Vijaypur Assembly Seat: मध्यप्रदेश के चंबल इलाके से एक नाटकीय राजनीतिक मोड़ सामने आया है. ग्वालियर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव निरस्त करते हुए भाजपा नेता और पूर्व मंत्री रामनिवास रावत को विजेता घोषित कर दिया है. यह फैसला रावत की चुनाव याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मल्होत्रा ने उपचुनाव के दौरान नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई थी.
अदालत ने माना जानबूझकर छिपाई गई जानकारी
हाईकोर्ट ने रावत की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि मल्होत्रा ने अपने नामांकन हलफनामे में कम से कम चार आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी नहीं दी. याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एम.पी.एस. रघुवंशी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट कई बार यह स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए अपने आपराधिक रिकॉर्ड की पूरी जानकारी देना अनिवार्य है. अदालत ने पाया कि इस नियम का पालन नहीं किया गया, इसलिए मल्होत्रा का चुनाव रद्द कर दिया गया. इसके साथ ही उपचुनाव में दूसरे स्थान पर रहे रामनिवास रावत को विजयपुर से निर्वाचित विधायक घोषित कर दिया गया. हालांकि अदालत ने मल्होत्रा को इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है और संभावित 15 दिन की अंतरिम राहत पर भी विचार किया जा सकता है.
उपचुनाव के नतीजों को हाईकोर्ट ने पलटा
यह फैसला 2024 के विजयपुर उपचुनाव के नतीजे को पूरी तरह पलट देता है, जहां कांग्रेस ने कड़ी टक्कर के बाद जीत दर्ज की थी. उस चुनाव में मुकेश मल्होत्रा ने रामनिवास रावत को 7,364 वोटों से हराया था. मल्होत्रा को 1,00,469 वोट यानी 50.66 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि रावत को 93,105 वोट यानी 46.95 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ था. इस सीट पर लगभग 2.54 लाख मतदाताओं में से 77.85 प्रतिशत ने मतदान किया था.
कानून के स्नातक होने के बावजूद दी गलत जानकारी
इस पूरे मामले में अदालत की एक अहम टिप्पणी भी सामने आई. न्यायालय ने कहा कि मुकेश मल्होत्रा स्वयं कानून के स्नातक हैं और सामाजिक विज्ञान में भी स्नातकोत्तर हैं, इसलिए उन्हें यह अच्छे से पता था कि लंबित मामलों में आरोप तय होने जैसी जानकारी हलफनामे में देना कितना महत्वपूर्ण होता है. इसके बावजूद उन्होंने हलफनामे में यह लिख दिया कि मामलों में आरोप तय नहीं हुए हैं, जबकि अदालतें पहले ही आरोप तय कर चुकी थीं. अदालत ने इसे जानबूझकर दिया गया गलत विवरण माना.
अपराधों की गंभीरता को कम करके पेश किया
अदालत ने यह भी पाया कि एक मामले में मल्होत्रा ने आरोपों की प्रकृति को भी हल्का करके पेश किया. हलफनामे में घटना को केवल मौखिक कहासुनी बताया गया था, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार मामला तीन लोगों पर हमला और गाली-गलौज का था, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि समाज में नकारात्मक प्रतिक्रिया से बचने के लिए आरोपों की गंभीरता को जानबूझकर कम करके दिखाया गया.
रामनिवास रावत का सियासी सफर और दोहरी शपथ का किस्सा
राजनीतिक दृष्टि से भी यह चुनाव बेहद दिलचस्प रहा था. रामनिवास रावत चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ ओबीसी नेता हैं और छह बार विधायक रह चुके हैं. उन्होंने हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था. भाजपा में शामिल होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उन्हें मंत्री पद की शपथ भी दिलाई गई थी. उस समय एक दिलचस्प घटना भी हुई थी, जब रावत ने करीब आधे घंटे के भीतर दो बार शपथ ली थी. सुबह 9 बजकर 3 मिनट पर उन्होंने राज्य मंत्री के रूप में शपथ ली और करीब 9 बजकर 18 मिनट पर उन्हें फिर से कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. बाद में रावत ने मजाक में कहा था कि शपथ लेते समय उनसे ‘का' शब्द छूट गया था, इसलिए उन्हें दो बार शपथ लेनी पड़ी.
मुकेश मल्होत्रा की हार और विधानसभा का नया गणित
दूसरी ओर मुकेश मल्होत्रा का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा है. 42 वर्षीय मल्होत्रा पहले भाजपा में सहारिया विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रह चुके थे. 2023 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और करीब 44 हजार वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे. बाद में जब रामनिवास रावत भाजपा में शामिल हुए तो मल्होत्रा कांग्रेस में आ गए और विजयपुर उपचुनाव जीत गए. लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले ने उनकी वह जीत रद्द कर दी है. इस फैसले के साथ ही चंबल की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ आ गया है. 230 सदस्यीय मध्यप्रदेश विधानसभा में फिलहाल भाजपा के 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के 65 और भारत आदिवासी पार्टी का एक विधायक है. हाईकोर्ट के फैसले से विजयपुर सीट भाजपा के खाते में चली जाती है तो सत्तारूढ़ दल की संख्या और मजबूत हो सकती है, हालांकि अंतिम तस्वीर इस फैसले पर संभावित अपील के बाद ही साफ होगी. फिलहाल इतना तय है कि चंबल की यह सीट, जो उपचुनाव में मतपेटी से कांग्रेस के खाते में गई थी, अब अदालत के फैसले से भाजपा के खाते में दर्ज हो गई है. अब देखना ये होगा कि विधायक की कुर्सी के बाद रावत को क्या उनके मंत्रीपद की भी कुर्सी मिलती है.
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