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सौंदर्य हर जगह है, बस देखने की दृष्टि चाहिए : गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी 

सच तो यह है कि सौंदर्य सर्वत्र है. आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपनी दृष्टि को निर्मल करें और जीवन को खुले हृदय से देखें. जब दृष्टि बदलती है, तो वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ एक नई चमक के साथ दिखाई देने लगती हैं. तब समझ में आता है कि इस सृष्टि में सौंदर्य सर्वत्र है.

सौंदर्य हर जगह है, बस देखने की दृष्टि चाहिए : गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी 

यदि आप सचमुच देखना सीख जाएँ, तो पाएँगे कि इस सृष्टि में कुछ भी असुंदर नहीं है. जीवन की हर घटना, हर व्यक्ति, हर परिवर्तन में एक गहरा सौंदर्य छिपा है.

सौंदर्य केवल बाहरी रूप या आकर्षण का नाम नहीं है. यह सृष्टि की गहराई में व्याप्त एक दिव्य गुण है. वास्तव में सौंदर्य तीन स्तरों पर प्रकट होता है- संकेत, अभिव्यक्ति और उद्घाटन. अध्यात्म संकेत देता है, कला उस संकेत को अभिव्यक्त करती है और विज्ञान उस रहस्य को उजागर करता है.
दिव्यता और सौंदर्य एक ही सत्य के दो रूप हैं. जहां दिव्यता है, वहां सौंदर्य है और जहां सौंदर्य है, वहां दिव्यता का स्पर्श अवश्य है. संस्कृत में ‘देव' शब्द का अर्थ है- प्रकाशमान और खेलभावना से युक्त. देवता जीवन को खेल की तरह जीते हैं, जबकि असुर कलह में उलझे रहते हैं.

खेल तभी संभव है जब जीवन में उत्साह और सौंदर्य हो. यही उत्साह वह ऊर्जा है जो हमें हल्का और आनंदपूर्ण बनाती है. सौंदर्य में एक लज्जा भी होती है- एक कोमल संकोच, जो उसके आकर्षण को और बढ़ा देता है.

ईश्वर की कार्यशैली भी सीधी नहीं होती. संस्कृत में कहा गया है-  

परोक्षप्रियाः हि वै देवाः,

अर्थात देवताओं को परोक्षता प्रिय होती है. मन तथ्य प्रस्तुत करता है, लेकिन जब वही तथ्य हृदय से आता है, तो वह सज जाता है और कहीं अधिक सुंदर बन जाता है.

सीधी और कठोर अभिव्यक्ति तब आवश्यक होती है, जब व्यक्ति जागरूक नहीं होता है. लेकिन जब चेतना जागृत हो जाती है, तब संकेत, इशारे और सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ कहीं अधिक प्रभावशाली लगती हैं. हृदय की भाषा पूर्ण उद्घाटन की भाषा नहीं है. अत्यधिक खुलापन कभी-कभी उत्तेजना पैदा करता है, जबकि छिपा हुआ सौंदर्य भीतर से आकर्षित करता है.

प्रकृति को ही देखिए. रात के समय वह पूरी सृष्टि को अपने भीतर समेट लेती है और सुबह धीरे-धीरे उसे फिर से प्रकट करती है. यही प्रकृति की लय है-

तिरोभाव और फिर प्रकटीकरण.

प्रेम की भी यही प्रकृति है. जब प्रेम को व्यक्त करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, तब वह अपने शिखर पर होता है. उस मौन में, उस रहस्य में, ज्ञान है, आनंद है और सौंदर्य भी.

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हम अक्सर लोगों को उनके शब्दों और व्यवहार के आधार पर आंक लेते हैं. लेकिन किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का केवल एक छोटा सा हिस्सा होती है. हर जीवन के भीतर बहुत सारा अनकहा प्रेम छिपा होता है.

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जब हम इस सत्य को पहचान लेते हैं, तो हमारा हृदय स्वतः विस्तार पाने लगता है. तब हम किसी के शब्दों या व्यवहार से अटकते नहीं हैं. 

दिव्य चेतना के हृदय में हर किसी के लिए स्थान है. यही उस आध्यात्मिक सत्य का संकेत है कि इस सृष्टि में हर जीवन का अपना महत्व है.

सौंदर्य का एक और महत्वपूर्ण आयाम है- कृतज्ञता. जब हमें यह अनुभव होता है कि जीवन में किसी चीज की कमी नहीं है, तब कृतज्ञता का भाव जागृत होता है. कृतज्ञता और कमी का भाव एक साथ नहीं रह सकते.

जब हम कमी महसूस करते हैं, तब शिकायत शुरू हो जाती है. लेकिन जब ज्ञान जागृत होता है, तब कृतज्ञता स्वतः प्रकट होती है. और जब हम कृतज्ञ होते हैं, तो जीवन खिलता है और सुंदर बन जाता है.

यदि आप किसी से प्रेम करना चाहते हैं, तो पहले यह विश्वास रखें कि वह आपको पहले से ही प्रेम करते हैं. यदि आपको किसी के प्रेम पर संदेह है तो वह भले कुछ भी कर ले, आपका संदेह बढ़ता ही रहेगा. इसी प्रकार यदि आप किसी के निकट आना चाहते हैं, तो पहले यह अनुभव कीजिए कि वह पहले से ही आपके निकट है. संदेह की कोई सीमा नहीं होती.

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पूरी सृष्टि चेतना की शक्ति से संचालित हो रही है. बिना जीवन के कोई सौंदर्य संभव नहीं है. शरीर सुंदर इसलिए लगता है क्योंकि उसमें जीवन है. यह जीवन केवल जैविक जीवन नहीं है; इसके पीछे एक व्यापक चेतना है जो पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है.

सृष्टि की रचना में सौंदर्य है, उसके संचालन में सौंदर्य है और उसके प्रलय में भी सौंदर्य है. प्रकृति के हर मौसम में यह दिखाई देता है- वसंत की ताजगी, ग्रीष्म की हरियाली और शरद में गिरते पत्तों का अद्भुत दृश्य.

सच तो यह है कि सौंदर्य सर्वत्र है. आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपनी दृष्टि को निर्मल करें और जीवन को खुले हृदय से देखें. जब दृष्टि बदलती है, तो वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ एक नई चमक के साथ दिखाई देने लगती हैं. तब समझ में आता है कि इस सृष्टि में सौंदर्य सर्वत्र है.

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