Colorectal Cancer:20 साल से ज्‍यादा अनुभवी डॉक्‍टर ने बताया बड़ी आंत में कैंसर क्‍यों होता है, इससे जुड़े मिथक, लक्षण, जांच और इलाज

Colon Cancer: Symptoms, Causes & Treatment: यह सबसे ज्यादा रोके जा सकने वाला (Preventable) कैंसर है. कुछ आदतें अपनाकर जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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Colon Cancer: Symptoms, Causes & Treatment

Colon Cancer: Symptoms, Causes & Treatment : हमारे समाज में बीमारियों को लेकर कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं. खासकर जब बात कैंसर की आती है, तो डर और भ्रम और भी बढ़ जाते हैं. कई लोग मान लेते हैं कि कैंसर का मतलब है “अब कुछ नहीं हो सकता”. लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है. इस बारे में पूरी जानकारी के लिए एनडीटीवी ने बात की 20 साल से अध‍िक का अनुभव रखने वाले डॉक्‍टर व‍िवेक मंगला (Dr. Vivek Mangla) से. डॉक्‍टर व‍िवेक मंगला ने आसान भाषा में समझाया और बताया कोलोरेक्टल कैंसर, यानी बड़ी आंत (कोलन और रेक्टम) के कैंसर के बारे में - इसके लक्षण, बचाव, जांच और इलाज की सच्चाई. 

कोलोरेक्टल कैंसर: बड़ी आंत का कैंसर – मिथक, लक्षण, जांच और इलाज 

क्या होता है कोलोरेक्टल कैंसर?

हमारे पाचन तंत्र (डाइजेस्टिव सिस्टम) का आखिरी हिस्सा बड़ी आंत होता है. जब इसी हिस्से में कोई गांठ या असामान्य कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले लेती हैं, तो उसे कोलोरेक्टल कैंसर कहा जाता है. यह दुनिया भर में और भारत में भी तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है. पहले इसे बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह युवाओं में भी देखने को मिल रहा है.

सबसे बड़ी गलतफहमी: “यह सिर्फ बूढ़ों को होता है”

बहुत से लोग सोचते हैं कि बड़ी आंत का कैंसर केवल ज्यादा उम्र में होता है. लेकिन सच्चाई यह है कि आजकल 30–40 साल की उम्र में भी यह बीमारी देखी जा रही है. अगर किसी युवा व्यक्ति को लगातार लक्षण बने हुए हैं, तो उसे भी जांच करवाना उतनी ही जरूरत है जितनी किसी बुजुर्ग को.

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लक्षण जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए

अक्सर लोग लक्षणों को पाइल्स समझकर टाल देते हैं. यही सबसे बड़ी गलती है.

  • ध्यान देने वाले मुख्य लक्षण:
  • मल (मोशन) में खून आना
  • बार-बार शौच जाना
  • कब्ज या दस्त का लंबे समय तक बने रहना
  • पेट में लगातार दर्द
  • वजन कम होना
  • कमजोरी या खून की कमी

महत्वपूर्ण बात: मल में खून आना कभी भी “नॉर्मल” नहीं है. यह पाइल्स भी हो सकता है, लेकिन कैंसर की संभावना को जांच के बिना खारिज नहीं किया जा सकता.

सही जांच कौन सी है?

कोलोरेक्टल कैंसर की सबसे महत्वपूर्ण जांच है कोलोनोस्कोपी.
इस जांच में एक पतली कैमरा वाली दूरबीन द्वारा मलद्वार के रास्ते अंदर डाली जाती है, जिससे पूरी बड़ी आंत को सीधे देखा जा सकता है.
सीटी स्कैन या पेट स्कैन कभी-कभी शुरुआती बीमारी मिस कर सकते हैं, लेकिन कोलोनोस्कोपी बीमारी को पकड़ने में सबसे भरोसेमंद जांच है.

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कैंसर कैसे शुरू होता है?

अक्सर बड़ी आंत का कैंसर एक छोटे से “पॉलिप” से शुरू होता है. अगर यह पॉलिप कोलोनोस्कोपी के दौरान पकड़ लिया जाए और निकाल दिया जाए, तो आगे कैंसर बनने से रोका जा सकता है. यानी समय पर जांच करवाकर कैंसर को बनने से पहले ही खत्म किया जा सकता है.

क्या है इसका संभव इलाज ?

कोलोरेक्टल कैंसर का उपचार किया जा सकता है, और मरीजों में ज्यादातर शुरुआती स्टेज में यह बीमारी पूरी तरह खत्म की जा सकती है.
स्टेज के आधार पर इलाज और ठीक होने की संभावना
स्टेज 1 और 2 : बीमारी केवल आंत की दीवार तक सीमित होती है. 90% से ज्यादा मरीजों को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. अक्सर सिर्फ सर्जरी से इलाज संभव होता है.
स्टेज 3 : बीमारी आसपास के लिंफ नोड्स तक फैल गई है. 70–75% मरीजों को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. सर्जरी के साथ कीमोथेरेपी और रेक्टल कैंसर में रेडियोथेरेपी की जरूरत पड़ सकती है.

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स्टेज 4 : बीमारी लिवर, फेफड़े या पेट की झिल्ली तक फैल चुकी है. यहां भी इलाज के विकल्प मौजूद हैं:

  • आधुनिक दवाइयों से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है
  • कुछ मामलों में फैली हुई बीमारी को ऑपरेशन से हटाया भी जा सकता है
  • 30–40% मरीजों में पूरी तरह ठीक होने की संभावना रहती है 
  • इसलिए स्टेज 4 का मतलब “इलाज खत्म” नहीं है.

Dr Vivek Mangla (GI & HPB Onco Surgeon in Delhi) 

क्या सर्जरी में बड़ा चीरा लगता है?

पहले बड़ी सर्जरी में बड़ा चीरा लगता था और रिकवरी में लंबा समय लगता था. लेकिन अब आधुनिक तकनीक जैसे लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और रोबोटिक सर्जरी से छोटे-छोटे चीरे लगाकर ऑपरेशन किया जाता है. 

इसके फायदे:

  • कम दर्द
  • कम इनफ़ेक्शन
  • जल्दी रिकवरी
  • जल्दी चलना-फिरना
  • बेहतर विजुअलाइजेशन से सटीक सर्जरी

आज कल ज्यादातर मरीजों में ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती.

क्या हमेशा पेट पर थैली (स्टोमा) लगानी पड़ती है?

यह भी एक आम डर है. सच्चाई यह है कि ज्यादातर मरीजों में स्थायी थैली की जरूरत नहीं पड़ती. कुछ मामलों में अस्थायी स्टोमा लगाया जाता है, जिसे बाद में हटा दिया जाता है. बहुत कम मामलों में स्थायी स्टोमा की जरूरत होती है -  और ऐसे मरीज भी सामान्य जीवन जी सकते हैं.

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एडवांस स्टेज में भी लेनी चाहिए दूसरी राय (Second Opinion)?

अगर किसी को बताया जाए कि:

  • ट्यूमर बहुत बड़ा है
  • ऑपरेशन संभव नहीं
  • आसपास के अंग शामिल हैं

तो घबराने की बजाय किसी विशेषज्ञ टीम से दूसरी राय जरूर लें. कई जटिल मामलों में मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम (सर्जन, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडिएशन विशेषज्ञ) द्वारा मिलकर इलाज की नई संभावनाएं निकाल सकती है.

कैसे इस कैंसर से बचा जा सकता है?

जी हां, यह सबसे ज्यादा रोके जा सकने वाला (Preventable) कैंसर है. कुछ आदतें अपनाकर जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है:

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  • ज्यादा लाल मांस (रेड मीट) कम करें
  • धूम्रपान और शराब से बचें
  • मोटापा नियंत्रित रखें
  • नियमित व्यायाम करें
  • फाइबर युक्त भोजन लें (सलाद, फल, सब्जियां)

सही जीवनशैली इस बीमारी से बचाव में बहुत मदद करती है. अपने लक्षणों को नजरअंदाज न करें. अगर मल में खून आए, आदतों में बदलाव हो, या कोई लक्षण लंबे समय तक बने रहें - तो तुरंत जांच कराएं. डर से नहीं, जानकारी से लड़ें. क्योंकि सही समय पर कदम उठाया जाए तो बड़ी आंत का कैंसर भी पूरी तरह हराया जा सकता है.

(यह लेख डॉ. विवेक मंगला, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और हेपेटोबिलियरी ऑन्कोलॉजी में विशेषज्ञ, से बातचीत पर आधार‍ित है.) 

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