Right to Recall : हमारे लोकतंत्र में हम वोट देकर नेता चुनते तो हैं, लेकिन क्या हम उन्हें हटा भी सकते हैं? अक्सर जनता शिकायत करती है कि चुनाव के बाद उनके प्रतिनिधि गायब हो गए हैं. इसी समस्या के समाधान के रूप में 'राइट टू रिकॉल' (Right to Recall) का नाम सामने आ रहा है. हाल ही में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में इस मुद्दे को उठाकर एक नई बहस छेड़ दी है. आइए समझते हैं कि आखिर यह सिस्टम क्या है और यह कैसे काम करता है.
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क्या होता है 'राइट टू रिकॉल'?
'राइट टू रिकॉल' एक ऐसी डेमोक्रेटिक प्रोसेस है जो वोटरों को यह शक्ति देती है कि वे अपने चुने हुए सांसद या विधायक को उसका कार्यकाल (5 साल) पूरा होने से पहले ही पद से हटा सकें.
राघव चड्ढा का तर्क है कि जब भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और जजों को हटाने के लिए 'महाभियोग' (Impeachment) जैसे नियम हैं, तो जनता को अपने क्षेत्र के नेताओं को हटाने का हक क्यों नहीं? उन्होंने कहा, "अगर जनता किसी को नौकरी पर रख (Hire) सकती है, तो काम न करने पर उसे निकाल (Fire) भी सकती है."
दुनिया के किन देशों में है यह सिस्टम?
यह कोई नया विचार नहीं है. दुनिया के 24 से ज्यादा लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था किसी न किसी रूप में लागू है. इनमें ये देश शामिल हैं-
अमेरिकायहां के कई राज्यों में गवर्नरों और स्थानीय प्रतिनिधियों को हटाने का हक जनता के पास है.
स्विट्जरलैंडयहां सीधे लोकतंत्र (Direct Democracy) के तहत जनता के पास यह पावर है.
कनाडा और वेनेजुएलायहां भी कुछ शर्तों के साथ यह सिस्टम काम करता है.
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
सांसद ने सदन में बताया कि इस अधिकार का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए कुछ 'सेफगार्ड' यानी सुरक्षा कवच होने चाहिए-
- इलाके के कम से कम 35 से 40% वोटर एक Petition के जरिए इसकी मांग करें.
- चुनाव जीतने के तुरंत बाद इसे लागू न किया जाए. नेता को कम से कम 18 महीने का समय दिया जाए, ताकि वह अपनी परफॉरमेंस दिखा सके.
- इसे सिर्फ राजनीतिक मतभेद के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या ड्यूटी में बड़ी लापरवाही के आधार पर ही इस्तेमाल किया जाए.
- हटाने के लिए एक दोबारा वोटिंग हो, जिसमें अगर 50% से ज्यादा लोग हटाने के पक्ष में वोट दें, तभी नेता की कुर्सी जाए.
इससे क्या फायदा होगा?
जानकारों का मानना है कि इससे राजनीति में 'जवाबदेही' (Accountability) आएगी. इससे भ्रष्टाचार कम होगा.














