- धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर में मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई है
- परमार वंश के राजा भोज ने धार में 11वीं सदी में विशाल विश्वविद्यालय और मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की थी
- अलाउद्दीन खिलजी के हमले के बाद भोजशाला परिसर का एक बड़ा हिस्सा टूट कर मस्जिद में तब्दील हो गया था
Bhojshala Vagdevi Idol History: मध्य प्रदेश का धार जिला इन दिनों अदालत के एक बड़े ऐतिहासिक फैसलों को लेकर चर्चा के केंद्र में बना हुआ है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस बड़े फैसले ने सदियों पुराने विवाद पर न केवल कानूनी मुहर लगा दी है, बल्कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस भारत लाने का रास्ता भी साफ कर दिया है. इतिहास में अंदर झांक कर देखें तो पता चलता है कि मध्य भारत पर 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक शासन करने वाले परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने साल 1034 में धारानगरी (वर्तमान धार) में एक विशाल विश्वविद्यालय की स्थापना की थी. इसे 'सरस्वती सदन' कहा जाता था. यह उस दौर में देश भर में संस्कृत, प्राकृत, दर्शन, व्याकरण और वेदों की शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था, जिसे 'विद्या की काशी' भी कहा जाता था. इसी परिसर के मुख्य भाग में राजा भोज ने विद्या की देवी मां वाग्देवी (सरस्वती) की एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक प्रतिमा स्थापित करवाई थी जो फिलहाल लंदन के म्यूजियम में रखी गई है. इस रिपोर्ट में हम इसी मूर्ति के इतिहास पर बात करेंगे और ये भी जानेंगे कि मूर्ति को अपने वतन वापस लाने के राह में आगे क्या काम हो सकते हैं?
खिलजी का हमला और भोजशाला का टूटना
इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस ऐतिहासिक धरोहर पर 14वीं सदी की शुरुआत में काले बादल छा गए थे. साल 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने धार पर हमला किया और 'सरस्वती सदन' यानी भोजशाला के एक बड़े हिस्से को मलबे में तब्दील कर दिया. बर्बादी का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका. साल 1401 से 1514 के बीच दिलावर खान और महमूद खिलजी ने मंदिर के उन्हीं टूटे हुए अवशेषों, नक्काशीदार खंभों और पत्थरों को समेटकर वहां एक मस्जिद खड़ी कर दी. बाद में इसे एक सूफी संत के नाम पर 'कमाल मौला मस्जिद' कहा जाने लगा. इस पूरे फेरबदल के बीच, विद्या की देवी मां वाग्देवी की मूल मूर्ति या तो कहीं छिपा दी गई या फिर वह इतिहास के मलबे के नीचे गहरी दब गई.
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कैसे सात समंदर पार लंदन पहुंच गईं मां वाग्देवी?
मलबे और गुमनामी के अंधेरे में दबी मां वाग्देवी की मूर्ति के दोबारा सामने आने की कहानी अंग्रेजों के दौर से जुड़ी है. साल 1875 में जब ब्रिटिश राज के दौरान भोजशाला परिसर में खुदाई हुई, तो मलबे से मां वाग्देवी की एक बेहद खूबसूरत लेकिन खंडित प्रतिमा बाहर निकल आई. इस अनमोल धरोहर पर अंग्रेजों की नजर पड़ चुकी थी. साल 1880 में भोपावर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इस कीमती मूर्ति को अपने साथ समेटकर इंग्लैंड ले गए. आज यही ऐतिहासिक प्रतिमा लंदन के मशहूर 'ब्रिटिश म्यूजियम' की शोभा बढ़ा रही है. इस मूर्ति की पहचान को लेकर सबसे पुख्ता गवाही साल 1961 में मिली, जब भारत के दिग्गज पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन पहुंचे. उन्होंने वहां रखी मूर्ति का बारीकी से मुआयना किया और दावों पर प्रामाणिक मुहर लगाई कि यह ब्रिटिश म्यूजियम वाली मूर्ति ही धार की असली वाग्देवी है. फिलहाल धार की भोजशाला में इसी असली मूर्ति की एक हूबहू नकल यानी प्रतिकृति रखी हुई है.
आजादी के बाद की कानूनी जंग और एएसआई का सर्वे
देश आजाद हुआ तो साल 1951-52 में भारत सरकार ने भोजशाला को 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' घोषित कर दिया और इसकी देखरेख का जिम्मा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंप दिया. साल 2003 में एएसआई ने यहां एक बीच का रास्ता निकाला, जिसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा करने और मुस्लिमों को हर शुक्रवार नमाज अदा करने की इजाजत दी गई. हालांकि, यह फॉर्मूला विवाद और आपसी तनाव को खत्म नहीं कर सका. इसके बाद 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद हाई कोर्ट ने भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वे का जिम्मा एएसआई को सौंपा. एएसआई की टीम ने आधुनिक तकनीकों और ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार की मदद से करीब 98 दिनों तक चप्पा-चप्पा छाना. जुलाई 2024 में जब एएसआई ने 2000 से ज्यादा पन्नों की अपनी रिपोर्ट सौंपी, तो सच सामने आ गया. रिपोर्ट में साफ कहा गया कि मौजूदा ढांचा 11वीं सदी के परमार कालीन मंदिर के खंभों और अवशेषों पर ही टिका है. इस खुदाई में सनातन धर्म से जुड़े कई प्रतीक, यज्ञकुंड और भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, हनुमान व सरस्वती की प्राचीन मूर्तियां भी मिलीं.
हाई कोर्ट का वो फैसला जिसने इतिहास बदल दिया
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई की इस वैज्ञानिक रिपोर्ट और 14वीं सदी के मशहूर जैन ग्रंथ 'प्रबंध चिंतामणि' जैसे पुख्ता सबूतों को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया. अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि भोजशाला का मूल धार्मिक स्वरूप राजा भोज का स्थापित किया हुआ वाग्देवी मंदिर ही है, और यहां हिंदुओं की पूजा का अधिकार कभी खत्म नहीं हुआ था. इसी के साथ कोर्ट ने 2003 की उस पुरानी व्यवस्था को सिरे से खारिज कर दिया जिसके तहत वहां नमाज की अनुमति दी गई थी. बात सिर्फ यहीं नहीं रुकी, हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह साफ निर्देश भी जारी किया कि वह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से मां वाग्देवी की मूल मूर्ति को वापस भारत लाने और उसे दोबारा भोजशाला में ससम्मान स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाए.
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लंदन से मूर्ति की घर वापसी: अब आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक रुख के बाद अब गेंद केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय के पाले में है. भारत सरकार अब ब्रिटिश हुकूमत के सामने यूनेस्को (UNESCO) के 1970 वाले कन्वेंशन का हवाला देकर इस मामले को आधिकारिक तौर पर उठाएगी, जो किसी भी देश से अवैध रूप से ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लौटाने की बात करता है. हालांकि, राह इतनी आसान भी नहीं है, क्योंकि 'ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963' के कड़े नियम किसी भी कलाकृति को स्थायी रूप से देश से बाहर भेजने की इजाजत नहीं देते. लेकिन उम्मीद इसलिए बड़ी है क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने कूटनीतिक और कानूनी रास्तों से दुनिया के कोने-कोने से अपनी सैकड़ों प्राचीन मूर्तियां वापस लाने में बड़ी कामयाबी हासिल की है. आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच हाई-लेवल मीटिंग्स और कानूनी दांव-पेचों के जरिए मां वाग्देवी को धार वापस लाने की कोशिशें तेज होंगी, जो देश के सांस्कृतिक गौरव की वापसी का एक नया अध्याय लिखेगा.
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