Chhatarpur Government Hospitals: छतरपुर जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों की हालत बेहद खराब है. कई जगहों पर अस्पताल तो बने हैं, लेकिन डॉक्टर और नर्स की कमी के कारण मरीजों को उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है. जिले में करीब 40 डिलीवरी प्वाइंट बनाए गए हैं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा देना है, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से कई डिलीवरी प्वाइंट केवल कागजों में ही सक्रिय हैं. ग्रामीण इलाकों में अक्सर अस्पतालों में ताला लगा रहता है या वहां डॉक्टर मौजूद नहीं रहते.
डॉक्टर और स्टाफ की कमी
स्थिति यह है कि गांवों में प्रसव के समय महिलाओं को मजबूरन जिला चिकित्सालय छतरपुर का सहारा लेना पड़ता है. दूरदराज के क्षेत्रों जैसे बक्सवाहा और चंदला में भी डिलीवरी प्वाइंट तो बनाए गए हैं, लेकिन वहां डॉक्टर और स्टाफ की कमी के कारण महिलाओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
चपरासी या सीमित स्टाफ के भरोसे करवाई जाती है डिलीवरी
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रसव कराने के लिए डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते और अस्पताल में मौजूद चपरासी या सीमित स्टाफ के भरोसे ही डिलीवरी करवाई जाती है. इससे प्रसूता और नवजात दोनों की जान को खतरा बना रहता है. ऐसी ही एक घटना राजनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामने आई है, जहां एक महिला अपनी बहू को डिलीवरी के लिए लेकर पहुंची. महिला का आरोप है कि अस्पताल में डॉक्टर मौजूद नहीं थे और केवल एक नर्स व चपरासी ही प्रसव कराने में लगे हुए थे. बताया जाता है कि इस डिलीवरी प्वाइंट पर रोजाना लगभग चार से पांच प्रसव होते हैं, फिर भी डॉक्टर की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है.
हाल ही में आई रिपोर्टों में भी यह कहा गया है कि भारत की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, इसलिए वहां की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सरकार की योजनाएं तो अच्छी हैं, लेकिन जिला स्तर पर उनके क्रियान्वयन में कमी साफ दिखाई दे रही है. ग्रामीणों का कहना है कि कई डॉक्टर जिले से अप-डाउन करते हैं, जिसके कारण रात या आपात स्थिति में अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलते. ऐसे में गरीब और दूर-दराज के लोग समय पर इलाज नहीं पा पाते और उन्हें गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की यह स्थिति प्रशासन के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ जमीन पर लोगों तक कब और कैसे पहुंचेगा.














