आध्यात्मिक भारत ही बनेगा विकसित भारत 2047 की असली नींव

आज जब विश्व बहुस्तरीय संकटों से जूझ रहा है हिंसा से विखंडित समाज, वैश्विक युवा आबादी में लगभग 31% तक फैली चिंता और अवसाद तथा जैव विविधता का प्राकृतिक दर से 10 से 100 गुना तेज क्षय, तो ये केवल बाहरी समस्याएं नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक रिक्तता के लक्षण हैं.

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"इक्कीसवीं सदी केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि विचारों और मूल्यों की सदी है."

जैसे-जैसे भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर अग्रसर हो रहा है, विकसित भारत का संकल्प हमारे समय की केंद्रीय राष्ट्रीय आकांक्षा बन चुका है. किंतु भारतीय चेतना में विकास कभी केवल आर्थिक अवधारणा नहीं रहा. भारत में विकास का अर्थ सदैव मानव उत्कर्ष से जुड़ा रहा है, जहां भौतिक समृद्धि, नैतिक आचरण, मानसिक संतुलन, पर्यावरणीय सामंजस्य और सामाजिक सौहार्द एक ही व्यापक जीवन-दृष्टि के अभिन्न अंग हैं. विश्व में समग्र विकास, सतत विकास और कल्याणकारी अर्थव्यवस्था जैसे शब्दों के प्रचलन से बहुत पहले, भारत ने ऐसा सभ्यतागत दृष्टिकोण विकसित कर लिया था जिसमें जीवन के सभी आयाम परस्पर जुड़े हुए थे.

आज जब विश्व बहुस्तरीय संकटों से जूझ रहा है हिंसा से विखंडित समाज, वैश्विक युवा आबादी में लगभग 31% तक फैली चिंता और अवसाद तथा जैव विविधता का प्राकृतिक दर से 10 से 100 गुना तेज क्षय, तो ये केवल बाहरी समस्याएं नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक रिक्तता के लक्षण हैं.

आध्यात्मिक भारत (Adhyatmik Bharat) मानवता के लिए इन संकटों का सबसे समग्र समाधान प्रस्तुत करता है और भारत को 21वीं सदी का विश्वगुरु बनाता है, बल प्रयोग से नहीं, बल्कि सभ्यतागत प्रभावशीलता से.

पश्चिमी दर्शन में विषय-वस्तु द्वैत (subject-object dualism) कांत का नोमेनल-फेनोमेनल विभाजन या रॉल्स का “ओवरलैपिंग कंसेंसस” आधुनिकता के गहरे वैचारिक संकट को दर्शाता है. इसके विपरीत, आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत, सामानाधिकरण्य (सभी जीवों का एक ही आधार) के माध्यम से ऐसा उत्तर प्रदान करता है जो आज की पहचान-आधारित राजनीति और वैचारिक संघर्षों से आगे जाता है.

भारत की 3,000 से अधिक समुदायों में इस दृष्टि की व्यावहारिक सफलता प्रमाणित करती है कि अद्वैत केवल दर्शन नहीं, बल्कि शासन और समाज-निर्माण का कारगर मॉडल है.

आध्यात्मिक भारत का अर्थ रहस्यवाद में पलायन नहीं है. यह जीवन को उसकी पूर्णता में देखने की दृष्टि है- जो श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण—इन चार स्तंभों पर विकसित हुई.

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उपनिषदों के महावाक्य (तत् त्वम् असि), स्मृतियों के सामाजिक व प्रशासनिक सूत्र, इतिहासों की नैतिक कथाएं और पुराणों की सांस्कृतिक स्मृति—इन सबने मिलकर एक ऐसा ज्ञान-तंत्र बनाया जिसमें दर्शन, गणित, खगोल, आयुर्वेद, व्याकरण, स्थापत्य, सौंदर्यशास्त्र और शासन एक ही आध्यात्मिक केंद्र से जुड़े रहे.

इसी समग्र दृष्टि का आधुनिक प्रतिबिंब राष्ट्रीय शिक्षा नीति में दिखता है, जहाँ भारतीय ज्ञान परंपरा को नवाचार के साथ जोड़ा गया है. यह ज्ञान-विखंडन को समाप्त कर वैश्विक भ्रम और संघर्ष की जड़ों पर प्रहार करता है.

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भारतीय सभ्यता की एक अनूठी विशेषता अंतरंग जीवन पर उसका बल है. उपनिषदों के ऋषि, सांख्य-योग के आचार्य और आदि शंकराचार्य से लेकर परंपरागत संतों तक, सभी ने माना कि समाज की गुणवत्ता, मन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है. आज की वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य महामारी इसी उपेक्षा का परिणाम है.

पतंजलि का अष्टांग योग मानव मन और शरीर का अत्यंत परिष्कृत विज्ञान प्रस्तुत करता है:

यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधयोऽष्टावङ्गानि (योगसूत्र 2.29)

इसके यम-नियम सार्वजनिक जीवन के लिए आवश्यक नैतिकता विकसित करते हैं. आसन और प्राणायाम तंत्रिका तंत्र को संतुलित करते हैं. धारणा, ध्यान और समाधि मानसिक स्थिरता, स्पष्टता और साहस को जन्म देते हैं.

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आज न्यूरोसाइंस वही सिद्ध कर रहा है जो भारतीय मनीषियों ने सहस्राब्दियों पूर्व जाना था.

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से जिसे 177 देशों ने अपनाया भारत मानसिक स्वच्छता का वैश्विक नेतृत्व कर रहा है. 60 करोड़ युवाओं वाला भारत अगर इस आंतरिक शक्ति को विकसित करता है, तो वह सबसे मजबूत मानव पूंजी का निर्माण करता है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुर्वेद रोग को केवल शारीरिक खराबी नहीं, बल्कि असंतुलन मानता है. मन, शरीर, प्रकृति और आहार के बीच. लाइफस्टाइल जनित रोगों से जूझती दुनिया के लिए यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक है. आयुष आधारित स्वास्थ्य मॉडल, औषधीय पौधों की खेती और वेलनेस पर्यटन ग्रामीण भारत, जनजातीय समुदायों और महिलाओं के लिए समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं.

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भक्ति आंदोलन ने अद्वैत की एकता को जन-जीवन में उतारा. कबीर, मीरा, तुलसी, रविदास, तुकाराम जैसे संतों ने भाषा, जाति और वर्ग की दीवारें गिराईं. भक्ति ने भावनात्मक एकता, सामाजिक समावेशन और सांस्कृतिक सृजन को जन्म दिया—जो आज सामाजिक तनाव का सबसे प्रभावी उत्तर है.

अद्वैत वेदांत का संदेश अहं ब्रह्मास्मि विविधता को नकारता नहीं, उसे एक आंतरिक आधार देता है. सबका साथ, सबका विकास इसी दर्शन का आधुनिक रूप है.

भारत की परंपरा में ज्ञान सबके लिए था, गुरुकुल, पंचायत, स्थानीय स्वशासन और कौशल-आधारित अर्थव्यवस्था इसके प्रमाण हैं. विकसित भारत में यही दृष्टि किसानों, कारीगरों, महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाती है. भारत की पर्यावरणीय चेतना भी आध्यात्मिक है, नदी मां है, पृथ्वी माता है, प्रकृति पूज्य है.

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः (अथर्ववेद 12.1.12)

जल-जंगल-ज़मीन के प्रति यह दृष्टि भारतीय सभ्यता का आधार रही है. आज LiFE (Lifestyle for Environment) जैसे सरकारी अभियानों में यही चेतना आधुनिक रूप में अभिव्यक्त हो रही है, जहाँ करोड़ों नागरिक पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाकर उत्सर्जन घटाने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को भी बनाए रख रहे हैं.

इक्कीसवीं सदी केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि विचारों और मूल्यों की सदी है. योग, आयुर्वेद, वेदांत और भक्ति—भारत की यही आध्यात्मिक शक्ति उसकी वैश्विक सॉफ्ट पावर है. 2047 तक विकसित भारत यह सिद्ध कर सकता है कि विकास केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि साधना है—शरीर और मन, व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति, नवाचार और नैतिकता के संतुलन की साधना.

विकसित भारत का मार्ग स्पष्ट है, योग से मानसिक सुदृढ़ता, आयुर्वेद से स्वास्थ्य, भक्ति से भावनात्मक समावेश, अद्वैत से सामाजिक एकता और आध्यात्मिक पर्यावरण दृष्टि से सतत विकास.

जब विश्व GDP से आगे ग्रॉस धर्म प्रोडक्ट की बात करेगा, तब भारत का सभ्यतागत अधिकार स्वतः स्थापित होगा. विकास यहां साधना है शरीर और मन, समाज और प्रकृति, नवाचार और नैतिकता के बीच संतुलन. आध्यात्मिक भारत ही विकसित भारत का सबसे विश्वसनीय मार्ग है और मानवता के भविष्य का प्रकाशस्तंभ भी.

(लेख : अंकुर पाठक, लेखक, विचारक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक, सीईओ सुरुचि प्रकाशन) 

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