गुड़गांव की घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया. एक नन्हा बच्चा, जिसकी दुनिया अभी स्कूल की कॉपी, पेंसिल, रंग और खेल तक सीमित थी, 1 से 50 तक गिनती नहीं लिख पाया. बस इतनी-सी बात पर पिता का गुस्सा फूटा और यह गुस्सा कुछ ही पलों में इतना बेकाबू हो गया कि बच्चे की जान चली गई. यह खबर पढ़ते समय सबसे डरावनी बात सिर्फ यह नहीं है कि एक पिता ने अपने ही बच्चे को मार डाला. सबसे डरावनी बात यह है कि बहुत से लोग इसे यह कहकर हल्का करने की कोशिश करते हैं, गुस्से में हो गया होगा, इरादा नहीं रहा होगा, डिसिप्लिन सिखा रहा था.
लेकिन, सच्चाई यह है कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं है. यह एक ऐसे खतरनाक पैटर्न का हिस्सा है, जो पिछले कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में बार-बार सामने आता रहा है.
यह एक घटना नहीं, बार-बार दोहराई जा रही कहानी है. गुड़गांव से पहले भी कई ऐसी खबरें आ चुकी हैं, जिनमें पढ़ाई के नाम पर बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ा.
1. दिल्ली (करावल नगर), 2019
यहां एक 7–8 साल का बच्चा होमवर्क नहीं कर पाया. मां ने डिसिप्लिन सिखाने के नाम पर डंडे से उसकी बेरहमी से पिटाई की. बच्चे की हालत बिगड़ती चली गई और अस्पताल ले जाने से पहले ही उसकी मौत हो गई.
2. फरीदाबाद (हरियाणा), 2022
एक 10 साल की बच्ची गणित का टेबल सही से नहीं सुना पाई. पिता को यह शर्मिंदगी और नाक कटने जैसा लगा. गुस्से में की गई पिटाई से बच्ची को गंभीर अंदरूनी चोटें आईं और उसकी जान चली गई.
3. लुधियाना (पंजाब), 2018
यहां एक 12 साल के बच्चे के रिजल्ट में कम नंबर आए थे. पिता ने यह कहते हुए मारपीट की कि बच्चा अपना भविष्य बर्बाद कर रहा है. नतीजा यह हुआ कि बच्चे की मौत हो गई और पिता को गिरफ्तार किया गया.
4. अजमेर (राजस्थान), 2020
एक बच्चा पढ़ाई में कमजोर था और स्कूल से बार-बार शिकायतें आ रही थीं. सौतेली मां ने लगातार शारीरिक हिंसा की. बाद में उसकी मौत हुई और तब जाकर मामला सामने आया.
इन सभी घटनाओं में एक बात समान है पढ़ाई को बच्चों की जिंदगी से ऊपर रख दिया गया. हम तो उसका भला चाहते थे, सबसे खतरनाक बहाना. यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है, क्या भलाई का रास्ता डर, मार और हिंसा से होकर गुजरता है?
असल में, बहुत से माता-पिता अनुशासन और हिंसा के बीच का फर्क भूल चुके हैं. बच्चे को मारना, चिल्लाना, नीचा दिखाना, इन सबको सख्ती और डिसिप्लिन का नाम दे दिया जाता है. जबकि मनोवैज्ञानिक साफ कहते हैं कि डर में बच्चा सीखता नहीं है. डर उसके दिमाग को बंद कर देता है. वह या तो चुप हो जाता है, या अंदर ही अंदर टूटने लगता है.
पेरेंटिंग कब बन जाती है टॉक्सिक?
टॉक्सिक पेरेंटिंग एक दिन में नहीं बनती, इसके कुछ साफ संकेत पहले ही दिखने लगते हैं:
- हर गलती पर गुस्सा और चिल्लाना
- बच्चे की तुलना दूसरों से करना
- तू कुछ नहीं कर पाएगा, जैसे शब्द कहना
- पढ़ाई को प्यार, खेल और बातचीत से ऊपर रखना
- डर के जरिए बच्चे से काम निकलवाना
जब घर में बच्चा सुरक्षित महसूस करने की बजाय डरा हुआ, सहमा हुआ या चुप रहने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि परवरिश गलत दिशा में जा रही है.
माता-पिता भी दबाव में हैं, लेकिन क्या इसका खामियाजा बच्चा भुगते?
इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. आज के माता-पिता खुद कई तरह के दबाव में जी रहे हैं. नौकरी और पैसों की चिंता, समाज और रिश्तेदारों की तुलना, फलां का बच्चा तो टॉपर है जैसी बातें, स्कूल और कोचिंग का दबाव. धीरे-धीरे बच्चा प्यार का रिश्ता नहीं, एक प्रोजेक्ट बन जाता है और जब यह प्रोजेक्ट उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो गुस्सा सबसे कमजोर पर निकलता है.
हिंसा से पहले दिखने वाले संकेत:
ऐसी घटनाएं अचानक नहीं होतीं. इसके पहले घरों में कुछ संकेत साफ दिखने लगते हैं, हर गलती पर चिल्लाना, बच्चे की दूसरों से तुलना करना, तू कुछ नहीं कर पाएगा जैसे शब्द कहना, पढ़ाई को प्यार और संवाद से ऊपर रखना, डर के जरिए बच्चे से काम निकलवाना.
अगर यह सब रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है, तो यह अनुशासन नहीं, एक गंभीर चेतावनी है.
अगर बच्चा पढ़ाई में कमजोर है तो क्या करें?
- इस सवाल का जवाब मार में नहीं है.
- बच्चे की सीखने की गति को समझने में
- उसकी उम्र के हिसाब से उम्मीद रखने में
- उससे शांति से बात करने में
- तुलना बंद करने में
- और जरूरत पड़े तो शिक्षक या काउंसलर से मदद लेने में.