ा सामना

ज्योति बताती हैं कि आज भी वे उन बच्चों से समय-समय पर मिलती रहती हैं. बच्चे उन्हें मां की तरह सम्मान और स्नेह देते हैं. वहीं ज्योति भी उन बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार करती हैं. उनका कहना है कि जब वे बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ते हैं तो उन्हें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है. बाल विवाह रोकना ज्योति तिवारी के लिए कभी आसान नहीं रहा. कई बार दूरदराज के गांवों से देर रात बाल विवाह की सूचना मिलती थी. ऐसी स्थिति में वे अपनी टीम के साथ आधी रात को गांव पहुंच जाती थीं. कई मामलों में ग्रामीणों के विरोध और हमलों का भी सामना करना पड़ा.

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मिले चुके हैं कई पुरस्कार

ज्योति बताती हैं कि कई बार उन पर जानलेवा हमले किए गए, लेकिन उन्होंने कभी डरकर पीछे हटना नहीं सीखा. उनका उद्देश्य केवल इतना था कि कोई भी मासूम बच्ची कम उम्र में शादी के बंधन में बंधकर अपना भविष्य खराब न करे. उनकी बहादुरी और उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए पुलिस विभाग ने उन्हें सर्वोच्च “रुस्तम जी पुरस्कार” से भी सम्मानित किया है. यह सम्मान उनके संघर्ष, समर्पण और सेवा भावना का प्रतीक माना जाता है.

Constable Jyoti Tiwari Inspirational story: कई बार सम्मानित हो चुकी है आरक्षक ज्योति.

2003 में पुलिस विभाग में हुआ चयन

ज्योति तिवारी मूल रूप से दमोह जिले की रहने वाली हैं. वे चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं. अपने बचपन को याद करते हुए ज्योति बताती हैं कि उनके घर के पीछे झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले छोटे-छोटे बच्चे मजदूरी करने जाते थे और कई बच्चे भीख मांगते थे. उन मासूम बच्चों की हालत देखकर उन्हें बेहद पीड़ा होती थी. तभी उनके मन में विचार आया कि बड़े होकर उन्हें ऐसे बच्चों के लिए कुछ करना है. इसी संकल्प के साथ उन्होंने पुलिस विभाग में जाने की तैयारी शुरू की. वर्ष 2003 में उनका चयन पुलिस विभाग में हुआ. नौकरी मिलने के बाद उन्होंने पुलिस विभाग की विशेष किशोर इकाई में काम शुरू किया और तभी से बच्चों और बच्चियों के अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार काम कर रही हैं. ज्योति तिवारी के दो बच्चे हैं और वे अपनी मां के कार्यों से बेहद प्रभावित हैं.

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ज्योति कहती हैं कि परिवार के सहयोग के बिना यह सब संभव नहीं था. वे मानती हैं कि हर बच्चा सुरक्षित बचपन और अच्छी शिक्षा का हकदार है. यदि समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करें तो बाल विवाह और बाल मजदूरी जैसी सामाजिक बुराइयों को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है.

मदर्स डे पर ज्योति तिवारी जैसी महिलाओं की कहानी समाज को यह संदेश देती है कि मां का रूप केवल परिवार तक सीमित नहीं होता. कई महिलाएं समाज की उन बेटियों और बच्चों के लिए भी मां बन जाती हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा सहारे और सुरक्षा की जरूरत होती है.

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