हाई कोर्ट का Youtube व Insta को कड़ा आदेश, कहा- 48 घंटे में हटें आपत्तिजनक कोर्ट-प्रोसिडिंग URL

हाई कोर्ट ने यूट्यूब और इंस्टाग्राम को सख्त आदेश दिया है कि अदालत की लाइव-स्ट्रीम कार्यवाही से जुड़ी आपत्तिजनक रील, क्लिप और मीम्स के URL को 48 घंटे के भीतर हटाया जाए. जनहित याचिका में आरोप था कि सोशल मीडिया पर कोर्ट की कार्यवाही को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है.

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High Court order to YouTube-Instagram: हाई कोर्ट ने अदालती लाइव-स्ट्रीम कार्यवाही के दुरुपयोग पर सख्ती दिखाते हुए यूट्यूब और इंस्टाग्राम को कड़े निर्देश दिए हैं. अदालत ने कहा है कि जिन रील, क्लिप और मीम्स के यूआरएल पर आपत्तियां दर्ज हुई हैं, उन्हें 48 घंटे के भीतर हटाया जाए या उनकी पहुंच अवरुद्ध की जाए. यह कदम न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और विश्वसनीयता की रक्षा के लिए उठाया गया है.

याचिका पर सुनवाई और अदालत की कड़ी टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश संजिव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की द्वि-न्यायपीठ ने सोमवार को जनहित याचिका पर सुनवाई की. याचिका में आरोप था कि कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग से जुड़ी कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है. इससे न्यायिक टिप्पणियों का संदर्भ बदल जाता है और न्यायालय की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ता है. अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्मों को तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए. 

नियमों का उल्लंघन: संदर्भ और कानूनी स्थिति

दमोह निवासी विजय बजाज ने अपनी याचिका में हाई कोर्ट के पूर्व आदेश और मध्य प्रदेश लाइव स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग नियम, 2021 के नियम 11(बी) का हवाला दिया. इस नियम के तहत अदालत की कार्यवाही की किसी भी प्रकार की एडिटिंग, छेड़छाड़ या अवैध उपयोग पर रोक है. इसके बावजूद सोशल मीडिया पर आपराधिक मामलों से जुड़ी क्लिपिंग और शॉर्ट वीडियो लगातार अपलोड किए जा रहे थे, जिनमें न्यायिक टिप्पणियों को सनसनीखेज तरीके से पेश किया जा रहा था.

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प्लेटफॉर्मों को निर्देश और अगली तारीख

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर मौजूद आपत्तिजनक URL की सूची अदालत के समक्ष रखी गई. कोर्ट ने दोनों प्लेटफॉर्मों को निर्देश दिया कि वे 48 घंटे के भीतर इन लिंक तक पहुंच को ब्लॉक करें या सामग्री हटाएं. साथ ही, अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च को तय करते हुए संबंधित पक्षों से अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा.

क्यों ज़रूरी है यह कदम

कोर्ट की कार्यवाही का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है, लेकिन किसी भी सामग्री को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना न केवल गलत धारणा बनाता है, बल्कि न्यायिक संस्थान की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है. हाई कोर्ट का यह आदेश डिजिटल स्पेस में जिम्मेदारी तय करने और न्यायिक प्रक्रियाओं की मर्यादा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

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