भारत की एक बेहद रहस्यमई चिड़िया जिसे ग्रामीण इलाके में टीटरी (Lapwing) के नाम से जाना जाता है. पीली चोंच काला रंग और तीखी आवाज और काम है मानसून की सूचना प्रसारण का. जी हां यह बिल्कुल 16 आने सच है और प्राकृतिक रूप से इस शक्ति का यह चिड़िया बेहद सटीकता के साथ इस्तेमाल करती है. प्रमाणिक तौर पर कहा जाता है की बारिश होने से ठीक पहले चाहे वह बारिश मौसमी हो या बे मौसम यह चिड़िया ऐलान करके तेज आवाज करना शुरू कर देती है और पूरे एरिया में चक्कर काटती नजर आती है. इस रहस्यमई चिड़िया ने शिवपुरी जिले की कोलारस तहसील के ग्राम संगेश्वर में गोविंद सिंह दांगी के खेत पर चार अंडे देकर औसत वर्षा का ऐलान किया है.
इतना ही नहीं यह अंडे कहां देगी, किस जगह देगी, कितने अंडे देगी? इस पर भी पूरा के पूरा मानसून सिस्टम डिपेंड करता है. इलाके के कई बुजुर्ग ग्रामीण प्रमाणिक तौर पर बताते हैं कि टिटहरी ने अगर एक अंडा दिया तो एक महीने बारिश, दो अंडे दिए तो 2 महीने बारिश और तीन दिए तो तीन और 4 दिए तो चार महीने मानसून की अच्छी बारिश होती है. इतना ही नहीं कहा तो यह भी जाता है कि टिटहरी अंडे कहां देगी, इस पर भी मानसूनी सिस्टम काम करता है.
आने वाले मानसून और बारिश का अनुमान भारत में टिटहरी (Lapwing) अक्सर जमीन या खुले खेतों में अंडे देती है. यह माना जाता है कि यदि टिटहरी खेत में बिल्कुल नीचे (जमीन की सतह पर) अंडे देती है तो इसका मतलब है कि बारिश सामान्य या औसत रहेगी. अगर अंडे खेत में बहुत सुरक्षित या ऊपरी हिस्से में हैं तो बारिश सामान्य रहने का संकेत माना जाता है.
अंडे ऊंचाई पर दिए हैं तो फिर मानसून अच्छा रहेगा
Lapwing नाम की यह चिड़िया अगर ऊंचाई पर अंडे देती है तो यह माना जाता है कि इस बार 4 महीने बहुत अच्छा मानसून रिकॉर्ड किया जा सकता है.
ग्रामीण इलाकों और लोककथाओं में यह माना जाता है कि टिटहरी अपने अंडों को फोड़ने (हैंडलिंग करने) के लिए 'पारस पत्थर' की तलाश करती है
पारस पत्थर क्या है
पारस पत्थर (Philosopher's Stone) एक पौराणिक जादुई पत्थर है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह लोहे या अन्य धातुओं को सोने में बदल सकता है. वहीं विज्ञान के अनुसार, पारस पत्थर जैसी कोई चीज मौजूद नहीं है. टिटहरी पक्षी जमीन पर घोंसला न बनाकर खुले में अंडे देती है और सामान्य तरीके से ही अंडों से बच्चे बाहर आते हैं. वैज्ञानिक शोध के अनुसार, इस पक्षी के पारस पत्थर से अपने अंडे फोड़ कर बच्चे पैदा करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.
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